| आज मुझे कुछ कहना है... |
| कविता | |||
| बुधवार , , 13 जून | |||
टिप्पणियाँ
(9)
"पीर पराई सहता था मैं
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कभी न दिल की कहता था मैं जिन राहों पर कोई न चलता उन राहों पर रहता था मैं. " "मर मर के जिंदा रहने से बेहतर जी कर मरना है" ये जो शब्दों की समीर हैं हम सब मै एक सी बहती हैं, ये सब ऐसे ही हैं जैसे हर पहर की अलग अलग हवाएँ। एक हवा मै आप जीं रहे हैं एक हवा मै हम ... यतीष कतरा-कतरा report abuse
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अगर "मौन" यह है तो आवाज क्या होगी...वैसे मेरी निजी राइ है "मौन" शब्दों से जायदा बोलता है ...
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बहुत सुंदर लालाजी,
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लाजबाब लिखा है ....अच्छा लगा पढ़कर....बधाई report abuse
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आप तो बस कहते ही रहिए.. सुनने वाले लाखों में हैं..