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गहरे साये
कविता
शनिवार , , 31 मार्च

bhavna_kunwar

  भावना कुँअर


 

भावना कुँअर उत्कृष्ट कवियत्री तथा हिन्दी चिट्ठाकार हैं

 

झील के उस पार

दो गहरे साये

कभी घटते से

कभी बढते से

मैं अक्सर देखा करता

लहरों में उठते

तूफानों से बेखबर

अपनी हसीन

दुनिया में व्यस्त

इक दूजे को

पूर्ण समर्पित।

मैं रोज सुबह उठता

अखबार पढता

और इसी झील के किनारे आता।

उन सायों से

मेरा एक रिश्ता

बहुत घनिष्ट रिश्ता

बन गया।

बन गये वो भी

मेरी जिंदगी के अहं हिस्से।

रोजमर्रा की तरह

आज भी उठा

अखबार पर नजर दौडाई

पर हटा न सका

दहल गया खबर पढकर

झील में जोरों का तूफान जो आया था

बेतहाशा दौडा

झील के किनारे

पर वो किनारा

अब तहस-नहस हो चुका था

बर्बादी का आलम था

और

और वो दोनों साये

एक दूजे का हाथ थामें

खामोश पडे थे

जैसे कि रात और दिन

सदियों बाद मिलें हों

ऐसी खामोशी

जो अब कभी नहीं टूटेगी।

मैं बुत बना देखता रहा

सोचता जाता

कौन थे?

कहाँ से आते थे?

नहीं जान पाया इस रहस्य को

हाँ जाना बस इतना

निभाया साथ दोनों ने

आखिरी साँस तक

जो अब नहीं

निभाता कोई।

 

टिप्पणियाँ (17)add
बहुत सुंदर
द्वारा प्रेषित समीर लाल , मार्च 31, 2007
बहुत ही गहरे भाव हैं. इस सुंदर रचना के लिये बहुत बधाई!!
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bahut "Bhawna"poorn rachna hai...
द्वारा प्रेषित LK , मार्च 31, 2007
Is sunder rachna ki rachna ke liye bahut badhaai Bhawna ji...
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भावना कंवर की कविता
द्वारा प्रेषित अनूप शुक्ला , अप्रेल 01, 2007
बहुत अच्छी भाव पूर्ण कविता है। बधाई!
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भावना कुँवर जी की कविता
द्वारा प्रेषित अनूप भार्गव , अप्रेल 01, 2007
सुन्दर अभिव्यक्ति है ।

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झील के उस पार
द्वारा प्रेषित डॉ॰ जगदीश व्योम , अप्रेल 02, 2007
भावना जी ! कविता बहुत सुन्दर और भावपूर्ण है। विषम परिस्थितियों में भी साथ रहने से तमाम मुश्किलें अपने आप सुलझ जाती हैं ........ और सच ही कहा गया है "ढ़ाई आखर प्रेम का" ...... डॉ॰ जगदीश व्योम
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bhaut hi ghari aur door ki soch ki jhalak milti hai
द्वारा प्रेषित shrddha , अप्रेल 02, 2007
aapki is kavita main aapki soch ki gharyi pata chalti hai jis tarah se aapne ishe vayakt kiya hai main bhaut prabhavit hoon

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अनुपम चित्र
द्वारा प्रेषित राकेश खंडेलवाल , अप्रेल 02, 2007
यों भरे हैं तीर तरकश में हजारों, ये अलग
भावना का स्पर्श पाकर, भावना छेड़ा किया
शब्द ने अभिव्यक्तियों से इस तरह फ़ेरा है मुंह
कह न पाया कुछ, बजा कर तालियां ही रह गया smilies/cool.gif
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BHAWNA JI AAPKI NAI RACHNA
द्वारा प्रेषित NARENDRA , अप्रेल 03, 2007
AADARNIYA BHAWNA JI, NAMASKAR. AAPKI NAI RACHNA PADI, KAFI SUNDER LAGI, IS RACHNA KE SABDO SE LAGTA HEI KI YEH ANTERMAN SE NIKLE HUE HEI.
PUNE: EK BAR PHHIR BADAHHI.

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डॉ० भावना कुँअर की रचना
द्वारा प्रेषित डॉ० संजय , अप्रेल 04, 2007
आपकी रचना दिल के तारों को छू गयी। बधाई स्वीकारें।
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उत्साह वर्धन के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।
द्वारा प्रेषित Dr.Bhawna Kunwar , अप्रेल 04, 2007
समीर जी, ललित जी, अनूप शुक्ला जी, अनूप भार्गव जी, डॉ० जगदीश व्योम जी, श्रद्धा जी, राकेश जी, नरेन्द्र जी, डॉ० संजय जी आप सब ने जो उत्साह वर्धन किया उसके लिये बहुत-बहुत धन्यवाद। अपना स्नेह यूँ ही बनाये रखियेगा।
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प्राकृतिक सौँदर्य -
द्वारा प्रेषित -- लावण्या , अप्रेल 05, 2007
भावना जी,
प्राकृतिक सौँदर्य लिये कविताएँ मुझे यूँ भी बहोत पसँद हैँ --
इसे पढकर, खुशी बढ गई - सुँदर कविता के लिये, मेरी बधाई !
स -स्नेह,
लावण्या
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शुक्रिया
द्वारा प्रेषित Dr.Bhawna Kunwar , अप्रेल 06, 2007
लावन्या जी बहुत-बहुत शुक्रिया।
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rajarishi
द्वारा प्रेषित jrajarishi , अप्रेल 30, 2007
dam hai gahrayee mein uterane kee. images thoda aur evident ho to achha.
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यह ई-मेल देखने के लिये कृपया जावास्क्रिप्ट को चालू करें
द्वारा प्रेषित lalit , अगस्त 30, 2008

Bhavna

Aapki Rachna Padhi Bahut Aachi lagi.
Naturally Bahut hi Badiya Racahana he.

Thanks
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बिम्ब
द्वारा प्रेषित कृष्णशंकर सोनाने , सितम्बर 26, 2008
सुन्दर अतिसुन्दर,बिम्ब और प्रस्तुतीकरण बेहतर है।
कृष्णशंकर सोनाने
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गहरे साए
द्वारा प्रेषित रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' , नवम्बर 19, 2008
भौतिकता के इस युग में आपाधापी ही प्रमुख हो गई है ।कविता की उपेक्षा सर्वाधिक है; क्योंकि वह दिल और दिमाग दोनो से जुड़ी है । डॉ भावना कुँअर की गहरे साए कविता मन- प्राण को छूने वाली है । कविता पढ़ने के बाद मन पर एक सन्न्टा-सा छा जाता है । हार्दिक बधाई!
'हिमांशु'
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