Thursday, Aug 21st

अंतिम अपडेट:05:24:29 AM IST

ताजमहल की कहानी, निर्माण कथा, इतिहास और विवाद

Print PDF
tajmahalविश्व के सुन्दरतम भवनो में एक ताजमहल एक अजूबा भी है. इस शानदार मक़बरे का निर्माण-कार्य भी कम पेचीदा, ख़र्चीला और समय खाने वाला नहीं रहा. आईये देखें बीस हजार मज़दूरों द्वारा बीस साल में इस इमारत का निर्माण कैसे संभव हुआ और निर्माण-कार्य में तब क्या-क्या बाधाएँ थी और क्या थे इनके समाधान.

जिसने ताजमहल बनवाया:

वह था मुगल बादशाह शाहजहाँ. चंगेजखान का वंशज बाबर भारत का पहला मुगल बादशाह था, उसके द्वारा 1526 में इब्राहिम लोदी को पानीपत में पराजित कर दिल्ली पर कब्ज़ा जमाने के बाद उसके वंशजो ने 300 वर्षो तक भारत पर शासन किया. ज्यादातर मुगल शासक क्रूर, जनूनी और सत्ता-लोभी थे. बाबर पराजित सैनिकों के सर कलम कर खोपड़ीयों की मिनारे बनाया करता था. उसके वंशज भी उसके बाद सत्ता और सम्पत्ति में वृद्धि करते रहे. बाबर के बाद हूमायु और फिर अकबर तथा बाद में जहाँगीर ने इतनी सम्पत्ति इकट्ठी कि की उसका मूल्यांकन ही असंभव हो गया. कहते है एक बार जहाँगीर ने इसकी कोशिश की मगर वह चार महीने तक मूल्यांकन का कार्य चला कर अंत में थक-हार कर इसे बंद करवा दिया.

जहाँ बेशुमार सत्ता और सम्पत्ति हो वहाँ इसके लिए षडयंत्र और गंदे दाव-पैच न हो ऐसा नहीं हो सकता. जहाँगीर के जीवित रहते ही उसका महत्त्वाकांक्षी पुत्र खुर्रम सत्ता के लिए अपने भाइयों का सफ़ाया करने में लग गया था. एक भाई को खुद फाँसी पर लटका दिया, एक को कैद कर आंखे फुडवा दी और एक को उसी के सैनिकों द्वारा कत्ल करवा दिया और अंत में ई.स. 1628 में मुगल शहनशाह बना तथा अपना नाम खुर्रम से शाहजहाँ रख लिया. नाम के साथ कर्म नहीं बदले. एक बार उसने पराजित 8000 सैनिकों के सर-कलम कर उससे 260 मिनारें बनवायी. वैसे तो क्रूरता और कला का कोई मेल नहीं है मगर यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं की इसी शहनशाह ने सगंमरमर की सबसे खुबसुरत इमारत का निर्माण भी करवाया.

ई.स. 1631 में शाहजहाँ की बेगम मुमताज की मृत्यु होने पर उसकी याद में शहनशाह ने एक भव्य मकबरा बनाने का निर्णय लिया वह भी महल-नुमा मकबरा.

संसाधन:


बादशाह एक शानदार भवन का निर्माण करवाना चाहता था और इसके लिए खज़ाने के दरवाज़े खोल दिये थे. धन पानी की तरह बहाने को तैयार था. उसके हिसाब-किताब रखने वाले रूद्रदास ने अनुमान लगाया था के कुल खर्च 96 लाख के आस-पास होगा, जो आज के हिसाब से देखें तो इसका 200 गुना ज्यादा बैठता है.

20000 मज़दूर एकत्र किये गये. इनमें 37 ऐसे कारीगर थे जो अपने अपने काम में दक्ष थे और इन्ही की देख रेख में ताजमहल का निर्माण कार्य सम्पन्न होना था.

बगदाद से एक कारीगर बुलवाया गया जो पत्थर पर घुमावदार अक्षरों को तराश सकता था. मध्य एशिया के बुखारा शहर से जिस कारीगर को बुलवाया गया वह संगमरमर के पत्थर पर फूलों को तराशने में दक्ष था. विराट कद के गुम्बदो का निर्माण करने में दक्ष कारीगर तब तुर्की के शहर इस्तम्बुल में रहा करता था, उसे भी बुलवाया गया. मिनारों के निर्माण कार्य के लिए समरकंद से कारीगर को बुलवाया गया. वहीं मुख्य शिल्पी कंधार का था. इस प्रकार छह महिनो में 37 दक्ष कारीगर इक्कठे किये गये जिनकी देखरेख में बीस हजार मज़दूर अगले बीस-बाईस साल तक निर्माण कार्य करने वाले थे.

निर्माण कार्य के लिए संगमरमर राजस्थान के मकराणा से आने वाला था, तो अन्य चालीस प्रकार के कीमती पत्थर व रत्न बगदाद, अफ़गानिस्तान, तिब्बत, इजिप्त, रूस, ईरान जैसे देशों की खाक छान कर व भारी किमत चुका कर इक्कठा किये गये.

निर्माण कार्य में आयी समस्याएं व उनके समाधान :

भारी भरकम टनो के हिसाब से संगमरमर पत्थर मकराणा से आगरा तक लाना एक समस्या थी. दोनो स्थानों के बीच की दूरी 300 किमी जितनी है. ऐसे में सबसे पहले तो पत्थर की खदानों में बादशाह ने 1800 जितने मज़दूर काम पर लगाए, यहाँ सवा दो-दो टन जितने भारी पत्थर के चौकोर टुकड़े काटे गये. रेगिस्तान की वजह से पहियों वाले वाहन काम आने वाले थे नहीं और ऊँट इतने भारी पत्थर उठा नहीं सकते थे, ऐसे में इस काम के लिए 1000 हाथियों तथा महावत व अन्य देखभाल के लिए 2500 लोगो को काम पर लगाया गया. हाथी रोज 30 किमी के हिसाब से दूरी तय करते और दस दिनो में मकराणा से पत्थर लिये आगरा पहुँचते.

दूसरी समस्या थी नरम मिट्टी. निर्माण कार्य के लिए आगरा में यमुना का किनारा चुना गया, जहाँ की मिट्टी नरम है तथा इतनी भारी भरकम इमारत का बोझ सह सके वैसी नहीं थी. एक समय ऐसा आता जब इमारत अपने ही भार से ज़मीन में धंसने लगती. इसका हल निकालते हुए असंख्य सिक्को को खड़े में ज़मीन में दबाव से गाड़े गये. इससे पानी निचुड़ कर निकल गया तथा मिट्टी में कसाव आया भी आया.

इमारत की नींव 15 मीटर तक की रखी गई तथा इमारत के वजन को बड़े हिस्से में बाँट देने के इरादे से 95 मीटर लम्बे-जोड़े व 6.7 मीटर ऊँचे चबुतरे को बनाया गया. इस चबुतरे के बीचोंबीच एक मीटर चौड़ी दीवार वाली इमारत बननी थी जिसकी ऊँचाई 67 मीटर तक हो जानी थी. साथ ही चबुतरे के चारों कोनो पर डेढ मीटर के व्यास वाली तथा 40 मीटर से ऊँची मीनारें बननी थी. इनका निर्माण कार्य जब आगे बड़ा तब तीसरी समस्या सामने आयी, इतनी ऊँचाई तक पत्थरों को कैसे पहुँचाए जाये. बाँस के मचान अनौपयोगी थे. आधुनिक मशीनें तो तब थी नहीं. तो इसका हल निकाला गया ईंट व लकड़ी से ऊँचाई की ओर जाते मार्ग बनाये गये. 15 मीटर पर एक फूट जितनी ऊँचाई प्राप्त करे ऐसे इन "फ्लाइओवर पूल नुमा" मार्ग पर बैलगाड़ी जैसे साधन चल सकते थे. जैसे जैसे ऊँचाई बढ़ती इन मार्गो को भी अद्यतित करना पड़ता. अंततः इन मार्गो की लम्बाई चार किलोमीटर तक बड़ गई थी.

इन्ही मार्गो से लगभग 500 पशु रात-दिन 84600 घनमिटर जितना पत्थर ढ़ोया करते थे.

ताज हुआ तैयार :


कुशल कारीगरो द्वारा अद्भुत कारीगरी का नमूना स्वरूप ताजमहल ई.स.1654 में लगभग 22 वर्षो में बन कर तैयार हुआ. मगर तब तक शाहजहाँ ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली (शाहजहानाबाद) स्थानांतरित कर ली थी. ताज के सौंदर्य से वशीभूत शाहजहाँ ने सफेद ताजमहल के सामने के किनारे ऐसा ही काला महल बनाने की इच्छा व्यक्त की.

अधूरी रही इच्छा:


ताज पर हुए बे हिसाब खर्च से शाहजहाँ का पुत्र औरंगज़ेब नाराज़ था, एक और महल के निर्माण का सुन उसने षडयंत्र रचने शुरू किये. पिता की भाँती ही उसने भी अपने भाइयों को रास्ते से हटाया और पिता को पद भ्रष्ट कर कैदी के रूप में आगरा भेज दिया. शाहजहाँ आगरा के क़िले से ताज को निहारा करता. ऐसे ही एक दिन पहरेदारों ने पद भ्रष्ट बादशाह को ताजमहल को निहारते हुए मृत अवस्था में पाया.
BLOG COMMENTS POWERED BY DISQUS