| भारतीय सोप ओपेरा के दिलचस�?प गणित – 2 |
| टेलीविज़न | |
| शुक्रवार , , 06 अक्टूबर | |
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पिछली कडी में आपने पढा था कि किस तरह से निर�?माता अपने सोप ओपेरा यानि कि हर रोज आने वाले धारावाहिक की हर दिन की कहानी को रोज ब रोज लिखकर और बेवजह समय बरबाद कर कर उसे चला�? रखता है।
आज हम देखते हैं कि आखिर कौन से �?से ज�?गाड हैं जो अनंत काल तक चलते रहने वाले इन धारावाहिकों की लोकप�?रियता को टिका�? रखते हैं।
हर दिन गढी जाने वाली कहानी, �?क ही तरह की घटना�?�?, बेवजह के शोर शराबे और बिना किसी व�?यवस�?थित कहानी के भी कोई धारावाहिक किस तरह से सफल हो सकता है?
यह कई तरह से हो सकता है। लोगों की भावनाओं का फायदा उठाकर, दर�?शकों को नियमित रूप से चौंका कर, बेवजह ही सही पर सस�?पेंस बनाकर धारावाहिक की लोकप�?रियता को टिकाया रखा जा सकता है। नीचे दि�? ग�? क�?छ ज�?गाडों को देखि�?:
· सबसे अच�?छा फार�?म�?ला है किसी लोकप�?रिय पात�?र को मार देना। इसका सबसे पहला और सबसे सफल प�?रयोग �?कता कप�?र ने अपने अब तक चल रहे धारावाहिक “क�?योंकि सास भी कभी बह�? थी”, में मिहिर को मारकर किया था। मिहिर की मौत देशभर में चर�?चा का विषय बन गई थी और धारावाहिक की लोकप�?रियता का गिरता ग�?राफ �?क ही �?टके में आकाश छ�?ने लग गया था। जैसी कि आशंका था, मिहिर मरता नहीं है और �?क लम�?बे अंतराल के बाद फिर से लौट आता है। और इस बीच कई सारे �?पिसोड उसकी याददास�?त जाने फिर से आने और गफलत और धिक�?कार और प�?यार और तकरार में बीत जाते हैं। · �?कता कप�?र ने द�?सरा फार�?म�?ला दिया प�?लास�?टिक सर�?जरी का। किसी पात�?र को द�?र�?घटना में घायल कर दो और फटाफट टी.आर.पी बटोर लो। फिर उस पात�?र की प�?लास�?टीक सर�?जरी करवाकर हावभाव, कद, आवाज सब क�?छ बदल दो। इससे दर�?शकों को जो चाहि�? वो चेंज भी मिल जाता है। आखिर �?क ही �?क पात�?र को कोई कब तक �?ेले? और फिर �?क पात�?र जब प�?रसिद�?दि के शिखर पर पह�?�?चने लगता है तो उसके नखरे भी द�?गनी तेजी से चढने लगते हैं। तब �?क सफल निर�?माता वही होता है जो उस पात�?र को ही बदलकर नया पात�?र ले आ�?। दर�?शकों की याददास�?त कमजोर होती है। थोडे �?पिसोड के बाद वह नया पात�?र ही वास�?तविक लगने लगता है। और फिर पात�?र बदने जाने की जो बातें उडती रहती है उसका फायदा भी तो होता है। चाहे कोई मजाक में ही कह दे कि “भई वो धारावाहिक देखा! प�?रा करेक�?टर ही बदल दिया प�?लास�?टिक सर�?जरी के नाम पर। क�?या ब�?द�?ध�? बनाते हैं यह लोग! जरूर देखना।“ बस काम बन गया, क�?छ और दर�?शक ज�?टा लिये ग�?। क�?या फर�?क पडता है कि लोग मजाक उडाते हैं। अच�?छा ही है लोग इस बहाने धारावाहिक देख देख कर टी.आर.पी. को बना�? रखते हैं। · �?क तरीका है दर�?शकों को विदेश की सैर करा आने का। बहाना क�?छ भी हो सकता है, मसलन, �?क बिजनेस मिटिंग के लि�? सिंगाप�?र घ�?म आओ। साथ में प�?रे घरवाले, नौकर और हा�? द�?श�?मन भी होंगे। प�?रे कार�?यक�?रम के दौरान मिटिंग के अलावा सब क�?छ होगा। दर�?शकों को विदेश भ�?रमण म�?फ�?त में मिल जा�?गा। और निर�?माता का काम बन जा�?गा। · �?क तरीका है न�? न�? किरदार शामिल करते जाने का। जब भी लगने लगे कि अब धारावाहिक लोकप�?रियता गिरने लगी है, फटाफट चार पा�?च न�? किरदार शामिल कर लि�? जाते हैं। ये किरदार कोई भी हो सकते हैं, पूर�?व प�?रेमी की संतान, या भविष�?य के प�?रेमी की संतान, या पहले वाले पति की नाज़ायज औलाद या नई ननद या नई सास। कोई भी हो सकता है।
· �?क और तरिका है, समय को आगे ले जाने का। इसका सफल प�?रयोग बालाजी टेलिफिल�?मस के धारावाहिकों में होता रहता है। “क�?योंकि सास भी कभी बह�? थी” धारावाहिक में तो �?सा दो बार ह�?आ है जब कहानी को 20 साल आगे ले जाया गया। इस बदलाव में बाकि सब क�?छ वैसा ही रहता है, वही मोबाईल, वही गाडिया�?, वही अंग�?ठीया�?, वही कारोबार और वही बिन�?दीया�?। बस किरदारों के बाल थोडे से सफेद हो जाते हैं, और न�? कलाकारों की फौज आ जाती है। · �?क और तरीका होता है समय समय पर सरप�?राइज देने का। कभी किसी सेलिब�?रीटी को ले आओ �?क �?पिसोड में और प�?रे महिने प�?रचारित करो। यह भी कई बार कारगर होता है।
इसके अलावा और भी कई तरीके होते हैं। कई न�? तरीके इजाद कि�? जाते हैं। कई प�?राने तरीकों को दोहराया जाता है। और इस तरह से हमारे भारतीय सोप ओपेरा अनंत काल तक चलते रहते हैं। पर �?सा हर बार नहीं होता। कई बार सारे अस�?त�?र विफल हो जाते हैं, टी.आर.पी. गिरती ही रहती है। तब क�?या करना चाहि�?? क�?छ नहीं धारावाहिक बन�?द कर देना चाहि�?, आखिर हर धारावाहिक “क�?योंकि..” नहीं हो सकता!!
टिप्पणियाँ
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वाह, भाई पंकज.
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अब तो सभी ग?र सिख गये. अब तो ?क सिरियल बना ही डालो लगे हाथ. report abuse
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बह?त स?न?दर पंकज भाई,
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आप सोप ओपेरा के विशेषज?ञ है, इसलिये क?छ प?रश?न है जरा जानकारी ब?ाने में मदद करिये। १. प?लास?टिक सर?जरी से चेहरा तो बदल सकता है पर आदमी की लंबाई- चोड़ाई और आवाज कैसे बदल जाती है? २. कहानी को बीस साल आगे ब?ाने के बाद भी क?छ पात?र वैसे के वैसे ही कैसे दिखते हैं जैसे- क?यों कि.... की बा और रमोला सिकन?द ? ३. हर धारावाहिक की कहानी में नकारात?मकता क?यों होती है? जैसे लड़ाई, ?गड़ा और षड़यन?त?र; क?यों सैलाब जैसी कहानियों पर धारावाहिक अब नहीं बनते। क?छ और भी प?रश?न है जो अभी याद नहीं आ रहे....लगता है याददाश?त ग?म हो रही है। बिल?क?ल चली जाये इससे पहले विदा लेते हैं। अग?ली कड़ियों में क?छ और पूछेंगे। report abuse
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आप सभी का धन?यवाद।
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सागर भाई: 1. वास?तव में ?कता कप?र जैसी निर?मात?रीयों की मानसिक सर?जरी जरूरी है.. जो ?से उलजलूल बाते दिखाती हैं। पर दोष उनका भी नहीं, दर?शकों का है। आखिर वे देखते क?यों है? मजा तो उनको भी आता है!! 2. मत प?छि?.. कई नकचढे कलाकार होते हैं जो अपने बाल सफेद करवाने के सख?त खिलाफ होते हैं.. । और फिर दर?शकों को कोई फर?क नही पडता। इतना लोजिकल होने की जरूरत क?या है? 3. क?योंकि लोग यही देखना चाहते हैं! नही तो दर?शक देखना बन?द कर देते तो ?से बेह?दा धारावाहिक भी बन?द हो जाते। report abuse
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टेलिविजनके सोप ओपेरा मनोवैज?ञानिकर?पसे जो हानि पह?ंचा रहे है उसका असर फिलहाल तो नहीं पर आनेवाले सालोंमें नजर आयेगा|उसमें दिखाइ देनेवाली भव?यता के कारण लोग फिजूलखर?ची पर आमादा हो रहे हैं|ऋण तक लेकर वह बनावटी भव?यता घर पर ले आते हैं और किश?तें भरनेंमें आमदानी का फिज?ल द?र?व?यय करते हैं|यह किश?तें ?कता कपूर भरपाई करेगी? समय,बिजली, स?वास?थ?य,दिमागकी सत?यानाशी के गणित का सबूत यानी सोपओपेरा...
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आपने तो अच?छा शोध किया है सोप ओपेरा पर|
कहीं भविष?य में हमें आपके बनाये धारावाहिक तो नहीं दिखने वाले हैं? क?योंकि सारे फॉर?म?ले तो आप जान ही गये हैं|