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 हाल ही में मैंने अपने कम्प्यूटर के मदरबोर्ड, रॅम व प्रोसेसर का अपग्रेड करवाया. अगर आप आईटी से जुड़े हैं तो साल के एक सॉफ़्टवेयर और साल के दो हार्डवेयर अपग्रेड से आप अछूते नहीं रह सकते. यूं तो कोई मेन्युअल नहीं पढ़ता है, मगर मैं अपनी आदत से लाचार था. मदरबोर्ड के मेन्युअल में लिखा था - इसमें 5.1 सराउण्ड साउण्ड का समर्थन अंतर्निर्मित है.
यह पढ़ते ही मुझे 5.1 सराउण्ड साउण्ड एम्प्लीफ़ायर-स्पीकर सिस्टम खरीदने की तीव्र आवश्यकता-सी महसूस होने लगी. अब तक मैं अपने कम्प्यूटर से निकलने वाले स्टीरियोफ़ॉनिक साउण्ड से बेहद संतुष्ट था. अचानक उसकी आवाज मुझे बेसुरी लगने लगी. जितना मैं उसे सुनता था उतना ही ज्यादा 5.1 सराउण्ड साउण्ड सिस्टम लेने की आवश्यकता ज्यादा महसूस होने लगी. मेरे कम्प्यूटर के मदरबोर्ड का 5.1 स्पीकर सिस्टम का समर्थन व तकनॉलाज़ी अकारण अप्रयोज्य पड़ी थी जो कि दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति थी.
अंततः जल्दी ही, एक दिन मैंने अपने आपको विशाल इलेक्ट्रॉनिक माल में पाया. तमाम तरह के, हर रंग के, हजारों लाखों पीएमपीओ क्षमता वाले 5.1 सराउण्ड साउण्ड स्पीकर सिस्टम उपलब्ध थे वहां.
एक 5.1 स्पीकर सिस्टम मेरे बजट को, जो कि वैसे भी ओवर हो रहा था, सूट कर रहा था. जिस सिस्टम के फ़ीचर से आकर्षित हो कर मैं लेना चाह रहा था वो मेरी बजट से बाहर था और जो सिस्टम मेरी बजट में था वो बेकार-सा था. बिलकुल मरफ़ी महोदय के फ़लसफ़े के अनुरूप.
बहरहाल, जैसे तैसे मैंने एक 5.1 स्पीकर सिस्टम पसंद किया तो सेल्समेन ने बड़े गर्व से बताया कि यह बहुत बढ़िया मॉडल है, आपके पसंद की दाद देनी पड़ेगी वगैरह वगैरह. फिर उसने सिस्टम का डेमो दिया और बताया कि इसके सभी फंक्शन रिमोट से संचालित होते हैं. उसने एक क्रेडिट कार्ड नुमा रिमोट मेरे हाथ में थमाया.
नहीं! हे ! भगवान एक और रिमोट! मैं मन ही मन चिल्लाया. और प्रकट में पूछा – यार ये बताओ कि इसके फ़ंक्शन बगैर रिमोट भी चल सकते हैं या नहीं. उसने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैंने कोई गुस्ताख़ी कर दी हो. फिर वो बोला – आजकल रिमोट का ही जमाना है – रिमोट ही चलता है. इसके ऑन ऑफ़ स्विच और एकाध वॉल्यूम कंट्रोल वगैरह को छोड़ कर बाकी सबकुछ नियंत्रण सुविधा आपको रिमोट में ही मिलेगी.
अचानक वह 5.1 म्यूज़िक सिस्टम मुझे भार सा लगने लगा. मैंने सेल्समेन से पूछा कि बगैर रिमोट भी कोई 5.1 म्यूजिक सिस्टम आता है क्या? उसने बताया कि आता तो है, परंतु उनमें ज्यादा कोई फंक्शन नहीं होते हैं, एकदम बेसिक होते हैं और इससे बेहतर है कि आप स्टीरियो म्यूजिक सिस्टम ले लें. परंतु उनमें भी अच्छे सेटों में आजकल रिमोट आते हैं. फिर उसने ‘भेदी’ प्रश्न पूछा – आप रिमोट से इतना क्यों घबरा रहे हैं?
मैं उसे क्या बताता? वह मुझे पागल समझता या फिर किसी और दुनिया का. रिमोट जब पहले पहल टीवी के लिए आया था तब तो वह बहुत बढ़िया और प्यारा सा था. मैं सोफ़े पर संपूर्ण आलस में बैठकर तमाम चैनल बदल सकता था, सर्च कर सकता था, वॉल्यूम कम ज्यादा कर सकता था. फिर वीसीआर-वीसीडी-डीवीडी चले आए अपने अपने रिमोटों के साथ. अब झंझट बढ़ गई. कौन सा रिमोट किसके लिए है और 10 बाई 10 के कमरे के किस हिस्से में कहाँ है यह ढूंढने में और रिमोट का कौन सा बटन क्या काम आता है यह पता करने में ही टीवी दर्शन का सारा समय जाया होने लगा.
कुछ रिमोट मुझे उपहार स्वरूप मिलते गए – जैसे कि एक रिमोट नाइट लैम्प के साथ मेरे पिछले जन्म दिवस पर मिला, तो एक और रिमोट मेरे गॅजेट प्रेम को देखकर मेरी पत्नी ने ला पकड़ाया जो सिर्फ रिमोट है – रिमोट के अलावा कुछ नहीं. कुछ रिमोट मेरे खिलौना प्रेमी पुत्र का है जो रिमोट कंट्रोल कार या हेलिकॉप्टर या टैंक आदि को देखकर हर हाल में प्राप्त कर लेने को हर बार मचल उठता है – भले ही उसके पास ऐसा ही खिलौना पहले से कई-कई मौजूद होता है. और, अकसर मेरे लिए इन रिमोटों में भेद करना मुश्किल होता है. मेरे लिए तो रिमोट सिर्फ रिमोट होता है – वह खिलौना कार का या मेरी अपनी कार के दरवाजों में ताला लगाने का.
फिर, बुरा हो ग्लोबल वार्मिंग करने वाले तत्वों का, जो मेरे घर में एक अदद एयरकंडीशनिंग सिस्टम वह भी ‘रिमोट समेत’ पहुंचाने के लिए जिम्मेदार रहे. और एसी के रिमोट के जरिए अकसर मैं कई दफ़ा टीवी चालू करने की कोशिशें करने लगा और टीवी के रिमोट से एसी का टेम्प्रेचर सेट करने की असफल कोशिशें करता पाया जाने लगा. भले ही रिमोटों के रूप रंग आकार प्रकार अलग अलग हों, परंतु ये काम तो एक ही करते हैं – दूर से नियंत्रण. और मैं वही करने की कोशिशें करता. परंतु पता नहीं क्यों एक उपकरण का रिमोट दूसरे उपकरण में काम क्यों नहीं करता.
मेरे रिमोट फ़ोबिया को देखकर मेरे एक जानकार मित्र ने मुझे यूनिवर्सल रिमोट नाम के किसी अजायब उपकरण को खरीद लाने की सलाह दी. यानी कि सिर्फ एक रिमोट से घर के सारे उपकरणों – चाहे वह टीवी हो वीसीडी-डीवीडी या एसी या कुछ और, नियंत्रित किए जा सकते हैं. मैं उत्साहित होकर यूनिवर्सल रिमोट की अपने शहर में तलाश की तो वह जाहिर है, नहीं मिला. इस मामले में ई-बे तारणहार हुआ जहाँ मैंने अब भारत में आसान विदेशी मुद्रा को उससे भी आसान क्रेडिट कार्ड के जरिए खर्च कर वह यूनिवर्सल रिमोट मंगवा ही लिया.
परंतु वह यूनिवर्सल रिमोट मेरे पुराने सिस्टमों में अनकम्पेटिबल था. यानी कि उस यूनिवर्सल रिमोट को चलने के लिए मुझे अपना सारा सिस्टम नया लगाना चाहिए होगा. तब से वह यूनिवर्सल रिमोट मेरा मुँह चिढ़ाता पड़ा है और मुझे रिमोट नाम से ही डर लगने लगा है.
बुरा हो उस निठल्ले अन्वेषणकर्ता का जिसने पहले पहल रिमोट की रचना की. उसने तमाम दुनिया को आलसी तो बना ही दिया है - कोच पर बैठे बैठे आलू के चिप्स खाते रिमोट के जरिए टीवी के चैनल बदलने वाले हर घर में मिलते हैं – बहुतों को नाना प्रकार के रिमोट के जरिए पागल भी बना दिया है.
लगता है मुझे 5.1 सराउण्ड सिस्टम के बगैर ही गुजारा करना होगा. एक अदद अतिरिक्त रिमोट की गुंजाइश मेरे जीवन में जो नहीं है!
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