| दस साल से थे रंगों से दूर |
| कविता | |||
| शुक्रवार , , 02 मार्च | |||
टिप्पणियाँ
(4)
आखिर रंगों से बैर क्यों जी। साल में एक दिन थोड़ा बहुत केमिकल लग भी गया तो क्या, वैसे भी तो इतने केमिकल रोज शरीर में जा रहे हैं। बात यूँ है बाबू कि अपने को आजकल के रंगों से एलर्जी है। ऐसा नहीं है कि होली नहीं खेली, बचपन में खूब खेली है, घंटों तक होली खेलते थे, लेकिन फ़िर रंगों में इस कदर बदलाव आया कि रंग चुभने लगे और फ़िर इतने खतरनाक हो गए कि त्वचा जला देते हैं या उतार देते हैं। इसलिए होली खेलनी ही बन्द कर दी। बस घरवालों और रिश्तेदारों को हल्का सा गुलाल लगा देते हैं(चुटकी भर गुलाल वाली होली, ठीक फ़िल्म शोले जैसी) और अपनी होली हो जाती है। report abuse
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बढ़िया जोशी जी, तो आपने कविता के माध्यम से अमित भाई को रंग ही डाला।
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वैसे अमित भाई चाहे सूखे रंग हो या गीले होली तो होनी ही चाहिए ना, नही तो देखो अभी जोशी जी ने बस रंगा है आपको कहीं सबने रंगना शुरु कर दिया तो फ़िर आप कहते फिरोगे कि " अपनी तो हो ली"। report abuse
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खूब रही कविता, उम्मीद है अब अमित खूब होली खेलेंगे।