| दकियानुसी सोच अब अप्रासंगिक है! |
| मंतव्य | |
| शनिवार , , 07 अप्रेल | |
एक सम्मानित एवं प्रखर व्यक्ति के इन विचारों से आप कितना सहमत हो सकते हैं?
क्या आज देश को बडे कारखानों, भारी मशीनों और तकनीक की कोई जरूरत नही है? क्या हमे इन चीजो का परित्याग कर श्रम प्रधान संसाधनो का ही प्रयोग करना चाहिए? यह कैसी सोच है?
देश में अमीरी बढे तो बुरा क्या है? अगर कोई शान-शौकत , विलासिता और मंहगे उपभोक्ता सामानों के साथ जीता है तो इसमे बुरा क्या है. उसके पास संसाधन है तो वो जी रहा है, आपके पास नही है तो ईर्श्या क्यों? आज मेरे पास मर्सिडीज नही है तो क्या मैं टाटा और अम्बानी को जिम्मेदार ठहराऊँ.
मुझे याद आता है इमरजेंसी के दौर की फिल्में, जब एक रटा रटाया सवांद अमुमन हर फिल्म मे होता था - "सेठ तुम हमारे पसीने की खाते हो!" इन फिल्मो मे उद्योगपतियों को जी भर कर गालीयाँ दी जाती थी और यह भुला दिया जाता था उस कारखाने को खडा करने के लिए उस कथाकथित सेठ ने कितना पसीना बहाया है! क्या वो सिर्फ मौज कर रहा है? क्या सारे उद्योगपति सामंतवादी होते हैं? क्या आप गिन सकते हैं टाटा, अम्बानी,बिड्ला और बजाज के उपक्रमों कितने कर्मचारी कार्य करते हैं और कितने घरो के चुल्हे जलते हैं? गिन सकते हैं? क्या ये बन्द हो जाने चाहिए या और खुलने चाहिए? सोच लिजीए!
हमारे राष्ट्रपति कहते हैं " हमे बडे सपने देखने चाहिए और उन्हे पुरा करने के लिए जी जान लगा देनी चाहिए"
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टिप्पणियाँ
(5)
पंकज जी जरुरत है बडे उधोगो की पर सरंचना ऐसी हो कि उनके साथ छोटे उद्योग कुकुरमुत्तो की तरह उग आये पर वो लगे सूदूर अंचल मे जहा सरकार उन्हे जरुरी साजोसामान (इन्फ़्रास्ट्रक्चर )खडा कर के दे महानगरओ के साथ नही आखिर प्रगति की बयार वहा भी पहुचनी चाहिये इससे न शहरो पर आबादी का दबाव बढेगा न ही असमानता की लकीर और मोटी होगी जब मै नौकरी करता था मै भी वही खून चूसने वाली सोच रख्ता था .आज मेरी छॊटी सी ही सही खूद की फ़ैक्ट्री है (लगभग ५५/६० लोग है)पर इसे बनाने मे जिन्दगी के १५ साल १८-२० घन्टॆ काम करते हुए निकल गये आज मै कह सकता हू खून काम न करने वालो को ही चुसता हुआ लगता है हा एक बात और कहना चाहुगा वाम पन्थियो को भी काम करना बहुत बुरा लगता है बन्द उद्योग अच्छे भाषण चाहो जितना दिलवालो
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आपने ठीक लिखा। हमें सच में उद्यमशीलता की आवश्यकता है। गाँवों और किसानो को साथ लेकर विकास हो तो संपूर्ण देश का विकास होगा।
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मैं समझता हूँ, आवश्यकता है सर्वांगीण विकास की और विकास पथ पर सामान्जस्य बनाते हुए अग्रसर होने की. दोनों ही पक्षों की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता. दोनों समाज के उत्थान में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं.
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-अच्छा लिखा है. विमर्श की आवश्यकता है इस विषय पर हमेशा की तरह. बहुत गहन मसला है. report abuse
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आखिर किसके लिए? क्या यह तय नहीं होना चाहिए? आप विकास की क्या परिभाषा तय करते हैं. क्या विकास कुछ अवायवीय-सी चीज़ है? क्या यह इस तरह नहीं होनी चाहिए कि समाज के सभी लोगों को समान लाभ मिल सके और उनका लगभग समान विकास हो सके? क्या विकास को समाज के अधिकतर लोगों की बेहतरी के सापेक्ष नहीं होना चाहिए? आप उद्योगपतियों को श्रेय देते हैं कि उन्होंने उद्योग लगाये. मगर वह उद्योग लगाने के लिए उनके पास जो धन आया और उसमें उत्पादन के लिए जो ज़रूरी श्रम है वह कहां से आता है? आप देख नहीं पाते कि उस धन का उद्गम समाज है, न कि वे उद्योगपति खुद. इसी तरह श्रम भी समाज का सामूहिक लगता है तभी किसी चीज़ का उत्पादन हो पाता है. यह बहुत बुनियादी चीज़ है जिसे समझे बिना इस तरह की बातें कहना बेतुका है. अब अगर उद्योगपति समाज का धन और उसी से श्रम लेकर उत्पादन करते हैं तो उससे आनेवाले मुनाफ़े पर केवल उन्हीं का हक कैसे बनता है. वह पूरे समाज का होना चाहिए और उद्योगपतियों का उसमें उतना ही हिस्सा होना चाहिए जितना दूसरों का. इसी तरह यह भी साफ़ है कि उद्योगपति किसी को रोजगार देकर उस पर एहसान नहीं करते. यह तो उद्योग की बुनियादी ज़रूरत है. श्रम न लगे तो उत्पादन कैसे हो? जहां तक बडे़ उद्योग और भारी तकनीक की बात है, उद्योग समाज के विकास के लिए होते है, क्योंकि वे समाज के विकास के लिए ज़रूरी चीज़ें तैयार करते हैं, इसलिए उनका नियोजन ऐसा होना चाहिए कि वे ज़रूरी चीज़ों का उत्पादन करें, और साथ-साथ समाज को आगे ले जायें न कि उसे संकट में डाल दें. भारी तकनीक ठीक है मगर वह उस समाज में ठीक है जहां श्रम(रोजगार) की खपत के वैकल्पिक साधन हों. भारत में जाहिर है कि खेती उतनी विकसित नहीं है कि वह रोजगार को सोख सके. इसलिए विकास के ही लिए, और इस विकास का कतई मतलब टाटा और अंबानी आदि का विकास नहीं है बल्कि देश के निचले तबके का विकास है, हर क्षेत्र में भारी तकनीक ठीक नहीं है. उदारीकरण का नतीजा तो किसानों की आत्महत्याओं के रूप में सामने आ रहा है. उसपर इतना मुदित होने की ज़रूरत नहीं है.जहां तक बंगाल में वाम की विकास नीति है वह केंद्र की उदारीकरण नीति से जरा भी अलग नहीं है, वे दिखाते भले ऐसा हों.
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खैर मेरे हाशिये पर भी आयें.http://hashiya.blogspot.com report abuse
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मारियो पूजो ने अपनी कृति 'गॉड फ़ादर' में लिखा है - बिज़नेसमैन की बड़ी कामयाबी के पीछे गै़रक़ानूनी कसरत होती है'. हमें यह पता है कि सांठगांठ से किस तरह व्यवसायिक सफलता हासिक की जाती है और अरबों का सरकारी लोन डकारा जाता है. इंडियन बैंक एम्पलॉयज़ एसोसिएशन की ताज़ा रिपोर्ट और कारपोरेट सेक्टर पर बकाया रकम का आंकड़ा खुद निकालकर देखिए. देश में अरब पतियों की संख्या में इज़ाफ़ा और फटेहाल भारत के नौनिहालों की तादाद और इन सबके बीच मीडिया पोषित शाइनिंग इंडिया. इस चकाचौंध में बदन से रिसता खून भी नियोन लाइट के माफिक लुभाती रोशनी नज़र आता है. आता है तो आया करे. नज़रों का फर्क है. नज़रियों का फर्क है और सबसे बढ़कर भरे पेट की डकार और भूखे पेट की पुकार का फर्क है.
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