| अपराध बोध - �?क लघ�? कथा |
| कथा सागर | |
| गुरुवार , , 07 सितम्बर | |
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अगस�?त की उमस भरी शाम. पीछे रेलवे क�?वार�?टर की सिगडियों से उठते कोयले के ध�?ं�? की ख�?शब�? पूरे माहौल मे भरी ह�?ई थी. ये महक म�?�?े श�?र�? से बह�?त भाती है.
हवा खाने के लिये मै अपने दूसरी मंजिल के फ�?लेट की पीछे वाली बालकनी मे निकल आता हू�?. सिगरेट जलाते ही मेरी नजर उन दो आंखों से टकरा जाती है, जो पिछवाडे के क�?वार�?टर के आंगन से म�?�?े ही ताक रहीं थी. मै चाह कर भी उसकी नज़रों से अपनी नज़रें नही हटा पाया और �?कटक उसे देखने लगा.
कितनी गहरी और बोलती ह�?ई आखें हैं. माथे पर अल�?हडता से बिखरी ज�?ल�?फें और पसीने से बेतरतीब हो गई वो सिंद�?री बिंदिया. �?क प�?रानी सी धानी रंग की सूती साडी मे लिपटी वो बला की ख�?बसूरत लग रही थी.
ऎसा नही कि मैने पहले कभी उसे नही देखा मगर आज पहिली बार नज़रे चार ह�?ई थी. उसकी आंखों मे �?क अजब सा प�?रश�?न चिन�?ह और चेहरे पर आंतरिक वेदना की �?क परत.
वो शायद सिगडी उठाने ही बाहर निकली थी. नजरों के मिलते ही वो जडवत जहां की तहां खडी रह गई. कांपते होंठ जैसे क�?छ कह देने को आत�?र और आंखें अपने भीतर छिपी असंख�?य वेदनाओं का इज़हार करने को बेकरार.
�?का�?क उंगलियों के बीच जलन से बिना पिये सिगरेट खत�?म होने की तरफ़ जैसे ही ध�?यान गया, हाथ जोर से �?टक कर सिगरेट फेंकी. मेरी हालात देख वो बस धीरे से म�?स�?कराई. हमारी नज़रे फिर भी �?क दूसरे को ही देखती रहीं. कब शाम ढल गई और अंधियारा घिर आया, पता ही नही लगा.
�?का�?क उसके घर के दरवाजे पर उसके पति की दस�?तक स�?नते ही घबडा कर वो अंदर भाग गई. मै वहीं बालकनी मे क�?र�?सी खींच कर बैठ गया. मन अभी भी उसके आंगन मे ही विचर रहा था.
उसके घर से चिल�?लाने की आवाज आ रही थी. शायद उसका पति पीकर नशे मे घर लौटा था.
वो चिल�?ला रहा था..'' स�?स�?साआली, दिन भर पडी पडी आराम करती रहती है और अब कह रही है अभी खाना बनने मे समय लगेगा...''' वो ब�?री ब�?री गालियां बकता जाये और उसे ब�?री कदर मारता जाये. उसके रोने की आवाज भी मेरे कानो को भेद रही थी.
न जाने वो कब तक उसे मारता और चिल�?लाता रहा. म�?�?से सहा ना गया. मै उठकर भीतर चला आया, �?क आत�?मग�?लानि का �?हसास लिये कि मेरी वजह से बेचारी की क�?या हालत हो रही है. न मै बालकनी मे निकलता, न उससे नजरें टकराती और न ही खाना बनाने मे उसे देर होती...मै अपराधबोध से घिरता चला गया.
इस वाकये को दो हफ�?ते बीत गये हैं. आज फिर बह�?त उमस है. शाम हो रही है, अभी अभी दफ�?तर से लौटा हू�?. क�?छ ताज़ी हवा खाने का मन है लेकिन आज मै घर की सामने वाली बालकनी मे आकर बैठ जाता हू�?. उस रोज का सिगरेट से जलने का घाव तो भर गया है, मगर उसकी जलन और अपराधबोध, दोनो अब तक ताजे हैं.
टिप्पणियाँ
(13)
प?रश?न उठाये हमने लेकिन कब सीखा टकराना
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कौन स?वयं को माने दोषी? कौन कहे अफ़साना हम सब कहीं पलायनवादी, और कहीं पर नायक श?रेणी क?या है व?यर?थ मित?रवर,फिर से प?रश?न उठाना report abuse
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म??े नहीं लगता कि दोष सारा आपका है, क?छ गलती उधर से भी तो ह?ई है, क?या उन?हें नहीं पता था कि उनकी इस हरकत की उन?हें क?या सजा मिलने वाली है, आप नाहक ही अपराध बोध पाले बैठें है। ह?आ सो ह?आ भूलें उसे
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समीर जीः
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आपका ब?लॉग ब?लॉग?गर पर होने की वजह से मैं वहां टिप?पणी नही करसका। और ये कहानी भी पसंद आई report abuse
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संजीव चित?रण. प?ने के बाद कथा को दिमाग से ?कदम निकाल देना सम?भव नहीं.
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सिगड़ी में जल रहे पत?थर कोयले के ध??ं की ख?शबू... म??े भी याद आ गई. स?त?री की व?यथा-कथा का अंश तो मिला ही वहीं अपराध बोध का वो वाक?या जो आपको (या नायक को) अब तक व?यथित कि? है.. ये भी मार?मिक बन पड़ा है. किंत? कहानी के साथ लगा चित?र ठीक नहीं है.. यह फिट नहीं हो रहा है. इसे हटा दें और कोई कलात?मक चित?र लगा?ं.
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कहानी तो छोटी ओर स?ंदरता से कही आपने.
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अब उसमे दोष यानी अपराध किसका , बो बतलाना तो म?जे कठीन लग रहा हे ! report abuse
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द्वारा प्रेषित shambhu nath , जनवरी 18, 2007
Sachchai wapas la do
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2 La sakate to wapas la do us sachchi sachchai ko Bhrathchar ko kam kar do kuchh kam kar do mahagai ko Ghapale par ghapala kam tak hogaa kab bhunkhe mare ge log Kab tak abaroo lutati rahegee,kab rahegaa kuriya me shok Din dupahare lute khajanaa band karo is dithai ko Bhrathchar ko kam kar do kuchh kam kar do mahagai ko Kab tak rari rar karege kab jaayegee anyay ki dor Kab aayegaa nyay ka mousam kab nache ge aangan me mor Aisa niyam banaa do rajan chhuye na log burai ko Bhrathchar ko kam kar do kuchh kam kar do mahagai ko report abuse
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On a serious note, you have given a very true title to this (Aik Laghu Katha).