भारत को जल्द निर्णय लेना है कि बीटी बैंगन की खेती को अनुमति देनी है या नहीं. बीटी बैंगन से जहाँ पैदावार बढ़ेगी और किसानों को लाभ होगा वहीं इस प्रकार के खाद्य-पदार्थ मानव शरीर को हानी भी पहुँचा सकते है, ऐसी आशंकाएं व्यक्त की जा रही है. आइए देखें इस पूरे विवाद में आखिर है क्या?
भारत में बैंगन
भारत में बैंगन की खेती मुख्यत्व आंध्रप्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, छतिसगढ़, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल में होती है. भारत दुनिया का चीन के बाद दुसरा सबसे ज्यादा बैंगन उगाने वाला देश है. देश में प्रति वर्ष लगभग 85 लाख टन बैंगन का उत्पादन होता है. इसमें से कीड़े लगने के कारण लगभग 50 से 70 प्रतिशत पैदावार खराब हो जाती है तथा किसानों को लगभग रू. 1000 करोड़ का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.
क्या है बीटी बैंगन
अमेरिकन कम्पनी ‘मोनसांटो’ तथा भारतीय कम्पनी ‘महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड्स कम्पनी’ ने संयुक्त रूप से बीटी बैंगन को विकसित किया है. बैंगन के जीन में परिवर्तन कर उसमें जमीन में पाए जाने वाले एक बेक्टेरिया ‘बिसिलस थुरिंजिएंसिस (बीटी) के जीन को प्रत्यारोपित किया गया है. यह जीन एक खास प्रकार के जहरीले प्रोटीन का निर्माण करता है जिससे इस प्रकार के बैंगन के फल और पौधों को खा कर नुकसान पहुँचाने वाले कीड़े पेट फट जाने से मर जाते है और पैदावार को नुकसान होने से बच जाता है.
फिर विरोध क्यों
बीटी बैंगन का मानव स्वास्थ्य के साथ साथ पशुओं के स्वास्थ्य तथा पर्यावरण पर भी विपरीत असर पड़ता है. इस बात को मानने वाले वैज्ञानिक, स्वयंसेवी संगठन तथा किसान इसका विरोध कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि प्रारम्भ में लाभ मिल सकता है मगर आगे चल कर खाद व किटाणूनाशकों का उपयोग बढ़ जाता है. अतः बीटी के स्थान पर स्वदेशी संकर प्रजातियों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, जो विषाक्त नहीं है. स्वतंत्र विशेषज्ञों का कहना है कि आंध्रप्रदेश में बीटी कपास के पत्ते खाने से भेड़-बकरियाँ मारी गई थी, खरगोश में खुन की कमी देखी गई, चुहों में डायरिया तथा लिवर संकोचन की शिकायत पायी गई.
ऑस्ट्रेलिया, हंगरी, आयरलेण्ड तथा युरोपिय संघ के 20 देशों तथा श्रीलंका, थाईलेण्ड, अल्जीरिया व जापान ने बीटी पर प्रतिबन्ध लादा है.
पक्षधरों के तर्क
बीटी बैंगन में रहा प्रोटीन मात्र कीड़ों को मारता है. मानव पर इससे एलर्जि या जहर का असर नहीं देखा गया है. पशुओं की आंतों में जाकर प्रोटिन विघटित हो जाता है अतः इससे नुकसान नहीं होता.
बीटी बैंगन से कीड़ों द्वारा होता नुकसान 80 प्रतिशत तक कम हुआ है. एलिसा परीक्षण से ज्ञात हुआ है कि खेती लायक जमीन को कोई नुकसान नहीं होता.


