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सरकारी योजना:क्राफ्टेड फॉर फेंटासीस |
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रवि-वार्ता
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बुधवार , , 30 मई |
एक विज्ञापन आजकल धूम मचा रहा है. यूं तो वह विज्ञापन है कच्छे का, परंतु वह लोगों के दिमागों में धूम मचा रहा है. फॅन्टसी पैदा कर रहा है लोगों के दिमागों में. पहने वालों के भी और न पहनने वालों के भी. और, उन कच्छों को धोने वालों के तो क्या कहने! आखिर – वे कच्छे बने ही हैं फॅन्टसीज़ के लिए.
अमूमन सरकारी योजनाएँ भी ऐसी ही होती हैं. क्रॉफ़्टेड फ़ॉर फ़ॅन्टसीज़. दन्न से कोई नायाब, टॉइंग, सरकारी योजना आती है. लगता है कि इन्कलाब हो जाएगा, क्रान्ति हो जाएगी, कायापलट हो जाएगा. जनता और सरकार फ़ॅन्टसी में जीने लगती है. हफ़्ता दस दिन गुजरता है और जब स्वप्न भंग होता है तो हकीकत वहीं की वहीं नजर आती है. न कोई परिवर्तन, न कोई काया पलट और न कोई क्रांति.
कोई तीसेक साल पहले इंदिराजी की कांग्रेस सरकार ने एक योजना बनाई थी – गरीबी हटाओ. हर तरफ नारा चलता था – गरीबी हटाओ-गरीबी हटाओ. क्या योजना थी. एकदम परफ़ेक्ट. ए हंड्रेड एण्ड वन परसेंट क्रॉफ़्टेड फ़ॉर फ़ॅन्टसीज़. इस योजना के कारण जनता आज भी उसी फॅन्टसी में जी रही है – अपनी ग़रीबी दूर करने की फ़ॅन्टसी. अलबत्ता इन तमाम वर्षों में सरकार की उसकी खुद की फ़ॅन्टसी इस योजना को लेकर कई बार डूब उतरा चुकी है.
पिछली भाजपा-नीत सरकार को इंडिया-शाइनिंग की फ़ॅन्टसी हो गई थी. गोल्डन ट्राएंगल और प्रधानमंत्री सड़क योजना बनाकर उसे यह भ्रम हो गया कि संसद पर दूसरी मर्तबा पहुँचने की उसकी राह अत्यंत आसान हो गई है. सरकार को यह भ्रम हो गया कि जनता की फ़ॅन्टसी सरकारी फ़ॅन्टसी से अलग थोड़े ही है. प्रारंभ में लगा कि जनता सरकारी फ़ॅन्टसी में फंस चुकी है. पर फिर, शीघ्र ही - संभवतः उसके भूखे पेट, मच्छरी रातों और खटमली खाटों ने जनता की फ़ॅन्टसी को जल्दी ही तोड़ दिया.
सरकार को कुछ समय से अर्जुनिया फ़ॅन्टसी हो गई है. वो अल्पसंख्यक-पिछड़ावर्ग के जरिए गुणा भाग कर चुनावी गणित के फलस्वरूप उत्पन्न हुई फ़ॅन्टसी में जी रही है. और जनता को भी इस फ़ॅन्टसी में फांस रही है. यह गुणा-भाग भले ही सरकार अपनी परफ़ेक्ट फ़ॅन्टसी के लिए परफ़ेक्ट तरीके से क्रॉफ़्ट कर ले, मगर जनता समझदार है - चतुर सुजान है. उसने राजस्थान में आग लगाकर अपनी इस फ़ॅन्टसी को भस्म करने की शुरूआत कर दी है.
बिजली की फ़ॅन्टसी ने सरकार व जनता को बहुत झटके दिए. बिजली उपलब्ध रहकर जितने झटके मिलते हैं उससे ज्यादा झटके तो अब बिजली न रहने पर मिलते हैं. ज्यादा अरसा नहीं बीता है जब सरकार ने किसानों को, ग़रीबों को मुफ़्त बिजली बांटना शुरू किया था. सरकार की यह योजना आई तो लगा कि क्रांति हो जाएगी. जनता का कायापलट हो जाएगा. सब ओर खुशहाली छा जाएगी. सरकार की फ़ॅन्टसी थी कि जनता उसे उसकी इस कृपा के चलते अगले दस-बीस चुनावों में तो जितवाती ही रहेगी. जनता की फ़ॅन्टसी थी कि बिजली उसके सूने, अंधियारे घर में प्रकाश ही प्रकाश भर देगी. परंतु यह फ़ॅन्टसी दोनों ही तरफ जल्दी ही उतर गई. बिजली की घोर कमी हो गई. बिजली विभाग दीवालिये हो गए. सरकार दे रही है न मुफ़्त बिजली. अब बिजली है नहीं तो कहाँ से दें. जितनी है - जो है वो ले लो. अब जनता पावर कट और लोड शेडिंग को उसके इस जीवन में ख़त्म हो जाने की फ़ॅन्टसी में जी रही है और कई दफ़ा अदल बदल चुकी सरकार कोई दूसरी तरकीब की तलाश में है जो वह वोट बटोरने के लिए जनता को परोस सके. तमिलनाडु में तो हर घर में रंगीन टीवी की फ़ॅन्टसी बढ़िया परिणाम सहित बुनी जा चुकी है. अब ये जुदा बात है कि घर में खाना कितना रंगीन है, और ये भी कि उन घरों में बिजली अपनी रंगीनियाँ बिखेरती भी है या नहीं. और, ये फ़ॅन्टसी अगले चुनाव तक बची रह पाती है भी या नहीं – डीएमके के स्वयं के घर में तो उनकी फ़ॅन्टसी ध्वस्त हो ही चुकी है.
उदाहरण के लिए एक और सरकारी योजना है. यह भी परफ़ेक्ट, क्रॉफ़्टेड फ़ॉर फ़ॅन्टसीज़ है. छः वर्ष की उम्र तक के बच्चों व गर्भवती महिलाओं को मुफ़्त पौष्टिक आहार देने के लिए सरकारी योजना बनाई गई है. योजना की प्रगति काग़जों पर चलती है और सरकार फ़ॅन्टसी में जीती है कि जनता हृष्ट-पुष्ट हो रही है. भ्रष्ट सरकारी नुमाइंदे कमाई के एक और जरिए के बल पर विदेश यात्रा की फ़ॅन्टसी में जीने लगते हैं और जनता मुरमुरे खाकर हलवा-पूरी खाने की फ़ॅन्टसी में जीने के लिए अभिशप्त बनी रहती है.
अब किस फ़ॅन्टसी की बात करें और किसे छोड़ें. सरकारी फ़ॅन्टसी की दुनिया अनंत है - अंतहीन है. बिलकुल अमूल माचो की तरह.
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