भारतीय जनता पार्टी गहरे संक्रमण में है. कम से कम यह दोहरा है, नेतृत्व और विचारधारा के स्तर पर.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की विरासत को पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने ढंग से संभाला और उनके बाद लालकृष्ण आडवाणी ने. उस पर अलग-अलग मत हैं. इतना तय हो गया है कि यह सब नेतृत्व की भूमिका में नहीं रहेंगे.
लालकृष्ण आडवाणी अधिक से अधिक सलाहकार बने रह सकते हैं. नेतृत्व के स्थान पर भाजपा के अध्यक्ष के रुप में नितिन गडकरी आ गए हैं.
वे एकबारगी अध्यक्ष बने हैं. इससे पहले वे भाजपा के किसी राष्ट्रीय फोरम में नहीं थे. ज़ाहिर है कि पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर निर्णय प्रक्रिया से उनका पहली बार वास्ता पड़ेगा.
धारणा बन गई है कि उनका चयन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने किया है. ये पूरी तरह से सच नहीं है.
संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने लालकृष्ण आडवाणी से चार नेताओं– अरूण जेटली, वैंकया नायडू, अनंत कुमार और सुषमा स्वराज के अलावा अध्यक्ष के नाम सुझाने को कहा.
संघ की सहमति
नितिन गडकरी के नाम पर संघ ने अपनी सहमति दे दी.
इतना तो साफ़ है कि पार्टी के नेतृत्व परिवर्तन में भाजपा नेताओं की कोई सक्रिय भूमिका विचार विमर्श में नहीं रही.
इससे दो बातें होंगी. पहली यह कि इसे संघ का फ़ैसला माना जाएगा. दूसरा यह कि इस फ़ैसले को अस्पष्ट और अतार्किक समझा जाएगा.
इससे तीसरी बात यह निकलेगी वह ज्यादा गंभीर है कि संघ और भाजपा का नेतृत्व अपने फ़ैसले के बारे में टालू नज़रिया रखते हैं. यानी फ़ैसले पर कतराते हैं और सर पर आ पड़ती है तो जल्दबाज़ी में शिखर पर निर्णय हो जाते हैं.
क्या एक लोकतांत्रिक राजनीतिक दल के लिए यह बढ़िया संकेत हैं? इनमें ही वे गुत्थियाँ हैं जिनहें नितिन गडकरी को हल करनी पड़ेगी.
नितिन गडकरी को संघ के नैतिक समर्थन का बल प्राप्त होगा. इससे उनकी राह बहुत आसान नहीं हो जाएगी, क्योंकि भाजपा बड़ी हो गई है और बदल भी गई है.
कहना यह है कि रोज़मर्रा के काम में संघ पर उनकी संस्थात्मक निर्भरता बढ़ेगी जो उनकी छवि में दाग़ भी हो सकती है.
गडकरी की ख़ूबी
गडकरी व्यवहार कुशल नेता हैं. इतने की आसमान में दो खूटियाँ से बंधे लटके पतले तार पर सधे क़दमों से चलने की कला उनमें बख़ूबी आती है. समन्वय की इस कला ने ही उन्हें महाराष्ट्र में प्रमोद महाजन-गोपीनाथ मुंडे के अंधड से बचा लिया.
विचार का जहाँ तक सवाल है वे स्वदेशी के पैरोकार हैं पर वैश्वीकरण से उन्हें वैर भी नहीं है.
उनकी समस्या भाजपा के शिखर से शुरू होगी जिसे संघ के सुरेश सोनी सुलझा नहीं सकेंगे क्योंकि वे संवाद के बजाए निर्णय सुनाने वाले स्वभाव के हैं. स्वभाव बदलने की कोई पद्धति संघ अब तक खोज नहीं पाया है.
भाजपा ने अबतक तीन वैचारिक लाइन ली हैं. गांधीवादी समाजवाद. इसे 1985 में छोड़ा और एकात्मक मानववाद को अपनाया.
1987 से वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लाइन पर है. इसने भाजपा को अयोध्या आंदालन में एक भूमिका दी. यही वह लाइन है जो मुहावरे में बहुत दूर तक पहुँची.
लेकिन भाजपा की समस्या इसी से शुरू होती है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को वो ऐसे ठोस नारे में नहीं बदल सकी है जो लोगों के गले उतरे. इसके लिए जिस तरह की सैद्धांतिक समझ और चारित्रिक दृढ़ता चाहिए वो भाजपा में है न संघ में.
सतही सत्ता के खेल में उलझी भाजपा का वैचारिक द्वंद उस समय बेक़ाबू हो गया जब वह चुनाव में हारने लगी. लक्षण इस बात के हैं कि यह संकट बढ़ता ही जाएगा.
भाजपा के संक्रमण का एक पहलू यह भी है कि उसे राजनीतिक उत्तराधिकार का ही फ़ैसला नहीं करना है बल्कि नई मौजूद चुनौतियों के संदर्भ में एक सैद्धांतिक आधारभूमि भी तलाशनी है. जिससे वह ऊर्जा ग्रहण कर एक राजनीतिक दल के रुप में सार्थक हो सके और अपने समर्थकों को इतना वेगवान बना सके कि वे राजनीतिक शून्यता को भरने में समर्थ हो जाएं.
इसके बारे में संघ जितना अगंभीर है उससे ज़्यादा भाजपा. भाजपा में पार्टी प्रतिबद्धता का हाल यह है कि संघ नेतृत्व खुलेआम कहने लगा है कि वहाँ कोई भी राष्ट्रीय नेता ऐसा नहीं है जो पार्टी और उसके भविष्य की सोचता हो. हर कोई अपने में सिमट गया है.
भाजपा के जिस विशेषता के लिए जानी जाती थी वह उससे बहुत दूर हो गई है. इसे संघ चाहे भी तो कैसे दूर करेगा. क्या कोई नया संगठन मंत्री आकर जादू फेर सकता है?
इस समय जो संगठन मंत्री हैं वे बिगड़ी भाजपा के चेहरे हो गए हैं.
भाजपा की अनेक धाराएं हो गई हैं. खुलकर बहस की गुंजाइश ख़त्म है. असहमति को वहाँ विरोध समझ लिया जाता है, गिरोहबंदी में फंसी भाजपा को संघ का हंटर कितना सुधार सकेगा?