| हे प्रिये! तुम द्वार खोलो... |
| कविता | |||
| गुरुवार , , 31 मई | |||
टिप्पणियाँ
(13)
गुरुवर बहुत बढ़िया रचना।
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एक सवाल, आखिर बात क्या है आजकल एकदम से रुमानी हुए जा रहे हैं आप। शुक्रिया इस रचना को पढ़वाने के लिए report abuse
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आदरणीय मै तो आपको हास्य चिट्ठाकार ही समझा करती थी,आप तो बहुत सवेंदनशील कवितायें लिखते है,...
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मान गये आपको आप सचमुच श्रेश्ठ है,मेरा प्रणाम स्वीकार करें सुनीता(शानू) report abuse
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मौन मुखरित हो गया जब, कट गई रातें सभी
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आँख ही से कह गई वो, प्यार की बातें सभी जिन्दगी के खेल में अब, चंद सांसे ही बची, ताजमहल सा रुप धर कर, आ रहीं यादें सभी bahut hi sunadr laag yah... report abuse
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वाह, वाह। बहुत सुन्दर। ये पंक्तियाँ खास कर:
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"बीज कितनी नफरतों के , बो रहे वो हर कदममुझको लगता है कि उनको, प्यार की हसरत नहीं." किंचित सुधार लय में: "मूक हुई शहनाई भी ." की जगह "मूक शहनाई हुई" कर दें। report abuse
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बीज कितनी नफरतों के , बो रहे वो हर कदम
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मुझको लगता है कि उनको, प्यार की हसरत नहीं. बहुत खूब समीर भाई. निखरते रहिये. प्यार की फ़ुहार बारिशों में बदले, यही कामना है report abuse
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बहुत खूबसूरत भाव हैं समीर जी। इतनी अच्छी रचना के लिये ढेर सारी बधाई।
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मैं विरह की आग में यूँ, हर घड़ी जलता रहा
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मातमी मौसम हुआ फिर , मूक हुई शहनाई भी . समीर भाइ आज पता चल आप गंभीर भी होते हो,और वहा भी झंडे गाड देते हो,मुझे भी किसी की दो लाईन याद आ रही है आपको पढकर "बोली यू विरहिन मन को मसोस कर काहे को बसंत,बस अंत अब आयो है" report abuse
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धूप सर पर इस कदर कि छुप गई परछाई भी बोला था, लू मे मत निकलना, नही, भरी दोपहरिया जाएंगे, अब झेलो। मैं विरह की आग में यूँ, हर घड़ी जलता रहा ऊ तो जलिबे करि.... लू मे मत निकला करो।
एल्लो, कनाडा वाले कम झेले है जो अब इधर वालों को परेशान करने आ रहे हो। भाई भारी भरकम शिप इधर ना भेजे जाएं। report abuse
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आपकी ये पंक्तियाँ तो मन को छू गईं...
ऐसा ही लेखन जारी रखें... बहुत धन्यवाद...