| रूठी रूठी सजनी मनाऊ? कैसे? |
| हास्य व्यंग्य | |
| शनिवार , , 30 सितम्बर | |
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सबसे पहले तो पाक शास्त्र की किताबों को कुछ दिन तक छुप छुप कर पढ़ा, और अन्तरजाल पर सारे पाक कला वाले जालस्थलों की खाक छान कर नमक और पिसी शक्कर तथा हल्दी और धनिये के पाऊडर में फ़र्क अच्छी तरह समझ लिया। एक दिन जब मोहतरमा किसी काम से बाजार गई हुई थी तब हमने मौका देख कर अपने उस सारे ईन्टरनेटिये ज्ञान को आजमाने का निश्चय कर लिया। सबसे पहले कुछ " मीठा हो जाये" की तर्ज पर हमने हलवा बनाने का निश्चय किया, अब संयोग से उस समय पुस्तक कहीं मिल नहीं पाई और हमने अपने मन से ही डरते- डरते हलवा बनाने की तैयारी कर ली, गेहुँ का आटा कढ़ाई में लेकर उसे सेकने लगे अब हड़बड़ाहट में यह याद नहीं आया कि घी को आटे को सेकने से पहले डालते है सिकने के बाद या आटे के साथ? सो हम आटे को बिना घी डाले ही सेकने लगे और जब आटे के सिकने की खुशबु आने लगी तो हमने घबरा कर की कहीं ज्यादा सिक जाने पर जल ना जाये; घी की बजाय़ पास में पड़ी गिलास में से पानी कढ़ाई में डाल दिया फ़िर थोड़ी देर के बाद जब पानी सूखने लगा हमने हलवे को पौष्टिक बनाने के लिहाज से चार बड़े चम्मच भर कर घी कढ़ाई में डाल दिया और बाद में चीनी भी डाल दी। और तभी एक बड़ी गड़बड हो गई और पत्नी घर वापस आ गयी, और रसोई में से आते हलवे की महक (आप कुछ भी कहो हम तो महक ही कहेंगे!) से सीधी रसोई में चली आयी और रसोई में बिखरे बर्तनों और बने हलवे को देख अपना माथा ठोक लिया। हमने बड़ी मासूमियत से उन्हे पूछा क्या हुआ? उन्होने कहा "मेरा सर"। हमने चुपचाप रसोई से बाहर निकलने में ही अपनी भलाई समझी। थोड़ी देर बाद पत्नी एक प्लेट में हमारा बनाया हुआ हलवा ले कर आयी और हमसे बड़े प्यार से हलवे को खाने के लिये आग्रह करने लगी, हम उनके चेहरे पर छाई मुस्कुराहट को देख कर और अपने प्रयोग को सफ़ल मान कर उन सारे अन्तरजाल पर पाक विधियाँ लिखने वाले लेखकों को मन ही मन धन्यवाद देते हुए एक चम्मच भर कर हलवा अपने मुँह में रखा और, अरे यह क्या यह तो हलवे की बजाय लाई बन गई थी जिससे हम बचपन में अपनी फ़टी किताबें चिपकाया करते थे, हमारे बिगड़े चेहरे को देख कर पत्नी जोर- जोर से हँसने लगी और फ़िर उस दिन उन्होने हमें पास में बिठाकर हलवा बनाना सिखाया। एक दिन फ़िर से मौका मिला इस बार पत्नी बाथरूम में थी और हमने नाश्ता बनाने का निश्चय किया बार हमने मीठे की बजाय कुछ नमकीन बनाने का सोचा और सुबह का समय था तो हमने उपमा बनाने का निश्चय कर लिया, इस बार हमने कोई गलती नहीं की। घी में बराबर सूजी को सेंक लिया, जब सूजी सिक गई और गुलाबी की जगह काले रंग की होने लगी हमने एक बार फ़िर से पानी डाल दिया, अब पानी कितना डाला था?..... फिर से निवेदन कृपया ऐसे कठिन सवाल ना पुछें! थोड़ी देर बाद पानी सूख जाना चाहिये था पर पानी नहीं सूखा और पत्नी बाथरूम से बाहर आ गई और हमारे बने सूजी की महक से खुश होते हुए हमसे पूछा, "आज क्या बना है नाश्ते में?” हमने कहा "उपमा" उन्होने सोचा कि उन्होने हलवा बनाना सिखाया था अत: उपमा भी सही बनाया होगा तो उन्होने रसोई में आकर हमारे बने उपमे को देखा और एक बार फ़िर से सर ठोक लिया, इस बार हमसे "क्या हुआ" पूछने की हिम्मत नहीं रही क्यों कि हमें पता था कि इस बार हमने उपमे की जगह राब यानि तरल उपमा बना दिया था, जिसे खाने की बजाय कप में भर कर पीया जा सकता था। इस बार तो हमारे इस नये पकवान का नामकरण भी नहीं हो पाया और सारा का सारा हमारे हाथों से ही फ़ैंक देना पड़ा, फ़ैंकते समय हमारे मन की हालत का आप अन्दाजा भी नहीं लगा सकते। एक बार वेब दुनियाँ पर सोन पापड़ी की विधी देखकर काले रंग की एकदम सख्त बर्फ़ी भी बनाई है, जिसे खाने की कोशिश में मेरा दाँत शहीद होते होते बचा है, तो एक बार बरतन मांजने की कोशिश भी करी, पर नाकामयाब रहे। एक बार पोछा लगाने का मन हुआ और पानी में फ़िनाईल की बजाय सिरका भी डाला है। हुँ ना मैं मासूम! कभी कभी लगता है लोग सही कहते हैं कि पत्नियों को अपने पति को इन्सान बनाने में बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। परन्तु मित्रों मैंने निश्चय कर लिया है कि एक दिन मैं अपनी पत्नी को अपने पाक ज्ञान का लौहा मनवा कर रहूँगा। जब अटल जी बिना विवाह किये भी गा सकते हैं " हार नहीं मानूंगा..." तो मैं क्यों नहीं?
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टिप्पणियाँ
(11)
अच?छा अन?भव है...हमारे काम आयेगा आगे कभी जिन?दगी मे...वैसे दावा कर सकता हूं कि आप से ज?यादा ही नम?बर लाऊंगा
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अच?छी कोशिश थी. कोशिश जारी रखि?, जब सीख जा? तो म??े भी चखा दिजि? गा.
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यह ज?ञान तो वाकई बड़े काम का है.
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परंत? मैं ?क और गहरा ज?ञान बांटना चाहता हू?. ?से मौकों पर मैं सीधे पत?नी को बाल बच?चों सहित शहर से दूर रोड साइड ढाबे में ले जाता हू?. शांत, ताजी हवा, और कोलाहल से दूर. और मामला स?ल? जाता है report abuse
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क?छ कीजि?.
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फ़ॉयरफ़ॉक?स पर टिप?पणिया? खंडित हो जाती हैं. कहीं फ़ॉन?ट जस?टीफ़ाई या स?पेसिंग दिया ह?आ है, कृपया उसे दूर करें. report abuse
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"परन?त? मित?रों मैंने निश?चय कर लिया है कि ?क दिन मैं अपनी पत?नी को अपने पाक ज?ञान का लौहा मनवा कर रहू?गा।"
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सही है, लगे रहो म?न?ना भाई. सफलता आपके कदम चूमेगी. श?भकामनाऎं. report abuse
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लगे रहो नाहरजी!!! वो पता नहीं कौन कह रहा था कि -
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कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ॰॰॰ पत?नी को ख?श रखों तो "बेलन" नहीं पड़ती ॰॰॰ report abuse
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ही ही... चलो भईया आपकी क्लास ले लेती हूँ, बहूत अच्छा तो नही पर कुछ तो बनाने आता ही है... मजा आया पढ के
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उम्मीद करते है की अब हलवा और उपमा बनाना आ गया होगा। अगर नही तो भविष्य के लिए शुभकामनायें ।
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apka anubhav jaisa bhi tha par yaad ban gaya aapke aur aapki wife ke liya hamare liya manoranjan
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apka halwa aur upma ise kam to aa hi gaya.... report abuse
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