| शुद्ध-घी से निर्मित कनपुरिया डीज़ल |
| रवि-वार्ता | ||
| गुरुवार , , 14 जून | ||
पहली नजर में तो आपको लगेगा कि वाह भई, क्या तकनीक ईजाद की है. अब हमें हमारे वाहनों के लिए ईंघन का टोटा नहीं रहेगा और ईंघन सस्ते भी हो जाएंगे. बहुत से – शाकाहारी-मांसाहारी विकल्प मिलेंगे वो अलग. परंतु इससे बहुत सी और, अन्य समस्याएँ पैदा होंगी इसकी ओर किसी की निगाह गई है भी? वनस्पति तेलों से बायो-डीजल बनने लगेंगे तो खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ेंगी. अब जनता के पास यही विकल्प बचा रह पाएगा कि या तो वह तेल को खा ले या उससे गाड़ी चला ले. और, यकीन मानिए, बहुत सी जवान जनता तेल को खाने के बजाए उससे गाड़ी चलाना पसंद करेगी. दूर किसी गांव में कोई मां अपने बच्चे को जो पूरियाँ खाने के लिए मचल रहा होगा उसे कुछ इस तरह से चुप कराएगी – चुप हो जा बेटा, चुप हो जा, अगले महीने तुझे जरूर पूरियाँ तल दूंगी. तब तमाम विश्व के राजनेता कुछ इस तरह के मनमोहनी भाषण देंगे – आप सभी से गुजारिश है कि आप तेलों से गाड़ी कम चलाएं. हो सके तो पैदल चलें. ताकि जनता को खाने के लिए तेल नसीब हो सके. अब वह खुद भले ही दो दर्जन कारों के काफ़िले के साथ चलता हो – परंतु वह जनता को पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल की सलाह देगा ताकि गरीब गुरबों को अपनी दाल बघारने लायक तेल मिल सके. प्राणियों के वसा से बायो-डीजल बनने लगेंगे तो पेटा एक्टिविस्टों और मेनकाओं का काम कई गुना बढ़ जाएगा. वे हर गाड़ियों के ड्राइवर को रोक रोक कर पूछेंगे – क्यों बे, तेरी गाड़ी प्राणी-वसा के बायो-डीजल से तो नहीं चल रही. उत्तर कोई भी मिले, वे उसके वाहनों के टैंकों की जाँच कराएंगे और यदि वे प्राणी-वसा के बायो-डीजल से गाड़ी चलाते पाए गए तो वे उनका जीना हराम कर देंगे, उनके विरूद्ध धरना प्रदर्शन घेराव करेंगे और उनका सामाजिक बहिष्कार करेंगे. सामाजिक बहिष्कार का खतरा प्राणी-वसा-बायो-डीजल युक्त वाहनों को और दूसरे तरीकों से भी रहेगा. साधु संत से लेकर शाकाहारी मिज़ाज वाले सभी ऐसे वाहनों को दूर से सलाम बजाते नजर आएंगे. कार-बस में चढ़ने से पहले वे ये पूरी तसदीक कर लेंगे कि कहीं ये मुआ वाहन प्राणी-वसा से बने डीजल से तो नहीं चल रहा. अलबत्ता बाजार में शुद्ध घी से बने प्रीमियम क्वालिटी के डीजल की खासी मांग रहेगी और वे सिर्फ मर्सिडीज़ बैंज सी क्लास और लिमोजिन जैसी गाड़ियों के लिए उपलब्ध रहेगी. ऐसी गाड़ियों में सवारी करना शान की बात होगी और वे भारत में सिर्फ चुनिंदा, एलीट - अभिजात्य वर्ग के लोगों को उपलब्ध रहेगी. साधु-संत सिर्फ शुद्ध घी द्वारा निर्मित डीजल से चलने वाली कारों से चला करेंगे और अपने भक्तों को शाकाहारी डीजल के इस्तेमाल के साथ साथ निर्वाण और सांसारिकता त्यागने का प्रवचन सदा की तरह देते रहेंगे. और, क्या पता – चिकन फ़ैट से बने डीजल से चल रहे वाहनों पर सफर करना कुछ यात्रियों को जरा ज्यादा जायक़ेदार लगे. इस नई ईजाद से दंगा-फ़साद का भी खासा भय रहेगा. किसी अफ़वाह के फैलने की देर बस होगी कि फलां पेट्रोल पम्प पर सूअर की चरबी का या फलां किसी दूसरे पेट्रोल पम्प पर गाय की चरबी का बना ईंघन बिक रहा है. बस, फिर हर ओर मार-काट मचेगी. दोस्त दोस्त को मारेगा, भाई-भाई को मारेगा. बिला-वजह मारेगा. अपने ही घर और शहर के हर संभव इनफ्रास्ट्रक्चर – रेल, बस, गाड़ियों को सदा की तरह जलाएगा. हे! कनपुरिया आविष्कारकों, ये तुमने क्या कर दिया. तुम्हें पता है कि तुमने ये आविष्कार कर समस्त मानव जाति को – खासकर हम भारतीयों को किस संकट में डाल दिया है? टिप्पणियाँ
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लेकिन आप कौन से डिजल से चल रहे है जरुर बताईये यहा कई दिनो मे एक पोस्ट का अकाल रहता है और आप चार चार बढिया माल छाप देते है