| चली चली रे पतंग मेरी चली रे... |
| धर्म एवं मान्यताएँ | ||||||||||
| बुधवार , , 10 जनवरी | ||||||||||
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टिप्पणियाँ
(5)
माफ़ करना पंकज भाई अभी टिप?पणी नहीं कर पाऊ?गा, पतंग तैयार है, छत पर जा रहा हू?, वापस आकर करता हू?
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सक?रान?ति या उत?तरायण से ज?ड़ी कितनी ही यादें आ?खों के सामने आ गयी है। काश हम भी ग?जरात में होते
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?क बात जमी नहीं उंधियो का जिक?र हो और सूरत का जिक?र ना हो, भाई उंधियो सूरत की खास वानगी है जो कतारगाम की पापड़ी के बिना नहीं बनती। म??ह में पानी भर आया नाम स?नकर ही। report abuse
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अब तो इसी दिन के आसपास का प?रोग?राम बनाना पड़ेगा. वैसे तो पतंगबाजी का यह दिन म?ंबई मे प?ते समय बड़े जोर शोर से मनाते देखा है, मगर तब भी ग?जरात के किस?से स?ना करते थे.
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-ब?ियां विस?तार से जानकारी दी है, बधाई. report abuse
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पंकजभाई,
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ग?जरातसे यह चिठ?ठा भेज रही हूं| उत?तरायण के पर?व पर ?क स?ंदर ?वं संपूर?ण लेख पढकर अत?यंत ख?शी ह?ई| मैं वडोदरामें रहती हूं| ऊधियाके साथ गरमागरम जलेबियां खाने का चलन है|इसके साथ तिल,मूंगफली,स?खेनारियल ?वं ग?ड या चीनी की चाशनीमें बनी चिक?कीया,बेर,गन?ने खाने का चलन है,जी हां उपर पतंग उडाते ह?? यह सब खाने का मजा ही क?छ और है| स?बहमें प?रे गेह?? को अच?छी तरह उबालके उसमें ग?ड ?वं घी मिलाके गायों को खिलाने की भी महिमा है| पूरे दिन ह?डदंग मचाने के बाद श?रू होती है आतिशबाजी,जिसमें तकरीबन दो घंटे तक आकाश रंगबिरंगी पटाखों की रोशनी से भर जाता है,लगता हो जैसे आज फिर दिवाली आ गयी हो! सच १४ ?वं १५ जनवरी को लोग जैसे पतंग के जरिये भगवान को प?रेमपत?र लिख रहे हो!... report abuse
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