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दकियानुसी सोच अब अप्रासंगिक है!
मंतव्य
शनिवार , , 07 अप्रेल
एक सम्मानित एवं प्रखर व्यक्ति के इन विचारों से आप कितना सहमत हो सकते हैं?

  • शहरीकरण और बड़े उद्योगों के बजाय गाँव, छोटे उद्योग व हस्तशिल्प व खेती के विकास पर ज्यादा ध्यान देना होगा ।
  • भारी मशीनों तथा भारी पूँजी वाली तकनालाजी के स्थान पर श्रम-प्रधान व स्थानीय संसाधनों व हुनर पर आधारित उद्योग धन्धों अपनाने चाहिए ।
  • बड़ी परियोजनाओं की जगह छोटी योजनाओं को ही प्राथमिकता देना होगा ।


मेरा मानना है कि यह दकियानुसी सोच है. हमे हमारी सोच का दायरा बढाना चाहिए. विकास के मानक तय होने चाहिए. किसी अन्य की किमत पर विकास जायज नही हो सकता और यह बात दोनो पक्षो के लिए समान रूप से लागु होती है.

 

क्या आज देश को बडे कारखानों, भारी मशीनों और तकनीक की कोई जरूरत नही है? क्या हमे इन चीजो का परित्याग कर श्रम प्रधान संसाधनो का ही प्रयोग करना चाहिए? यह कैसी सोच है?


देश को आज बडे कारखानों और तकनीक की उतनी ही जरूरत है जितनी किसानों और छोटे उद्योगो की है. और यह आज की जरूरत नही है, यह तो आजादी के बाद ही महसुस कर ली गई जरूरत है.

तभी तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने रूस से प्रभावित होकर देश मे बडे कारखाने लगवाने की शुरूआत की थी. पर उन्हे शायद अहसास नही था कि सरकारी उपक्रम को बढावा देने और निजी उपक्रम को हितोत्साहित करने के नतीजे देश के लिए
आत्मघाती होंगे.

निजीकरण की विरोधी इन्दिरा गांधी की नितियों से भी देश का कोई भला नही हुआ था और भारत का सकल घरेलु उत्पाद लगातार गिरकर भुतल पर आ गया था. और आखिरकार आगे चलकर उनकी ही पार्टी के
गैर-गाँधी प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने आर्थिक सुधार लागुकर देश की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने का सराहनीय कार्य किया.

आज बडे कारखाने और उन्नत तकनीकी संस्थान नही होंगे तो देश के करोडो नवयुवकों के लिए आप रोजगार कहाँ से लाओगे? आज देश दुनिया मे सबसे अधिक इंजिनीयर बना रहा है, उनके भविष्य का क्या होगा? आज देश जिस तेजी बढ रहा है, उसमे ब्रेक लगाने की बात कहाँ तक गले उतरेगी?

देखिए आज पश्चीम बंगाल की क्या हालत है? कोलकाता के बाहर कोई जिन्दगी नही बची है. मेरा अनन्य मित्र वामपंथ का प्रखर हिमायती है और अहमदाबाद निवासी है. वो किसी भी किमत पर बंगाल वापस नही जाना चाहता. वो कोलकाता मे एक दिन भी नही रूक सकता और अमुमन हर दिन वामपंथी सरकार को कोसता है कि "वहाँ से निजी उद्योगों को बाहर कर राज्य का बटाँधार कर दिया गया. विकास सिर्फ कोलकाता के सोल्ट लेक मे दिखता है, पर बंगाल सिर्फ सोल्ट लेक नही है. राज्य के युवा कामकाज करते कम और क्लब में कैरम खेलते ज्यादा दिखते हैं क्योंकि रोजगार ही नही है. रोजगार कहाँ से होगा? आज वहाँ की सरकार के पास ना तो पैसा है ना ही कोई सोच रह गई है. वे सिर्फ नाम के वामपंथी है."

जरा सोचिए क्या शहरीकरण बुरा है? क्या हमारे देश में विश्वस्तरीय शहर हों तो अच्छा नही होगा? बात यह होनी चाहिए कि हमे भारत के हर गाँव को शहरो की तरह सुविधापूर्ण और उन्नत बनाना चाहिए और इसके लिए पैसा भी चाहिए और अदम्य ईच्छा शक्ति भी चाहिए. और इसके लिए भारी उद्योग भी चाहिए और निजीकरण भी चाहिए!

उद्योगों का विकास किसानो की किमत पर नही होना चाहिए. यह बात बिल्कुल सही है.
किसान और खेती नही होंगे तो देश खाएगा क्या? और ऐसा कभी हो भी नही सकता. हमे तो यह प्रयास करने चाहिए कि हमारे किसान स्वयं भूखे ना रहें. वे नई नई तकनीकों का इस्तेमाल कर अपना उत्पादन बढाए और अधिक मुनाफा कमाए. हमारे किसान अमीर बनें.

यह सारी बाते एक दुसरे के पूरक है और सब एक साथ चल सकती हैं. देश में लघु उद्योगों, ह्थकरघा उद्योगों, खेती का विकास हो सकता है, काफी सम्भावनाएँ है. और देश में भारी उद्योगों, शहरीकरण और नई तकनीकी संस्थानो का भी विकास उसी अनुपात मे हो सकता है. अगर हमारे अन्दर इमानदार सोच हो तो!

 

देश में अमीरी बढे तो बुरा क्या है? अगर कोई शान-शौकत , विलासिता और मंहगे उपभोक्ता सामानों के साथ जीता है तो इसमे बुरा क्या है. उसके पास संसाधन है तो वो जी रहा है, आपके पास नही है तो ईर्श्या क्यों? आज मेरे पास मर्सिडीज नही है तो क्या मैं टाटा और अम्बानी को जिम्मेदार ठहराऊँ.

 

मुझे याद आता है इमरजेंसी के दौर की फिल्में, जब एक रटा रटाया सवांद अमुमन हर फिल्म मे होता था - "सेठ तुम हमारे पसीने की खाते हो!" इन फिल्मो मे उद्योगपतियों को जी भर कर गालीयाँ दी जाती थी और यह भुला दिया जाता था उस कारखाने को खडा करने के लिए उस कथाकथित सेठ ने कितना पसीना बहाया है! क्या वो सिर्फ मौज कर रहा है? क्या सारे उद्योगपति सामंतवादी होते हैं? क्या आप गिन सकते हैं टाटा, अम्बानी,बिड्ला और बजाज के उपक्रमों कितने कर्मचारी कार्य करते हैं और कितने घरो के चुल्हे जलते हैं? गिन सकते हैं? क्या ये बन्द हो जाने चाहिए या और खुलने चाहिए? सोच लिजीए! 

 

हमारे राष्ट्रपति कहते हैं " हमे बडे सपने देखने चाहिए और उन्हे पुरा करने के लिए जी जान लगा देनी चाहिए"


कितना सही कहते हैं वे! भारत को शक्तिशाली बनना होगा अपने बलबुते पर, तभी दुनिया हमारी सुनेगी. ताकतवर की बोली सब सुनते हैं और कमजोर की कोई नही, यह हकिकत है. और देश ताकतवर बनेगा अपनी सोच से, अपनी काबलियत से और अपनी अमीरी से. और देश अमीर सिर्फ लघु उद्योगों और खेती से नही बन सकता. इस हकीकत को पचाना होगा.

टिप्पणियाँ (5)add
चाहिये ऐसे बडे जॊ छोटो की पौध उगा सके
द्वारा प्रेषित अरुण , अप्रेल 07, 2007
पंकज जी जरुरत है बडे उधोगो की पर सरंचना ऐसी हो कि उनके साथ छोटे उद्योग कुकुरमुत्तो की तरह उग आये पर वो लगे सूदूर अंचल मे जहा सरकार उन्हे जरुरी साजोसामान (इन्फ़्रास्ट्रक्चर )खडा कर के दे महानगरओ के साथ नही आखिर प्रगति की बयार वहा भी पहुचनी चाहिये इससे न शहरो पर आबादी का दबाव बढेगा न ही असमानता की लकीर और मोटी होगी जब मै नौकरी करता था मै भी वही खून चूसने वाली सोच रख्ता था .आज मेरी छॊटी सी ही सही खूद की फ़ैक्ट्री है (लगभग ५५/६० लोग है)पर इसे बनाने मे जिन्दगी के १५ साल १८-२० घन्टॆ काम करते हुए निकल गये आज मै कह सकता हू खून काम न करने वालो को ही चुसता हुआ लगता है हा एक बात और कहना चाहुगा वाम पन्थियो को भी काम करना बहुत बुरा लगता है बन्द उद्योग अच्छे भाषण चाहो जितना दिलवालो
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...
द्वारा प्रेषित अतुल शर्मा , अप्रेल 07, 2007
आपने ठीक लिखा। हमें सच में उद्यमशीलता की आवश्यकता है। गाँवों और किसानो को साथ लेकर विकास हो तो संपूर्ण देश का विकास होगा।
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विकास
द्वारा प्रेषित समीर लाल , अप्रेल 07, 2007
मैं समझता हूँ, आवश्यकता है सर्वांगीण विकास की और विकास पथ पर सामान्जस्य बनाते हुए अग्रसर होने की. दोनों ही पक्षों की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता. दोनों समाज के उत्थान में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं.

-अच्छा लिखा है. विमर्श की आवश्यकता है इस विषय पर हमेशा की तरह. बहुत गहन मसला है.
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थोथे विकास की बात न करें
द्वारा प्रेषित रेयाज़-उल-हक , अप्रेल 07, 2007
आखिर किसके लिए? क्या यह तय नहीं होना चाहिए? आप विकास की क्या परिभाषा तय करते हैं. क्या विकास कुछ अवायवीय-सी चीज़ है? क्या यह इस तरह नहीं होनी चाहिए कि समाज के सभी लोगों को समान लाभ मिल सके और उनका लगभग समान विकास हो सके? क्या विकास को समाज के अधिकतर लोगों की बेहतरी के सापेक्ष नहीं होना चाहिए? आप उद्योगपतियों को श्रेय देते हैं कि उन्होंने उद्योग लगाये. मगर वह उद्योग लगाने के लिए उनके पास जो धन आया और उसमें उत्पादन के लिए जो ज़रूरी श्रम है वह कहां से आता है? आप देख नहीं पाते कि उस धन का उद्गम समाज है, न कि वे उद्योगपति खुद. इसी तरह श्रम भी समाज का सामूहिक लगता है तभी किसी चीज़ का उत्पादन हो पाता है. यह बहुत बुनियादी चीज़ है जिसे समझे बिना इस तरह की बातें कहना बेतुका है. अब अगर उद्योगपति समाज का धन और उसी से श्रम लेकर उत्पादन करते हैं तो उससे आनेवाले मुनाफ़े पर केवल उन्हीं का हक कैसे बनता है. वह पूरे समाज का होना चाहिए और उद्योगपतियों का उसमें उतना ही हिस्सा होना चाहिए जितना दूसरों का. इसी तरह यह भी साफ़ है कि उद्योगपति किसी को रोजगार देकर उस पर एहसान नहीं करते. यह तो उद्योग की बुनियादी ज़रूरत है. श्रम न लगे तो उत्पादन कैसे हो? जहां तक बडे़ उद्योग और भारी तकनीक की बात है, उद्योग समाज के विकास के लिए होते है, क्योंकि वे समाज के विकास के लिए ज़रूरी चीज़ें तैयार करते हैं, इसलिए उनका नियोजन ऐसा होना चाहिए कि वे ज़रूरी चीज़ों का उत्पादन करें, और साथ-साथ समाज को आगे ले जायें न कि उसे संकट में डाल दें. भारी तकनीक ठीक है मगर वह उस समाज में ठीक है जहां श्रम(रोजगार) की खपत के वैकल्पिक साधन हों. भारत में जाहिर है कि खेती उतनी विकसित नहीं है कि वह रोजगार को सोख सके. इसलिए विकास के ही लिए, और इस विकास का कतई मतलब टाटा और अंबानी आदि का विकास नहीं है बल्कि देश के निचले तबके का विकास है, हर क्षेत्र में भारी तकनीक ठीक नहीं है. उदारीकरण का नतीजा तो किसानों की आत्महत्याओं के रूप में सामने आ रहा है. उसपर इतना मुदित होने की ज़रूरत नहीं है.जहां तक बंगाल में वाम की विकास नीति है वह केंद्र की उदारीकरण नीति से जरा भी अलग नहीं है, वे दिखाते भले ऐसा हों.
खैर मेरे हाशिये पर भी आयें.http://hashiya.blogspot.com
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भूखा साम्यवादी, भर गया तो पूंजीवादी
द्वारा प्रेषित नीरज दीवान , अप्रेल 10, 2007
मारियो पूजो ने अपनी कृति 'गॉड फ़ादर' में लिखा है - बिज़नेसमैन की बड़ी कामयाबी के पीछे गै़रक़ानूनी कसरत होती है'. हमें यह पता है कि सांठगांठ से किस तरह व्यवसायिक सफलता हासिक की जाती है और अरबों का सरकारी लोन डकारा जाता है. इंडियन बैंक एम्पलॉयज़ एसोसिएशन की ताज़ा रिपोर्ट और कारपोरेट सेक्टर पर बकाया रकम का आंकड़ा खुद निकालकर देखिए. देश में अरब पतियों की संख्या में इज़ाफ़ा और फटेहाल भारत के नौनिहालों की तादाद और इन सबके बीच मीडिया पोषित शाइनिंग इंडिया. इस चकाचौंध में बदन से रिसता खून भी नियोन लाइट के माफिक लुभाती रोशनी नज़र आता है. आता है तो आया करे. नज़रों का फर्क है. नज़रियों का फर्क है और सबसे बढ़कर भरे पेट की डकार और भूखे पेट की पुकार का फर्क है.
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