यह किरण राव की पहली बतौर निर्देशक फिल्म है. उन्होनें इस फिल्म की परिकल्पना काफी पहले (जब वे लगान की शूटिंग के दौरान आशुतोष गोवारिकर की सहायक थी) की थी. इस फिल्म से साबित होता है कि किरण राव में कहानी को कहने नैसर्गिक प्रतिभा है.
धोबी घाट मुम्बई की कहानी है. यहाँ के लोग और उनका जीवन और रिश्तों का बनना-बिगडना. धोबी घाट में 4 पात्रों की 4 कहानियाँ एक साथ चलती है. साई [मोनिका डोगरा] अपनी नौकरी छोड़कर मुम्बई की तस्वीरें खींचना चाहती है, मुन्ना [प्रतीक बब्बर] नागपाडा का धोबी है, अरूण [आमिर खान] अपने में ही खोया एक स्वार्थी चित्रकार है और यास्मीन [कीर्ति मल्होत्रा] अपने पति के दिए कैमरे में अपनी दुनिया को संजोती है.
धोबी घाट की कहानी इन्हीं चारों पात्रों के आसपास घुमती है. फिल्म मात्र 90 मिनट की है और इसकी कहानी को व्यक्त करना मुश्किल है. परंतु इतना कहा जा सकता है ना तो इस फिल्म की कहानी आम बॉलीवुड कहानियों की तरह सपाट है और ना ही इसका अंत.
आमिर खान अपनी सवांदहीन भूमिका में जमते हैं, मोनिका डोगरा की यह पहली फिल्म है परंतु उन्होनें काफी आत्मविश्वास के साथ अपने पात्र को निभाया है, कीर्ति मल्होत्रा की काव्यात्मक हिन्दी में बोलने वाला पात्र प्रभावित करता है. परंतु इस फिल्म की खोज है प्रतीक बब्बर जिनकी यह दूसरी फिल्म है.
यह फिल्म मुम्बई के दर्शकों को काफी पसंद आएगी और मल्टीप्लेक्सों में भी काफी चलेगी. छोटे शहरों के दर्शक शायद इसे इतना पसंद ना करें.
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