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दस साल से थे रंगों से दूर
कविता
शुक्रवार , , 02 मार्च

giri

गिरीराज जोशी


 

 

गिरीराज जोशी प्रसिद्ध हिन्दी चिट्ठाकार (ब्लोगर) हैं

 

 

 

अमित भाई ने पिछले दस साल से होली नहीं खेली है, और इन दस सालों में कोई उन्हें रंग भी नहीं पाया है। (जैसा उन्होनें मुझे बताया) तो इसी को थीम मानते हुए मैने भांग के नशे में गलती से खुद पर ही पिचकारी चला डालने की कल्पना की है और उसी को शब्दों में पिरोने का प्रयास रहा है

 

  amit

 

 

दस साल से थे रंगों से दूर

हुए इस बार जो नशे में चूर

खुद पर चल गई पिचकारी

अमितजी खेल गये रै होरी...

 

नहीं खेलन का था मन बनाया

रंग ना लगाना, सबको समझाया

पर भंग को कुछ समझ ना आया

 

खुद पर चल गई पिचकारी

अमितजी खेल गये रै होरी...

 

देखो मुझे कोई रंग ना लगाना

बोले, वरना उसे पड़ेगा पछताना

पर हो क्या, कब किसने है जाना?

खुद पर चल गई पिचकारी

अमितजी खेल गये रै होरी...

 

जेब से झटपट रूमाल निकाली

साफ करने लगे मुँह की लाली

नशे में पैर ने दबा दी दूनाली

खुद पर चल गई पिचकारी

अमितजी खेल गये रै होरी...

 

रूमाल भी खेल गया अब होली

देखे पैर कभी देख रहे हैं दूनाली

श्रीश हँस-हँस बजा रहा है ताली

 

खुद पर चल गई पिचकारी

अमितजी खेल गये रै होरी...

 

भंग को हाथ लगाया जो ऐसा

टूट गया जो था खुद पे भरोसा

अब कहते सबसे आओ रंगो-सा

 

खुद पर चल गई पिचकारी

अमितजी खेल गये रै होरी...

 

 

अमित गुप्ता प्रसिद्ध अंग्रेजी और हिन्दी चिट्ठाकार (ब्लोगर) हैं

 

 
टिप्पणियाँ (4)add
क्यूं न खेलें होरी
द्वारा प्रेषित श्रीश शर्मा , मार्च 03, 2007
तो अमित खेल ही गए होली। आखिर रंगों से बैर क्यों जी। साल में एक दिन थोड़ा बहुत केमिकल लग भी गया तो क्या, वैसे भी तो इतने केमिकल रोज शरीर में जा रहे हैं।

खूब रही कविता, उम्मीद है अब अमित खूब होली खेलेंगे। smilies/kiss.gif
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..
द्वारा प्रेषित अमित , मार्च 03, 2007
आखिर रंगों से बैर क्यों जी। साल में एक दिन थोड़ा बहुत केमिकल लग भी गया तो क्या, वैसे भी तो इतने केमिकल रोज शरीर में जा रहे हैं।

बात यूँ है बाबू कि अपने को आजकल के रंगों से एलर्जी है। ऐसा नहीं है कि होली नहीं खेली, बचपन में खूब खेली है, घंटों तक होली खेलते थे, लेकिन फ़िर रंगों में इस कदर बदलाव आया कि रंग चुभने लगे और फ़िर इतने खतरनाक हो गए कि त्वचा जला देते हैं या उतार देते हैं। smilies/sad.gif इसलिए होली खेलनी ही बन्द कर दी। बस घरवालों और रिश्तेदारों को हल्का सा गुलाल लगा देते हैं(चुटकी भर गुलाल वाली होली, ठीक फ़िल्म शोले जैसी) और अपनी होली हो जाती है। smilies/smiley.gif
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द्वारा प्रेषित संजीत त्रिपाठी , मार्च 03, 2007
बढ़िया जोशी जी, तो आपने कविता के माध्यम से अमित भाई को रंग ही डाला।
वैसे अमित भाई चाहे सूखे रंग हो या गीले होली तो होनी ही चाहिए ना, नही तो देखो अभी जोशी जी ने बस रंगा है आपको कहीं सबने रंगना शुरु कर दिया तो फ़िर आप कहते फिरोगे कि " अपनी तो हो ली"।
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rajarishi
द्वारा प्रेषित jrajarishi , अप्रेल 30, 2007
very good. life is basically bliss. we can not turn our back to it for longer. keep on and catch the real essence of life. best wishes.
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