| इन्हे अंधकार में मत धकेलो! |
| मंतव्य | |
| सोमवार , , 23 अप्रेल | |
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बोया पेड बबुल का....
जैसा बोओगे, वैसी ही फसल पाओगे. जैसे कर्म करोगे एक ना एक दिन नतीजे भी उसी के अनुरूप आएंगे.
दो दिन पहले एक अरब टीवी चैनल की फुटेज से शुरू हुई खबरी चैनलों की नई सनसनी अभी तक मेरे मन को झकझोर रही है. फुटेज थी तालिबानी लडाकों की, एक 12 वर्षिय लडके की, एक निहत्थे व्यक्ति की और इंसानियत की मौत की.
12 वर्षिय लडका जिसकी समझ अभी भी गीली मिट्टी से बने घटे जैसी है, उसके हाथों में छुरी है. वो जेहाद के मंत्र पढता है. उसके सामने बैठे व्यक्ति को अमरीकी जासूस करार देता है. काफीरों की सजा मौत होती है, यह फरमान जारी करता है, और अंत में ....
अंत में जो होता है वो लिखने का मन नहीं है. पर तालिबानी धर्मान्ध लडाके जो कर रहे हैं, वो सभ्य समाज के लिए ही नहीं परंतु खुद उनके लिए भी आत्मघाती सिद्ध हो सकता है.
12 वर्षिय लडका जो कर रहा है, वो उसे एक ऐसी अन्धेरी दुनिया की तरफ ले जाएगा जहाँ वापसी सम्भव नहीं, वो अनगिनत लोगों की जान लेगा और उसका अंत खूद उनके जैसा ही होगा. एक दिन वो भी लडता लडता अपनी जान गवाँ देगा. और ये धर्मान्ध उसकी मौत को शहादत घोषित कर अन्य कई लडकों को इसी रास्ते पर चलने की प्रेरणा देंगे.
यह लडका विद्यालय नहीं जाता पर आंतकवादी केम्पों में ट्रेनिंग लेता है. यह बडा होकर इंजिनीयर नहीं बनेगा, डॉक्टर भी नहीं, आई.टी. क्या होती है उसे नहीं पता पर मेगज़ीन क्या होती है उसे पता है, और बडा होकर वो सुसाइड बोम्बर बनेगा और किसी ना किसी अमरीकी को या भारतीय काफीर को जरूर मारेगा. फिर एक दिन वो जन्नतनशीन हो जाएगा जहाँ अल्लाह उसका इंतजार करेंगे और अप्सराएँ उसका स्वागत करेंगी.
हम अनगिनत दस्तावेजों, वृतचित्रों में यह देख सकते हैं कि इन जेहादीयों को यही सिखाया जाता है. और उन्हे अन्धे कुँए में धकेल दिया जाता है. आखिर क्यों? यह कैसी लडाई है? यह कैसा जेहाद है? क्यों इन मासुमों की जिन्दगीयों से खेला जा रहा है?
ये मासुम कच्ची मिट्टी की तरह हैं, इन्हे कोई भी आकार दिया जा सकता है. चाहे बन्दुक का दो या सृजनशील औजार का दो.
ये बडे होकर पूल बना सकते थे, क्यों इनको पूल उडाने की ट्रेनिंग दी जा रही है!! ये बडे होकर नई जिन्दगी को धरती पर लाते, क्यों अभी से इनसे हत्याएँ करवा रहे हो!!
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टिप्पणियाँ
(4)
कल टी वी पर दिखाया जा रहा है. मन बहुत खराब हो गया यह सब देख कर. किस दिशा में जा रहे हैं यह सब?
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ये मासुम कच्ची मिट्टी की तरह हैं, इन्हे कोई भी आकार दिया जा सकता है. चाहे बन्दुक का दो या सृजनशील औजार का दो. बिल्कुल सच कह रहे हो. बहुत दुख होता है यह सब देख कर. report abuse
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पढ़कर दुख हुआ । पर भला हो उस शादी का जिसके चर्चों से बचने के लिए मैं टी वी चला ही नहीं रही थी , अतः देखने से बच गई । जो हो रहा है उसे रोक तो नहीं सकते पर देखना तो बन्द कर सकते हैं ।
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घुघूती बासूती report abuse
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कभी कभी तो इस दुनियां में रहने का दिल ही नहीं करता.