Posted in मंतव्य on फरवरी 03, 2010 by पंकज बेंगाणी
सुबह 6.30 को उठ जाता हूँ. फिर भूत की तरह टहलने लगता हूँ. इंतजार पेपर (पढें समाचार पत्र) का होता है. फेरिया आया कि नहीं. नहीं आएगा तो मुश्किल होगी. शौच के लिए कैसे जाया जाएगा.
बार बार दरवाजे तक जाता हूँ, फिर मायूस होकर लौट आता हूँ. एक आँख घड़ी पर होती है, समय तो बीत रहा है. एक बार लिफ्ट की आवाज़ आती है और मन प्रफुल्लित हो जाता है. फेरिया आ गया अब तो. पर हाय, लिफ्ट तो बीच में ही रूक गई और कोई साहब दूध लेकर अपने घर चले गए. फेरिया नहीं आया.
Posted in विचार on अक्टूबर 20, 2007 by संजय बेंगाणी
एक बार हमने किसी विद्वान से पूछा यह साम्यवाद क्या है? तो उन्होने बताया की जब इंजिन बनाने वाले और उसे चलाने वाले को एक ही धरातल पर तौला जाता है समझो साम्यवाद स्थापित हो गया. मैंने कहा अरे! तब तो समझो साम्यवाद का सपना सच हो गया. अच्छा कैसे?
अब देखो ज्ञानदत्तजी हैं ना, वो भले ही सैलून में सफर करे और वहीं पर लिखे, मगर लिखते तो चिट्ठा ही है ना. चिट्ठा तो हम भी लिखते है. लो हो गए ना बराबर.
कहते हैं अनुप शुक्लाजी देश के लिए बम टाइप कुछ बनाते है. बनाते होंगे, लिखते तो चिट्ठा ही है ना, चिट्ठा तो हम भी लिखते है. हो गए ना बराबर.
ये आलोक पौराणिक सॉरी पुराणिक हैं, इनके मस्त चमचमाते दाँत हैं और दाँत माँजने से समय मिल जाये तो लिख भी लेते है. इधर उधर छप भी जाते हैं, लोग वाह वाह भी करते हैं. तो क्या? लिखते तो चिट्ठा ही है ना, चिट्ठा तो हम भी लिखते है. हो गए बराबर.
वे कैनेडा रहते हैं, मजे है. मौज लेते है और कविता भी लिखते है. उन्हे कवि सम्मेलनों में बुलवाया जाता है. बड़े चहेते बने फिरते है, समीरलालजी. मगर करते क्या हैं? चिट्ठा लिखते है. चिट्ठा तो हम भी लिखते है. हो गए बराबर.
इनके चर्चे रतलाम से बाहर खूब है. तकनीक पर लिखते हैं, हिन्दी के लिए हाड़मारी भी करते है. टीवी पर जब रवि-रतलामी का इंटरव्यू आता है, हम कहतें है, ये चिट्ठा लिखते हैं जी, वैसे चिट्ठा तो हम भी लिखते है. हो गए बराबर.
अब कौन हमारे बराबर होना चाहता है, बताये. अभी नम्बर लगा देते हैं.