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शेर को सलाम [सरदार पटेल जयंती विशेष]
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 3
बेकारअति उत्तम 
द्वारा/by : संजय बेंगाणी   
सोमवार , , 30 अक्टूबर

 

31 अक�?ट�?बर :: सरदार पटेल जयंती 

 

केलिफोर�?निया यूनिवर�?सिटी की �?क प�?स�?तक लीडरशिप �?ण�?ड पोलिटीकल इंस�?टीट�?य�?टशन इन इंडियामें �?क जगह लिखा हैं की भारतीय राष�?ट�?रवाद के गा�?धी जहा�? पैगम�?बर समान थे वहीं नेहरू फिलोशोफर थे, जबकि पटेल �?क समर�?थवान प�?रबन�?धक तथा आयोजक थे.

 

 

आज जब सेक�?य�?लरिज़म के नाम पर आतकंवाद को अल�?पसंख�?यकवाद के चश�?मे से देखने की ललितकला का विकास हो रहा हैं, भारत की छवि विकाराल आंतकवाद से सामना करते �?क  कमजोर देश की बनती जा रही हैं, �?से में जिस �?क व�?यक�?ति को सबसे अधिक याद करने कि इच�?छा होती है वे हैं सरदार वल�?लभभाई जवेरभाई पटेल. वे कभी भी धर�?मनिरपेक�?षता के नाम पर �?ूठ बोलने को तैयार नहीं ह�?�?. उनका सत�?य ख�?रद�?रा सत�?य था.   

 

 

लेखक ख�?शवंत सिहं के अन�?सार सरदार पटेल का स�?थान इतिहास में सदा स�?रक�?षित रहेगा क�?योंकि उन�?होने भारत के 562 रजवाड़ो को भारत के संघराज�?य में विलीन होने के लि�? मजबूर कर दिया था, जबकि कश�?मीर में भारत का पलड़ा भारी होते ह�?�? भी नेहरू ने इस प�?रश�?न को सय�?ंक�?तराष�?ट�?र में ले जानी की मंज�?री दे दी थी.  आज पीछे म�?ड़ कर देखते हैं तो लगता हैं पटेल सही थे और नेहरू गलत. तब सरदार पटेल को षड�?यंत�?रप�?र�?वक कट�?टरपंथी तथा म�?स�?लिमविरोधी साबित करने का अभियान नेहरू समर�?थक कृष�?ण मेनन तथा म�?म�?बई के �?क साप�?ताहिक ने चलाया था. इन आरोपो में सत�?य का कोई स�?थान नहीं था. सरदार उतने ही धर�?मनिरपेक�?ष थे जितने कि नेहरू (संदर�?भ: आउटलूक का 19-8-2002 का अंक).

 

 

जनरल थोराट ने �?कबार वल�?लभभाई से कहा था की आप तो सरलता से प�?रधानमंत�?री बन सकते थे, तब उन�?होने बताया की मैं तो सरलता से प�?रधानमंत�?री बन जाता पर नेहरू यह आघात सह नहीं पाते, अगर उन�?हे क�?छ हो जाता तो यह मैं नहीं सह पाता. फिर इस नवजात देश को कौन सम�?भालता? जब कोई कोंग�?रेसी प�?रधानमंत�?री पद के लि�? नेहरू का नाम आगे करने को तैयार नहीं था तब भी गा�?धीजी ने यह कहते ह�?�? नेहरू को पसन�?द किया की हमारे केम�?प में ये �?क ही अंग�?रेज हैं जो अंतरराष�?ट�?रीय मामलो में पटेल से ज�?यादा कारगर सिद�?ध हो सकता हैं.

 

 

यह सही हैं की पटेल के म�?काबले नेहरू पाश�?चात�?य सभ�?यता में ज�?यादा ही डूबे ह�?�? थे, जबकि पटेल भी इंग�?लेंड से बेरीस�?टर बन कर लौटे थे तथा �?क सफल वकील रह च�?के थे. बौधिक सक�?षमता में वे भी किसी से कमतर नहीं थे. पर उनका व�?यक�?तित�?व ठेठ भारतीय था. शायद इसीलि�? उन�?हे किसानो का नेता भी कहा जाता था.

 

 

नेहरू के साथ �?सा नहीं था. �?क बार (13-9-1950) घनश�?यामदास बिड़ला ने पटेल से कहा भी था की अगर गा�?धीजी के सम�?पर�?क में न आते तो नेहरू के समग�?र परिवार ने इस�?लाम को अपना लिया होता (संदर�?भ : इन साइड स�?टोरी ऑफ सरदार पटेल : दी डायरी ऑफ मणीबेन पटेल)

 

 

अपने अंतिम समय में राजगोपालाचारी ने कहा था की नेहरू को प�?रधानमंत�?री निय�?क�?त करने के निर�?णय का समर�?थन करना शायद मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. अगर नेहरू विदेशमंत�?री तथा पटेल प�?रधानमंत�?री होते तो भारत का नक�?शा आज क�?छ और ही होता. मौलाना आज़ाद को भी लगता था की उन�?होने �?तिहासिक भूल की थी.  

 

 

इसे सौभाग�?य ही कहा जा�?गा की वे भारत के गृहमंत�?री बने. भारत को �?क राष�?ट�?र का रूप देने के लि�? 562 रजवाड़ो का साम-दाम-दंड-भेद की नीति से जिस प�?रकार उनके द�?वारा विलय किया गया वह विस�?मय जगाता हैं, इसलि�? आश�?चर�?य नहीं होता जब आज भी अधिसंख�?यक लोग मानते हैं की अगर वे प�?रधानमंत�?री बने होते तो नेहरू से बेहतर परिणाम दे पाते. यह उनकी दृढ़ इच�?छाशक�?ति तथा नीडरता का ही परिणाम था.

 

 

�?सी ईच�?छाशक�?ति उनके विद�?यार�?थीकाल की इस घटना में भी देख सकते हैं. तब हाईस�?कूल की प�?ाई के लि�? वल�?लभभाई को अपने ननिहाल नडियाद आना पड़ा था. वहीं उनके �?क शिक�?षक थे महानंदजी, जो विद�?यार�?थीयों में काफी लोकप�?रिय थे.

 

 

�?कबार नगरपालिका के च�?नावों में महानंदजी ने भी हिस�?सा लिया, परंत�?ं जिस वार�?ड से वे च�?नाव लड़ रहे थे उसी वार�?ड से दौलतमंद देसाई परिवार का �?क सदस�?य भी च�?नाव लड़ रहा था. यानि �?क आम शिक�?षक का अब इस च�?नाव में जीतना बेहद म�?श�?किल हो गया था. परिस�?थिति अन�?रूप देसाई ने भी अंहकारवश च�?नौती दे डाली की अगर मास�?तरजीत जा�? तो वह अपनी म�?छें म�?ंडवा लेगा. बात पूरे शहर में फैली तो महानंदजी के हौसले भी पस�?त होने लगे. वल�?लभभाई ने जब यह बात स�?नी तो उन�?होने देसाई को सामने से च�?नौती दे डाली, कि मैं तभी सच�?चा शिष�?य कहलाउंगा जब अपने ग�?रू को जितवा कर देसाईजी की म�?छें म�?ंडवाउंगा.

 

 

वल�?लभभाई ने विद�?यार�?थीयों को इक�?कठा किया और घर घर जा कर अपने शिक�?षक के लि�? प�?रचार किया. लोगों को उन�?हे वोट देने के लि�? सम�?ाया. इसका परिणाम यह आया की मतदान के दूसरे दिन जब नतीजे आ�? तो महानंदजी ने ज़बरदस�?त जीत प�?राप�?त की. मतगणना केन�?द�?र के पास विद�?यार�?थीयों ने हर�?षध�?वनि की तथा �?�?ंड बना कर चल पड़े देसाईभाई की म�?छे म�?ंडवाने. साथ में नाई को भी ले लिया.

 

 

देसाई के घर पह�?ंच वल�?लभभाई के उन�?हे ललकारा की बाहर आकर अपनी म�?छें म�?ंडवा ले. देसाई बाहर नहीं निकले तो क�?छ उत�?साही य�?वकों ने उनके घर में घ�?स कर उन�?हे बाहर ले आना चाहा. तब वल�?लभभाई ने स�?थिति को सम�?भालते ह�?�? सम�?ाया की डर कर घर से न निकलने वाले की म�?छे वैसे भी नीची हो जाती हैं, जो म�?ंडवाने बराबर हैं. इसलि�? हमारा काम तो हो गया, आओ अब मास�?टरजी को बधाई देने चलें.

 

�?सी ही �?क और घटना हैं. 1942 की जेलयात�?रा के बाद सरदार च�?नावों की तैयारी में लगे ह�?�? थे. प�?रभाव नेहरू का ज�?यादा था पर कोंग�?रेस में हाइकमान पटेल थे. उन�?होने विदर�?भ के �?क प�?रत�?याशी का नाम टिकीट-सूची से रद�?द कर दिया. द�?सरे ही दिन वह प�?रत�?याशी पटेल के घर आ पहू�?चा. उसने वल�?लभभाई के सचिव शांतिलाल शाह से कहा की अब वह किसी को म�?�?ह नहीं दिखा पा�?गा अतः घर लौट कर आत�?महत�?या करना चाहता हू�?, बस यही बात बताने आया हू�?. सरदार पटेल तब नाश�?ता कर रहे थे. यह संदेश स�?ना तो उन�?होने पास पड़ा फल काटने का चाक�? शांतिलाल के हाथ में दिया और ठंडे स�?वर में कहा, उसे कह दो घर जाने की कोई आवश�?यकता नहीं हैं, यहीं इससे आत�?महत�?या कर ले. 

 

 

च�?नौती को स�?वीकारने तथा अपनी ईच�?छा अन�?सार परिणाम पाने की क�?षमता ने उन�?हे लौह-प�?रूष बना दिया था.

 

 

अखडं भारत के निर�?माता को तरकश की ओर से भावभीनी श�?रद�?धांजली.

 

टिप्पणियाँ (6)add
सरदार
द्वारा प्रेषित नाहर , अक्टूबर 30, 2006
सरदार पटेल को भावभीनी श?रद?धांजली,
देखते हैं कल कितने चैनल और अखबार याद करते हैं सरदार को।
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सरदार पटेल
द्वारा प्रेषित समीर लाल , अक्टूबर 30, 2006
सरदार पटेल को हमारी भी भावभीनी श?रद?धांजली.
संजय भाई, इस मौके पर इतना उपय?क?त लेख लाने के लिये आपको साध?वाद.
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द्वारा प्रेषित नीरज दीवान , अक्टूबर 31, 2006
अभियान नेहरू समर?थक कृष?ण मेनन तथा म?म?बई के ?क साप?ताहिक ने चलाया था. आउटल?क का ये अंक तो पठनीय होगा. आपने ?तिहासिक संदर?भों का उल?लेख कर इस लेख में जान डाल दी है. पटेल की शख?सियत काबिल ? तारीफ़ रही है. म??े सरदार फ़िल?म भी अच?छी लगी थी. यह सौभाग?य की बात रही कि हमें उनके जैसा गृहमंत?री मिला. किंत? नेहरू-पटेल के संबंध उतने तल?ख नहीं थे जितना कहा जाता है. इसके लि? पटेल के लिखे पत?रों से ज़ाहिर होता है. अलबत?ता वे लोग जो इन दोनों नेताओं के बीच खाई गहराने की कोशिश करते हैं उनको पटेल ने समय समय पर खूब ?िड़का था. खैर, ये तो खत?म न होने वाली बहस है. सरदार पटेल को मेरी श?रद?धांजली और लेख के लि? आपको धन?यवाद.
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सरदार वल?ल
द्वारा प्रेषित अनूप श?क?ल , अक्टूबर 31, 2006
बह?त अच?छा लगा यह लेख प?ना. अब जब नेहरू और पटेल दोनों नहीं हैं तो इस पर केवल चर?चा ही की जा सकती है. लेकिन यह सच है कि अगर सरदार पटेल नहीं होते तो देश इतना ?कज?ट नहीं होता जितना आज है. वे महान नेता, देश सेवक और अन?शासित कार?यकर?ता थे. नेहरूजी का व?यक?तित?व चमत?कारिक था. लेकिन वे कल?पनाजीवी थे जबकि पटेल व?यवहारिक थे.उनको अल?पसंख?यक विरोधी कहना फालतू की बात है. जैसे-जैसे समय बीतता जाता है वैसे-वैसे म??े क?छ ?सा लगता जा रहा है कि शायद महात?मा गांधी जी भी मध?यवर?गीय हीनता बोध से क?छ ग?रस?त थे और देशी नेताऒं के म?काबले विदेशी से लगने वाले लोगों की चकाचौंध से प?रभावित हो जाते थे.यह द?ख की बात है कि सरदार पटेल जल?दी चले गये वर?ना शायद क?छ और पन?ने ज?ड़ते देश के इतिहास में. बधाई इतने अच?छे लेख के लिये.
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द्वारा प्रेषित भ?वनेश , नवम्बर 01, 2006
संजय भाई अच?छा लेख है
लौहप?र?ष को मेरी भी श?रद?धांजलि।
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सरदार पटेल
द्वारा प्रेषित अमित पिसाव , नवम्बर 04, 2006
महान नेता सरदार वल?लभभाइ को श?रद?धांजली !
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