| सागर की यादें : छुट्टियाँ |
| समाज | |||
| गुरुवार , , 29 मार्च | |||
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टिप्पणियाँ
(15)
यह विडम्बना ही है कि हमारे समाज में आज भी काम और जाति प्रथा को महत्व दिया जाता है इन्सान को नही. परंतु इंसान अपने कर्मो से छोटा या बडा होता है.
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आपने उदाहरण पेश किया है, साधुवाद. report abuse
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हरेक के जीवन में इस तरह की बचपन की यादें होती हैं, इन्हें कलमबद्ध करना महत्वपूर्ण है, आखिर बचपन हमारे जीवन का स्वर्णिम काल होता है...बहुत बढिया लिखा है...
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बढिया ! यादें ताजा कर गई, वह छुट्टी के दिन , शाम का इंतजार और वह क्रिकेट का जूनून । लेकिन सागर अगर आज के दौर मे देखो तो स्थिति बिल्कुत उलट दिखती है। अब गलियाँ सूनी दिखती हैं, खेल-कूद मे उत्साह नजर नहीं आता, हाँ उसकी जगह बच्चे टी वी पर चिपके रहना अधिक पंसद करते हैं।
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सागर भाई,
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बचपन की और लौटा दिया आपने ! वैसे यदि पारसजी यदि हमे मिल जाये तो वो यही कहेंगे कि पैसे मै नही सागर चुराता था वैसे ये तो बताया नही कि शाम को चोर पुलीस के खेल मे क्या हुआ था ? report abuse
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सागर भाई, बचपन तो होता ही सुनहरा है, परंतु आपने अपने लेखन से उसे जीवंत कर दिया है।
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बीते हुए लम्हो की कसक आज भी है....लेकिन सभी बन्धूओ को स्मरण करने का अनुपम कार्य किया है..साधूवाद..
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बहुत बढ़िया तरीके से याद किया गया है जीवन के सुंदर पलों को...बहुत खूब.
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खूब याद दिलाई आपने गर्मी की छुट्टियां । मैं चूंकि कक्षा ५ से छात्रावास मे रहा, इसलिये गर्मियों की बात ही कुछ और होती थी, २ महीने की लम्म्म्बी छुट्टी ।
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जाने कहां गये वो दिन ... report abuse
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सागर जी, हमें तो बचपन के 'टाइम ज़ोन' में पहुंचा दिया। बहुत ही ख़ुबसूरत चित्रण है। 'सुदर्शन फ़ाकिर' की कुछ पंक्तियां दे रहा हूं -
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कभी रेत के ऊंचे टीलों पे जाना, घरौंदे बनाना बना के मिटाना, वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी, वो ख्वाबों खिलोनों की जागीर अपनी, न दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधन, बड़ी ख़ूबसूरत थी वो ज़िंदगानी। धन्यवाद। महावीर शर्मा report abuse
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अपने बचपन का आईना दिखा दिया आपने। अच्छी प्रस्तुति।
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ये तो बताया नहीं आपने कि शाम को चोर पुलिस के खेल में पारस ने बदला किस तरह लिया? report abuse
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बहुत अच्छा लिखा है सागरभाई। बचपन कि यादे ताजा हो गयी। आज के दौर मे देखो तो स्थिति बिल्कुत उलट दिखती है।
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अँधेरों में जो गया था खो...
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आज सामने आया है वो... बचपन, बचपन, बचपन। देर से पढा पर समझा खूब। बातें भूल जाती हैं यादें याद आती हैं..... बहुत खूब। बहुत-बहुत बधाई। report abuse
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अतीत के गलियारों की सैर हो गई.सागर भाई हम अतीत में ही अच्छे थे.पिछ्ले दस बरसों में हम जितना बदले हैं ...वैसे 50 बरसों में भी न बदले थे.इन द्स बरसों में हमने जो सबसे बडी ख़राबी पैदा की वो है लोन ले ले कर खुश रहने का शगल पैदा करना.मध्यम वर्ग को तो खत्म ही कर दिया इस लोन-कल्चर ने.इसी से मरने लगी भावनाएं..जज़्जात और रिश्ते.संबोधनों तक को बिगाड़ डाला हमने.. मेरा प्रिय जुमला है...क्या थे...क्या हो गये...क्या होंगे.
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