इस देश में यदि सत्ता और पैसा है तो सबकुछ है. परंतु यदि लोग जाग जाएँ तो बडी से बडी सरकार भी गिर सकती है और बडे से बडा आदमी भी जेल की सलाखों के पीछे धकेला जा सकता है. जरूरत है बस लोकजागृति की. नो वन किल्ड जैसिका बहुचर्चित जैसिका लाल (म्यारा) हत्याकांड पर आधारित है. यह फिल्म बताती है कि कैसे रसूख वाले लोग कानून को अपने हाथों में खिलाते हैं और कैसे मीडिया और लोगों का दबाव हारी हुई बाजी को जीत में बदल सकता है.
जैसिका लाल ने हरियाणा के एक राजनेता के पुत्र को समय समाप्त होने के बाद शराब परोसने से इंकार कर दिया और इसका नतीजा उसे अपनी जान गँवाकर चुकाना पडा. मात्र शराब ना परोसने के लिए किसी जान ले लेना यह मजाक तो कतई नहीं है परंतु इस घटना के बाद जो कुछ होता है वह एक घिनौना मजाक ही लगता है. कैसे गवाह मुकर जाते हैं और कैसे एक अपराधी मजे से रिहा कर दिया जाता है. कैसे पुलिस को कोई सुराग ही हाथ नहीं लगता है. कैसे नामी-गिरामी वकील तरह तरह के बेतुके तर्क वितर्क कर केस को कमजोर करते हैं.
और कैसे एक तेज तर्रार पत्रकार मीरा गैती (रानी मुखर्जी) अकेले अपने दम पर जैसिका की बहन (विद्या बालन) को न्याय दिला सकती है. यह राजकुमार गुप्ता की दूसरी फिल्म है. उन्होनें इससे पहले आमिर नामक फिल्म बनाई थी जो काफी सराही गई थी. गुप्ता ने इस बार भी अपनी कहानी को यथार्थ के काफी करीब रखने की कोशिश की है. वे अपनी कोशिश में सफल भी होते हैं. वे काफी प्रतिभाशाली निर्देशक हैं.
पत्रकार के रूप में रानी मुखर्जी और पीडित बहन की भूमिका में विद्या बालन जमती हैं. रानी मुखर्जी काफी समय बाद एक सशक्त भूमिका में दिखाई दी हैं. फिल्म की पटकथा कहीं कहीं झोल खाती है परंतु सवांद लाजवाब हैं.
यह एक अच्छी फिल्म है जिसे जरूर देखना चाहिए. परंतु यह फिल्म भावनात्मक रूप से स्पर्श नहीं करती. परंतु फिर भी एक अच्छी कोशिश.
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