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परीक्षाओं का मौसम गैस पेपरों का मौसम
रवि-वार्ता
बुधवार , , 04 अप्रेल

 

ravi-books ग्लोबल वार्मिंग का असर पढ़ाई और परीक्षाओं पर भी होने लगा है ऐसा प्रतीत होता है. पहले परीक्षाओं का मौसम सालाना हुआ करता था. परीक्षा देने वाले और लेने वाले -दोनों ही के लिए सालाना जलसों का मजा हुआ करता था. बुरा हो आधुनिक जमाने के मारा-मारी युक्त कम्पीटीशनों का जिसकी वजह से बहुत जगह परीक्षाओं का वार्षिक मौसम सेमेस्टरों की मार से अर्धवार्षिक हो गया है. इस वजह से अब तो परीक्षाओं का मजा ही खतम हो गया है. आमतौर पर परीक्षाएँ अब महज खानापूर्ति के लिए रह गई हैं. हजारों-लाखों की संख्या में परीक्षार्थी परीक्षा देते हैं – और फिर उनकी उत्तर पुस्तिकाएँ या तो वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तरों को कम्प्यूटरों से प्रतिमिनट हजार की दर से या परीक्षकों द्वारा प्रतिघंटा पंद्रह (या और अधिक) की दर से जांची जाती हैं – विद्यार्थी तो पूरे तीन घंटे की मेहनत से उत्तर लिखता है भले ही वह सामूहिक नक़ल कर लिखता हो या खुद की घोर मेहनत से, परंतु परीक्षक उसकी उत्तर पुस्तिका को पाँच मिनट में ही निपटा देता है.

रही सही कसर इकाई, साप्ताहिक, तिमाही और छमाही जाँच परीक्षाओं ने पूरी कर दी है. अब तो विद्यार्थी मात्र परीक्षा देने के लिए पढ़ता है. फिर जब वह कक्षा की परीक्षाओं से मुक्ति पाता है तो विभिन्न किस्म के प्रवेश परीक्षाओं के जंजाल में डूबता उतराता रहता है. जिंदगी न हुई परीक्षा का युद्ध-स्थल हो गया.

शुक्र है कि बहुत सी कक्षाओं में और बहुत से कोर्सों में अभी भी वार्षिक परीक्षा के सालाना जलसे बचे हुए हैं. जब-जब ऐसे वार्षिक जलसों के आयोजन समीप आते है, गैस पेपरों के मौसम भी चले आते हैं. किताब दुकानें, दीवारें, अखबारों के पन्ने गैस पेपरों के विज्ञापनों से पट जाते हैं. गोया गैस पेपर न हुए माणिक चंद गुटका के विज्ञापन हो गए.

परीक्षार्थियों के लिए भी गैस पेपरों का मौसम अच्छा होता है. हजार पन्नों की कोर्स की किताब का निचोड़ पचास पन्नों में सिमट आता है – जिसमें पाँच-दस श्योर-शॉट प्रश्न तो होते ही हैं. गैस पेपरों के कारण विद्यार्थियों को कोर्स की भारी भरकम किताबों की भद्दी मोटी शकलें देखने से भारी राहत मिल जाती है. गैस-पेपरों का आकार-प्रकार और बनावट भी बढ़िया हैण्डी किस्म के होते हैं. वक्त पड़ने पर दबा-छुपा कर आसानी से परीक्षा हाल में ले जाए जा सकने लायक.

आमतौर पर गैस-पेपरों में दिए गए कोई दर्जन भर प्रश्नों में से पाँच प्रश्नों के फंसने की पूरी गारंटी होती है. फिर भी, यदि परीक्षार्थी के पास इसे भी पढ़ पाने का समय न हो – धन्यवाद उन टीवी चैनलों और क्रिकेट के मौसम का जो नित्य नए सीरियल और मैच दिखाते रहते हैं जिन्हें हर परीक्षार्थी को देखना आवश्यक होता है - तो वे उनमें भी कुछ ज्यादा अवश्यंभावी प्रश्नों पर निशान लगवा सकते हैं. इसके लिए अपने कुछ विशेष किस्म के अध्यापकों की शरण ले सकते हैं जो छद्म नामों से गैस पेपर लिख-लिख कर विद्यार्थियों का महान भला तो कर ही रहे होते हैं, संभावित प्रश्नों को बता कर और ज्यादा भला कर सकते हैं.

पुराने जमाने में गैसपेपर नाम की वस्तु नहीं होती थी और न इनका कभी मौसम आता था. पहले के जमाने में ट्यूशन का फंडा ये होता था कि कोई कमजोर विद्यार्थी ही ट्यूशन करता था. आज गैसपेपर तो धड़ल्ले से चल ही रहे हैं, होशियार से होशियार विद्यार्थी अव्वल बने रहने के लिए तमाम तरह की कोटा-नुमा-बंसलिया कोचिंग लेते फिरते हैं.

नए जमाने के विद्यार्थियों पर क्यों न हमें रश्क करना चाहिए?


टिप्पणियाँ (7)add
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द्वारा प्रेषित प्रमेन्‍द्र , अप्रेल 04, 2007
आपका हार्दिक स्‍वागत है।
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द्वारा प्रेषित pankaj bengani , अप्रेल 04, 2007
रवि जी,


मैने भी इसप्रकार के गैस पैपरो का काफी सहारा लिया था.. smilies/grin.gif

smilies/smiley.gif खाशकर दसवी में, फिर भी अपेक्षा के अनुरूप नतीजे नही आए थे..
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वाह जी वाह
द्वारा प्रेषित समीर लाल , अप्रेल 04, 2007
रवि भाई, बहुत स्वागत है आपका इस बेहतरीन व्यंग्य के साथ. अब तो यहाँ लगातार आना जाना लगा रहेगा. बधाई!! smilies/grin.gif
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एटम बम
द्वारा प्रेषित हिंदी ब्लॉगर , अप्रेल 05, 2007
सुना है बिहार में गेस-पेपर को एटम-बम के नाम से भी जाना जाता है. पता नहीं क्यों? वहाँ एटम-बम प्रकाशित करने वाले हॉस्टलों तक ऐसी अफवाहें भी पहुँचवाते हैं कि यूनीवर्सिटी के पेपर-सेटरों से उनकी सांठगांठ है. यानि छात्रों को ये संदेश दिया जाता है कि उनका एटम-बम कोई अटकलबाज़ी या तुक्का नहीं, बल्कि रामबाण औषधि है!
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आपका स्वागत है
द्वारा प्रेषित Shuaib.designer , अप्रेल 05, 2007
लेख बहुत पसंद आया - रवी जी आपका स्वागत है

* यार एडमिन साहब, कुछ करें - यहां जब टिप्पणी देने के लिए अपना नाम लिखता हूं ता ये एरर दिखा ता है (यह नाम पहले से ही पंजीकृत है। किसी अन्य नाम का प्रयोग करें।) ऐसा बहुत दिनों से चल रहा है
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स्वागत है
द्वारा प्रेषित श्रीश शर्मा 'ई-पंडित' , अप्रेल 15, 2007
तरकश पर शुरुआत के लिए बधाई रवि जी!

गैसे पेपरों के महत्व को कौन नकार सकता है। होशियार से होशियार विद्यार्थी भी अंत समय में गैस पेपरों की शरण में अवश्य जाते हैं।
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My opinion about post...
द्वारा प्रेषित Grigorr , मई 02, 2007
Ahoj, fayna stranka v tebe smilies/smiley.gif
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