| ये रास्ते क्यूँ मुड़ जाते है? ये फूल क्यूँ झड़ जाते है? आज पूरा चाँद है, बादलों के परों में हवा भी है. इन रास्तो पर चलो मेरे साथी, चल कर देखें बारिश के सुर में चाँदनी से प्यास बुझा कर कभी मेरे साथी जवाब मिल जाये की ये रास्ते कहाँ मूड़ जाते है ये फूल क्यों झड़ जाते है. देखूँ उस ओस की बूँद में, मैं सुबह के बाट जोते आँखो में टपकते विचारों को हथेली में पकड़ कर एक द्रुपद गाने का मन है आज मेरा... कहीं शायद, मेरे साथी, उस अलाप मे जवाब हो की ये रास्ते कहाँ मूड़ जाते है ये फूल क्यूँ झड़ जाते है. गूँजती है आग दूर तक, शहनाई फिसल कर सिमट जाती है तेरी गोद में... माँ कहती थी मुझ से अक्सर दूर उस रेगीस्तान में कमल के फूल पर एक राजा रहता है जिसके पास जवाब है... कि ये रास्ते कहाँ मुड़ जाते है ये फूल क्यूँ झड़ जाते है |
- गिरिराज जोशी "कविराज"