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मुल्लाह की दौड!
हास्य व्यंग्य
बुधवार , , 21 फ़रवरी

 

 शुएब द्वारा



जिन्दगी के मिठे दर्द : भाग 1
 
 
 

सुबह की दौड

 

दांत का दर्द, पेट का दर्द उसके बाद सर दर्द - ये तीनों रोग ऐसे कि शायद ही कोई बर्दाश्त कर पाए। मगर क्या आपने कभी महसूस किया कि जब आंखों की पलकों पर मच्छर या मक्खी काट ले तो उस पर खुजाने का कितना मज़ा आता है। दिल आ हा हा  करता है और जी चाहता है पूरा दिन खुजाते ही रहें और फिर आंख का आलू बन जाता है।

 

 

हमारे मोटापे पर तरस खाकर जमाल भाई ने हम से कहा कि रोजाना शाम को वाक पर जाया करो। हमने भी वही पुरानी घिसिपिटी बात रख दीः टाईम कहां मिलता है? क्योंकि इसके अलावा दूसरा कुछ बहाना नहीं मिला तो टाईम को ही बीच मे ले लिया। अमां यार सुबह सात बजे उठता हूं, नहा धोकर ख़ुद का नाश्ता बनाता हूं, दफ्तर के लिए कपडे इस्त्री करता हूं और यहीं पर आठ बज जाते हैं फिर दफ्तर से वापस आते आते रात के आठ बज जाते हैं; खाना वाना पकाना होता है और यार टीवी पर कुछ ख़बरें भी देखनी होती हैं फिर घडी पर नज़र डालो तो रात के बारह बज चुके होते हैं। अब भला बताओ ऐसी भागमभाग भरी ज़िन्दगी मे वाक पर जाने के लिए वक़्त कहां से निकालें। पूरे दिन भर का किस्सा सुनकर जमाल भाई ने बताया कि मोटापा कम करने का एक और आसान तरीका है, जिसे सुनकर हम बहुत ख़ुश हुए चलो इस मोटापा से कुछ ना कुछ छुटकारा तो मिलेगा ही।

 

 

रोज की तरह दफ्तर से घर आए, अपनी बिल्डिंग मे दाखिल होने के बाद लिफ्ट के लिए इन्तज़ार कर ही रहे थे कि अपने जमाल भाई का बताया तरीका याद आया। चूंकि अपना फ्लैट बारहवें (१२) फ्लोर पर है - फिर दिल ही दिल मे मज़ेदार चुटकुले रटते हुए सीढियां चढना शुरू जो किया...... तौबा बडी मुश्किल से छः माले ख़तम हुए, पैर कांपने लगे, ज़ोर ज़ोर से सांस फूल रही थी चुटकुले छोड कर मन ही मन मे तरीका बताने वाले जमाल भाई को कोसना शुरू कर दिया। अब सातवें माले की ओर सीढ़ियां देखते ही पैर और ज़ोर से कांपने लगे। अपने मोटापे पर एक नज़र डालीः ये तो अपनी मेहनत की कमाई का फल है मियाँ, मन ही मन मे मुस्कुराते हुए छटवें माले का दरवाज़ा खोला और कांपते हुए पैरों से तेज़ तेज़ क़दम उठाते हुए सीधे लिफ़्ट का दरवाज़ा खोला, शुक्र है लिफ़्ट यहीं रुकी हुई थी फिर बारहवें फ़्लोर का बटन दबाकर नीचे लिफ़्ट मे ही पैर फैलाकर बैठ गए।

 

 

दूसरे दिन दफ्तर मे जमाल भाई ने हमारा किस्सा सुना तो बोखलाए और गुस्से से कहाः ठीक है जाओ जीयो अपनी ज़िन्दगी, मैं तो तुम्हारे अच्छे के लिए बोला था, अपना पेट देखो। भाड मे जाओ, गुब्बारा बन जाओ वगैरह वगैरह। हम दिल ही दिल मे ख़ुश हुए कि चलो जान छुटी लाखों पाए वरना हम यही सोच रहे थे कि हमारा किस्सा सुनकर जमाल भाई फिर कोई नया तरीका बताएँगे। अपनी सीट पर बिराजमान होते ही आँफिस ब्वाय को आवाज़ दीः दौड कर जा और जल्दी से दो समोसे और एक चाय पकड ला। सामने बैठे असलम भाई ने घूर कर देखा फिर बोलेः अमां यार रोज़ रोज़ इतने समोसे ना खाया करो, कम से कम अपने मोटापे पर तरस खाओ - अपनी उम्र देखो अपना पेट देखो तकरीबन छः माह की महिला दिखाई दे रहे हो। सुबह सुबह असलम भाई के मुँह से अपने लिए कडवी कसैली बातें सुनकर जी कर रहा था उनकी छाती पर बैठ कर पूछूं कि मैं अपनी कमाई खा रहा हूं ना कि आपकी? और खबरदार जो फिर कभी मेरे खाने पीने मे टांग उडाई तो...... मगर असलम भाई उम्र मे काफी बडे आदमी हैं पूरे दफ्तर मे सब उन्हें इज़्ज़त देते हैं क्योंकि उनकी बातों मे वज़न होता है। जो भी हो मगर ऐसा नहीं करना चाहिए कि कोई खाए पिये तो उसे टोके। भाई जब पैसा कमाते हैं तो खाएंगे ही ना।

 

 

आगे सुनिए, मुहल्ले की मस्जिद से नमाज़ पढ़ कर बाहर निकले तो मुल्लाह साहब जो, मोटापे मे हमारी बराबरी के हैं, ने हमें देख कर आवाज़ लगाई तो हम अपने मुँह मे ही कुडकुडाए ताँबा अब ये जनाब आधा घंटा हमारा सर खाएंगे। मस्जिद के बहुत बडे मुल्लाह थे इस लिए हम ने कहाः सलाम मौलवी साहब। मुल्लाह जी ने जवाब दियाः वआलईकुम सलाम मियाँ - कहां हो भाई बहुत दिनों से दिखाई नहीं दिए और ये क्या काफी दुबले पतले हो चुके हो........ मुल्लाह साहिब के इस तरह मुख़ातिब पर ताजुब हुआ दिल मे ख़याल आया कि कहीं ये हमारा मज़ाक तो नहीं उडा रहे? फिर दिल ने कहाः अरे नहीं नहीं ये तो बहुत अच्छे मुल्लाह हैं और हमें क्या कोई दुबला पतला कह कर हमारी तारीफ कर दे।

 

 

हम ने रोनी सूरत बनाकर कहाः हां मुल्लाहजी, क्या बताएं कि तबियत नासाज़ रहती है दफ्तर मे इतना काम होता है कि घर पहुंचते पहुंचते काफी देर हो जाती है और आजकल तो अपनी नमाज़ भी देर हो रही इसी वजह से आपसे मुलाक़ात नहीं हो पाती। और फिर घर के दफ्तर के कामों मे टाईम नहीं मिलता कि अपनी सेहत पर ध्यान दे पाऊँ और शायद इसी वजह से अपना मोटापा भी कम होता नज़र आ रहा है। मोटापा का नाम सुनते ही मुल्लाह साहब के कान खडे हो गए - मियाँ हम भी अपने मोटापे से काफी परेशान हैं, अपनी बीवी बच्चों के बाद अब मुहल्ले वाले भी हमारे इस मोटापे पर उँगलियॉ उठा रहे हैं। मुल्लाह साहब ने हमारी तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देखते हुए कहाः इस मोटापे को जड से उखाड फेंकने के लिए कोई तरीका बताओ मियाँ - एक तो मुहल्ले के लोग हमें दावतों पर बुलाकर ख़ूब खिलाते हैं और उलटा पीठ पीछे हमारे मोटापे पर हंसते भी हैं।

 

 

हम ने अपनी घडी पर नज़र डाली फिर मुल्लाहजी से पीछा छुडाने के लिए उन से सिर्फ इतना कहाः आप सबेरे जब नमाज़ के लिए उठते हैं मगर कल से एक घंटा पहले ही जाग जाएं और एक लम्बी वॉक ले आएं - अच्छा जी अब मैं निकलता हूं, ख़ुदा हाफिज़। मुल्लाह साहब ने भौएँ सिकोड कर झट से हमारा हाथ थामते हुए पूछाः ये तो बताते जाओ कि ये 'वाक' किस बला का नाम है। दिल तो चाहा कि अपना माथा पीटें, हम ने मुल्लाहजी को अपनी  ज़हरीली मुस्कान के साथ बतायाः 'वाक' यानी चहलक़दमी। मुल्लाह साहब ने तुरंत कहाः अच्छा वोहह.... मियां ये तो दिन भर तो मैं करता ही हूं। हम ने कहाः मुल्लाह जी, दिन भर का वाक और सबेरे के वाक मे काफी फ़र्क है। मुल्लाह साहब ने कहाः छोडो मियाँ जब तुम साथ हो तो वाक क्या चीज़ है। हमारे मूंह से फौरन निकलाः हाएं मैं? मुल्लाह साहब ने कहाः हां हां मियां तुम और मैं रोज़ाना नमाज़ से पहले सुबह साढे चार बजे वाक कर लिया करेंगे और यूं ही ताज़ा ताज़ा गुफ्तगू भी हो जाएगी, ही ही। मुल्लाह साहब की बात पर इनकार नहीं कर सकते वर्ना वो पूरे मुहल्ले वालों को हमारी काहिली के बारे मे बता देंगे। हम ने सिर्फ गरदन हिला कर कह दियाः हां जी ज़रूर। मुल्लाह साहब ने ऊंची आवाज़ मे कहाः तो हम सुबह ठीक चार बजकर पंद्रह मिनट पर उठ जाएंगे और ठीक साढे चार बजे तुम्हारे घर आकर तुम्हें जगा देंगे। ठीक है मियां, चलो बहुत देर करदी ख़ुदा हाफिज़।

 

 

घर पहुंच कर सोचते ही रहे ख़ुदा ना करे मुल्लाह साहब सचमुच सुबह साढे चार बजे वारिद हो जाएं। क्या ख़ाक़ हम ने ही तो आईडिया दिया था 'वाक' का। और हम ने कभी सुबह का सूरज तक नहीं देखा, याद भी कि कब सुबह का सूरज देखा। रात सोते सोते भी यही सपने आ रहे थे कि मुल्लाह साहब हमें जगा रहे हैं - एक बार मुल्लाह साहब की आवाज़ सुनकर हम हडबडा कर उठ बैठे, घडी देखा तो अभी रात के दो बज रहे थे। फिर सोए तो एक और सपना देखा मुल्लाहजी के साथ हम दीवानावार भागे जा रहे हैं और मुल्लाहजी हम से कह रहे हैं कि और तेज़ भागो मियां और तेज़। हम भागते ही रहे अचानक फिसल कर गिर पडे तो बिस्तर से उठ बैठे, देखा तो ये सुबह सात बजे का अलार्म था। उठने के बाद हालत ऐसी थी कि सचमुच 'वाक' से लौटे हों। तभी घंटी बजी तो दरवाज़े पर मुल्लाह साहब की सबसे छोटी बच्ची ने आकर कहाः अब्बाजी आप को याद कर रहे हैं फोरन आने को कहा है आपसे। इतना कह कर वो भाग गई।

 

 

हमें कुछ समझ नही आया कि माजरा क्या है? ऊपर से परेशानी ये कि मुल्लाह साहब ने वादे के मुताबिक़ हमें जगाने भी नहीं आए। जल्दी जल्दी नहा धोकर बगैर नाश्ते के अपनी स्कूटर को मुल्लाहजी के घर की तरफ घुमा दिया। घर पहुंच कर देखा तो मुल्लाह जी अपने बिस्तर पर लेटे आहें भर रहे थे, उनकी बीवी उन्हें ज़बरदस्ती दूध पिला रहीं थीं, मुझे देखा तो वो फोरन अंदर चली गईं। हम ने मुल्लाह जी को सलाम किया तो उन्होंने कराहते हुए कहाः आओ मियां। फिर मुल्लाह जी ने अपने ऊपर से कम्बल हटाते हुए दिखायाः देखो मियां क्या हाल हुआ है!!!! हमारी आंखें चर हो गईं, मुल्लाहजी के घुटने, हाथों की कहनियों और माथे पर मरहम लगा हुआ था, हम ने एक ही सांस मे पूछाः मुल्लाहजी ये सब कैसे, कहां कब और क्यों हुआ? मुल्लाह साहब ने लम्बी आह भरते हुए कहाः लानत है तुम्हारे 'वाक' के आईडिये पर, ये सब वाक की वजह से हुआ है - ख़ुदा ग़ारत करे इस वाक को आहह। हम ने पूछाः मुल्लाहजी खैरियत तो है, बताईए कि हुआ किया? मुल्लाहजी ने कहाः मियां, क्या ख़ाक़ खैरियत पूछते हो। वादे के मुताबिक ठीक साढे चार बजे अपने घर से निकले तुम्हें उठाने, देखा बाहर बहुत सर्दी थी। हम ने सफ़ेद पाजामा के ऊपर सफ़ेद गर्म कोट पहना और फिर अपने सर को सफ़ेद मफलर से लपेट कर बाहर गली मे आए........ बस मियां ये हमारा हुलिया गली के कुत्तों को ना भाया और हमें इतनी लम्बी वाक पर ले गए पूछो मत..... आहह।

 

 

(पढते रहें मौज मस्ती से भरा "मीठा दर्द" आम ज़िन्दगी के खट्टे मीठे किस्से)

 

 

 

 

टिप्पणियाँ (6)add
मजा आ गया
द्वारा प्रेषित pankaj bengani , फ़रवरी 22, 2007
वाह शुएब,

मज़ा आ गया, पढकर. मुल्लाह जी की हालत पर तरस भी आ रहा है! smilies/grin.gif
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द्वारा प्रेषित सागर जैन , फ़रवरी 22, 2007
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बहुत शानदार शुऐब भाई
ये बताइये वजन किसका कम हुआ कुत्ते का या मुल्लाजी का? और हाँ आपका वजन कितना कम हुआ? वजन कम करने के बहुत सारे नुस्खे हमारे पास भी हैं, कभी आईये हमारे अस्पताल में।

॥दस्तक॥ smilies/grin.gif smilies/grin.gif
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दस्तक
द्वारा प्रेषित Shuaib , फ़रवरी 23, 2007
आप भी छुपे रुसतम हो मियां अस्पताल भी है आपका और अब बता रहे हो।
भाई लेख से ज़ाहिर है कि कुत्ते मियां का वज़न घटा है क्यों कि उस ने अपनी पूरी ताकत से मुल्लाहजी पर हाथापाई जो की थी smilies/grin.gif
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द्वारा प्रेषित viral shah , फ़रवरी 27, 2007
good one... keep it up
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वाह!! वाक
द्वारा प्रेषित Sameer Lal , मार्च 01, 2007
बहुत खूब, शुएब भाई. अगर आप लोगों को वाक से कुछ फायदा हो जाये तो बताना जरुर. तब हम भी शुरु करेंगे..अगली कड़ी का इंतजार है. smilies/grin.gif
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द्वारा प्रेषित alok varshney , मार्च 03, 2008
smilies/smiley.gif it is very good . u have created a good humour from a very basic problem obesity.
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