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बहता नाला, नाले में जहर
मंतव्य
शुक्रवार , , 13 अप्रेल

 एक नाला है, जिसमे जहर भरा है. वो बहता जा रहा है और लोग उसमें डुबकी लगाकर गंगा स्नान सा आनंद ले रहे हैं. उन्हे अहसास होता है कि वे एक बडी सामाजिक क्रांति ला रहे हैं. और उनके लिए मोक्ष के द्वार खुलने ही वाले हैं.

ऐसे लोग हर जगह मौजुद और और हर रूप रंग में मौजुद हैं. वे हर किसी कस्बे मौहल्ले में रहते हैं, और पंगेबाजी करना उनका पसंदीदा शगल होता है.

वस्तुतः यह स्थिति भ्रम की है. भ्रम कि मै बुद्धिजीवी हुँ, भ्रम की मै महानता की एक स्थिति तक पहुँच चुका हुँ, भ्रम की समाज में सबकुछ भ्रष्ट ही है, भ्रम की मैं ही सही हुँ.  भ्रम, छोटा सा पर जटिल शब्द है. हम सबको भ्रम होता है.

 

भगवान को भी भ्रम होता होगा. भ्रम की वो सबसे बडा है और उसने प्रकृति की रचना की है. उसने मनुष्य को दुनिया का सबसे समझदार जानवर बनाया है, और मानव ने हर जगह अपनी जानवर बुद्धि का प्रदर्शन किया है.

भ्रम है उसे. अव्वल तो वो है ही नहीं. अगर है भी तो मुर्ख है. मुर्ख इसलिए कि जो वो समझता है वो है नहीं.  वो सबसे बडा भी नही है और सबसे महान भी नही है. क्योंकि मनुष्य जो उसकी खुद की रचना है वह सबसे बडा और सबसे महान हो चुका है. उसने भगवान के अस्तित्व को खुद ही, खुद के स्वार्थ से और खुद की रूचि के अनुसार बनाया और पूजा और खौफ भी खाया. फिर खुद ही उसे खंडित करता गया.  और अब भगवान पत्थरों और हवाओं में, समाज सुधारकों और निट्ठले बाबाओं में ढुंढे जाते हैं.

उसने खुद ने ही खुद का मुद्दा बनाया, खुद ही खुद से उलझ गया. वह अपने आप से लडता रहा, अपनी पहचान ढुंढता रहा. उसने खुद ने ही भगवान के अलग अलग रूप गढे, फिर खुद ही खुद को बाँट बैठा. उसका दिमाग भगवान को पूजता और आंखे ईशु को ढुंढती रही, कभी अल्लाह गाली के रूप में निकलने लगा कभी बुद्ध में उसे मुक्तिमार्ग दिखने लगा, कभी उसने मुर्ति तोड दी, कभी वह काफीर होने लगा. 

फिर उसने खुद के और टुकडे किए और खुद को सुन्नी और शिया में, अगडे और पिछ्डे में, ठाकुर और दलित में, प्रोटेस्टंट और केथोलिक में बाँट लिया. और फिर खुद ही खुद से लड बैठा. खुद ही लहुलुहान हो गया.  और यह सब किसके लिए? इसका जवाब भी तो नही है इस मानव के पास.

 

भगवान ने भी क्या चीज बनाई है, मानव के रूप में; या मानव ने भी क्या चीज गढी है, भगवान के रूप में!

 

क्या पता क्या सच है?

 

टिप्पणियाँ (11)add
सारगर्भित लेख
द्वारा प्रेषित Pratik Pandey , अप्रेल 13, 2007
वाक़ई बढ़िया लिखा है। वे लोग भ्रमित हैं जो सोचते हैं कि किसी "वाद" या चिंतन-प्रणाली से आमूल क्रांति सम्भव है। क्रांति का आरम्भ तो विचार-प्रणालियों से परे जाना है। जो विचारों से बंधे हैं वे सिर्फ़ कोलाहल में वृद्धि कर रहे हैं और समस्या को और जटिल बना रहे हैं।
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द्वारा प्रेषित pankaj bengani , अप्रेल 13, 2007
Pratik Pandey,

हाँ बात सही है मित्र, कुछ लोगों को पता नही चलता कि वे भी किसी विशेष वाद के अधीन हो चुके हैं. ये लोग सम्मोहन की स्थिति में हैं और जडवत हैं. smilies/angry.gif
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द्वारा प्रेषित जीतू , अप्रेल 13, 2007
बहुत सही लेख। ऊपर बैठा ईश्वर/खुदा भी सोचता होगा, कि क्यों ये इन्सान बनाया? जो 'अपनो' के लिए अपने जैसे इन्सान से लड़ता है। शायद लड़ना ही इसकी प्रवत्ति तो नही। दरअसल यही सच है, हम जानवर से इन्सान तो बन गए, लेकिन मानसिक विकास नही हो सका। हम जानवर थे, है और (अभी के हाल को देखते हुए लगता है कि) भविष्य मे भी रहेंगे। हम आज भी छोटी छोटी बातों के लिए खून बहाने मे हिचकिचाते नही, क्यों है ऐसा?

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द्वारा प्रेषित Tarun , अप्रेल 14, 2007
भगवान ने भी क्या चीज बनाई है, मानव के रूप में; या मानव ने भी क्या चीज गढी है, भगवान के रूप में!

क्या खूब बात कही है पंकज
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द्वारा प्रेषित pankaj bengani , अप्रेल 14, 2007
जीतुजी,


बात सही है, इंसान अभी तक नाम का इंसान है, वस्तुतः अभी जानवर अवस्था से उपर नही उठा है.


तरुणजी,


धन्यवाद
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द्वारा प्रेषित सागर जैन , अप्रेल 14, 2007
ये पंकज बैंगाणी ने ही लिखा है.....?
सच है इन्सान अभी जानवर ही है, बिना नुकसान पहुँचाये तो जानवर भी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता!! इन्सान तो उनसे भी गया गुजरा है।
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द्वारा प्रेषित अतुल शर्मा , अप्रेल 14, 2007
कोई किसी भी रास्ते से जाएँ सभी एक ही जगह पहुँचना है।
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द्वारा प्रेषित Pankaj Bengani , अप्रेल 14, 2007
अतुल शर्मा जी ,

इतनी समझ होती तो पंगेबाजी क्यों करते, इतनी समझ होती तो बजारू क्यों बनते और मौहल्ले कस्बे में क्यों अटक जाते. smilies/angry.gif
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बहता नाला, नाले में जहर
द्वारा प्रेषित अनूप शुक्ला , अप्रेल 14, 2007
अच्छा लिखा!
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सही है
द्वारा प्रेषित समीर लाल , अप्रेल 15, 2007
बढ़िया विचार है. सराहनीय सोच. बधाई!!
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धन्य हो
द्वारा प्रेषित नीरज दीवान , अप्रेल 15, 2007
एक ग़ज़ल याद आ गई.
दैरो-हरम में रहने वालों, मयख़ारों में फूट न डालो.
आरिज़ो लब सादा रहने दो, ताजमहल पर रंग न डालो.
तूफ़ां से हम टकराएंगे, तुम अपनी कश्ती को संभालो.
मयख़ाने में आए वाइज़, इनको भी इंसान बनालो.

धन्य.. वाद नहीं कहूंगा. smilies/wink.gif
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