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सीसा कर रहा है बच्चों को नासमझ
पत्रिका - स्वास्थ्य
गुरुवार , , 07 जून

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  पंकज बेंगाणी 


 

 

 

 

 

 

 


tarakकक्षा 3 में पढने वाली शालिनी मेधावी छात्रा थी. लेकिन पिछले साल उसका परीक्षा परिणाम अच्छा नहीं आया. पढ़ाई पर से उसका ध्यान उचटने लगा. उसकी माँ उसे एक मनोचिकित्सक के पास ले जाती है. बाद में अध्ययनों से पता चलता है कि शालिनी के बिगड रहे नतीजों के लिए और कुछ नही पर उसकी पेंसिल जिम्मेदार है! यह घटना अजीब लग सकती है, पर वास्तविक है. दिल्ली निवासी शालिनी (छद्म नाम) अपनी एक आदत की वजह से परीक्षा में खराब नतीजे लाने लग गई था.

वास्तव में स्कूल के अंदर शालिनी जब भी परेशान होती थी या कुछ सोचती थी तो अपनी पेंसिल को मुँह में ले लेती थी. डॉक्टरों ने पता लगाया कि उसकी इस आदत की वजह से पेंसिल की नोक में इस्तेमाल होने वाला सीसा उसके शरीर में नियमित रूप से जा रहा था. और धीरे धीरे उसके शरीर में सीसे की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुँच गई और उसके ज्ञानकोषों को प्रभावित करने लगी. इससे उसके सोचने समझने की क्षमता भी प्रभावित हो रही थी और परीक्षा में उसका प्रदर्शन अपेक्षाकृत नहीं हो रहा था.

शालिनी को अपनी पेंसिल से सीसे का नियमित डोज मिल रहा था, लेकिन भारत के अधिकतर शहरों के नागरिकों के शरीर में भी सीसे की मात्रा बढती जा रही है. प्रतिदिन अशुद्ध हवा तथा पानी के सेवन से सीसे जैसे खतरनाक तत्व लोगों के शरीर में जा रहे हैं.

एक और उदाहरण बंगालुरू का दिया जाता है. भारत के सिलीकोन शहर बंगालुरू में भी पीने के पानी में सीसे की मात्रा बहुतायत में पायी जाने लगी है. इस आई.टी. शहर में हर रोज कम्प्युटरों का कबाड लगता है. कम्प्युटर के सर्किट बोर्ड में सोल्डरींग करने के लिए सीसा का इस्तेमाल होता है. कबाड में डाले गए बोर्ड में से केपेसिटर और माइक्रोचिप को निकालने के लिए उसे पिघलाया जाता है, जिससे सोल्डरींग में इस्तेमाल हुआ सीसा पिघल कर अलग हो जाता है और बाद में नालों से बहता हुआ तालाबों और भूगर्भ जल में भी मिश्रित हो जाता है.

और फिर यह दूषित पानी हर दिन लोगों के शरीर में जाता है. इस तरह से सीसा खून में मिलकर दिमाग के कोषों मे संग्रहित होता रहता है. हमारे शरीर में दिमाग में जमा हो रहे सीसे के कणों को निकालने की कोई उचित व्यवस्था नहीं है. इससे लम्बे समय के बाद इंसान के सोचने समझने की शक्ति पर विपरीत असर पडने लगता है. इसके अलावा हमारी हड्डियाँ 90 प्रतिशत सीसे को अपने अंदर समाहित कर लेती है. यह भी शरीर के लिए घातक सिद्ध होता है.

एक सर्वेक्षण के मुताबिक बंगालुरू के 40% बच्चों में हर डेसीलिटर खून में सीसे की मात्रा 10 माइक्रोग्राम है. कहना ना होगा भविष्य में इसके घातक परिणाम आ सकते हैं. आई.टी. सीटी बंगालुरू के बच्चों के शरीर तथा सोचने समझने की शक्ति पर  सीसे की अत्यधिक मात्रा के कारण विपरीत असर पड रहा है. यह उनके और देश के भविष्य के लिए कतई ठीक नही है.
 
 
 


 

टिप्पणियाँ (2)add
अरे
द्वारा प्रेषित समीर लाल , जून 13, 2007
बचपन में मैं भी पैंसिल चबाता था, बड़ा अच्छा लगता था स्वाद...अब पता चला कि नम्बर कम आने में मेरी गल्ती कम थी. उस पैंसिल की ज्यादा और मैं जबरदस्ती पिटता रहा..देख लूँगा पैंसिल को!!! smilies/grin.gif
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द्वारा प्रेषित सागर चन्द , जून 13, 2007
मेरी तो आज भी आदत है पेन्सिल को मुंह में लेने की, आप विश्वास नहीं करेंगे जब लेख पढ़ रहा था तब भी पेन्सिल मेरे मुंह में थी। अब पता चला कि क्यों दिन दिन मेरी याददाश्ट कमजोर होती जा रही है।

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