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क्या यही होती है 'Life in a Metro"?
मंतव्य
सोमवार , , 25 जून

 कल संडे की छुट्टी के दौरान, बाहर का मौसम देखकर कहीं जाने की इच्छा नहीं हुई. तो सोचा क्यों ना कोई फिल्म देखी जाए. मेरा मन किसी फिल्म को देखने के लिए आकुल व्याकुल हो रहा था, और मैने तैयारी कर ली थी कि मैं एक दर्जन सिनेमा चैनलों मैं रेंडमली किसी को भी पकड़कर उस पर आ रही कोई भी फिल्म देख ही लुंगा. फिर बात चली कि अनुराग बसु की "मेट्रो" देखी जाए. तो उसकी डीवीडी मंगाई गई और हमने अपने "होम" थिएटर (घर पर रखा टीवी) पर फिल्म देखनी प्रारम्भ की.

फिल्म के बारे में पहले से पढ सुन रखा था कि यह फिल्म महानगरों की जिंदगी की व्यथाओं पर आधारित है. इसलिए मैं और भी उत्सुक था कि चलो देखते हैं हमारी जिंदगी से कहाँ तक मेल खाती है यह फिल्म.

फिल्म की शुरूआत तो अच्छी ही रही पर धीरे धीरे फिल्म बोझिल होती चली गई और एक वक्त तो ऐसा आया जब मैं इतना बोर हो गया कि सोचने लगा कि कौन सा कोना पकड़कर नींद ली जाए. लेकिन अफसोस कि मुझे कोना नसीब नही हुआ और मैने अनमने मन से ही सही पुरी फिल्म देख ली.

अनुराग बसु, फिल्म के निर्देशक, काबिल व्यक्ति हैं. उन्होने अच्छी फ़िल्मे एवं धारावाहिक बनाए हैं. पर इस फिल्म में लगता है उन्होने तैयारी पुरी नहीं की. मधुर भंडारकर शैली की फिल्म बनाने के चक्कर में वे थोड़ा चुक से गए.

मुम्बई की भागम भाग, कॉलसेंटर का गोरखधन्धा, बॉस की सहेली स्टाफ, और उसके आंशिक का घर सबकुछ एक दूसरे से जुडा हुआ. फिल्म में दिखाया गया है कि कोई किसी से खुश नही हैं. और वे अपने मन की शांति बिस्तर पर ही पा सकते हैं. पुरी कहानी बेडरूम से शुरू होकर बेडरूम तक जाती लगती है.

 फिल्म की नायिका का पति उससे खुश नहीं तो अपने स्टाफ के साथ अपने दूसरे स्टाफ के घर में "मानसिक शांति" प्राप्त करने जाता है, नायिका किसी नाट्य कर्मी के अंदर अपना प्यार ढूंढने मे व्यस्त है, नायिका की बहन किसी भी किमत पर शादी करना चाहती है और ना हो पाने पर भारी डिप्रेशन में है, नायिका की मुहँ बोली माँ अपने 30 वर्ष पूर्व के प्रेमी को पुनः पाकर खुश है... यानि कुल मिलाकर अनुराग के हिसाब से "लाइफ इन अ मेट्रो" का मतलब बस यही लाइफ है. और कोई परेशानी नहीं, कोई खुशी नहीं, कोई चिंता नहीं!

मेरे हिसाब से तो फिल्म का नाम "लाइफ इन अ मेट्रो" ना होकर "लव इन अ मेट्रो" या फिर "लस्ट इन अ मेट्रो" होता तो ज्यादा सार्थक होता. बहरहाल फिल्म के अंत में निर्देशक बॉलीवुड मसाला फिल्मों के छोंक लगाने से बच नहीं पाया, और फिल्म बे स्वाद खिचडी बनकर रह गई.

अगर फिल्म में कुछ अच्छा है तो इरफान और कोंकणा शर्मा का शानदार ट्रेक, वैसे भी दोनों मंजे हुए कलाकार हैं. दूसरी गौर करने वाली बात है शिल्पा का अभिनय. वे बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं, पता नहीं क्यों उन्हे ढंग की फ़िल्मे नही मिलती.

खैर जो भी हो मैने रविवार दोपहर के तीन घंटे आखिरकार बिता ही दिए. और फिल्म खत्म होने पर सोचने लगा अब क्या करूँ. कहाँ मानसिक शांति ढुँढु.

मेरी "लाइफ इन अ मेट्रो" इतनी "फिकी" क्यों है?

 

टिप्पणियाँ (8)add
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द्वारा प्रेषित अतुल शर्मा , जून 25, 2007
भला किया जो आपने बता दिया। मैं देखने ही वाला था, बच गया smilies/grin.gif
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आभार
द्वारा प्रेषित समीर लाल , जून 25, 2007
हमारी अगली छुट्टी बचवा देने के लिये आभार, वरना यह मूवी हम भी झेल रहे होते. smilies/grin.gif अब आप इत्मिनान से सो जायें.
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बचा लिया!
द्वारा प्रेषित प्रतीक पाण्डे , जून 25, 2007
वाह भैया! इस फ़िल्म के बारे में हमें बताकर आपने हमें भावी परेशानी से बचा लिया, क्या पता कभी हमारा मूड भी फ़िल्म देखने का होता और आपकी तरह मेट्रो के चक्कर में फँस जाते।
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द्वारा प्रेषित Divyabh , जून 25, 2007
माफ कीजिएगा… आपने कुछ ज्यादा ही बुरा कह दिया इसे जबकि आपको नहीं लगता की सभी की जिंदगी बिस्तर से शुरु हो कर वही दम तोड़ देती है…ये बात अलग है सभी ने ड्रीम सेंसर लगा रखा है…।इस तरह की मुवी को Surria Realistic कहते है जो New wave cinema के नाम से भी जाना जाता।वैसे भी मैंने अपना सिनेमा का ब्लाग शुरु किया है…आप उसमें देखेंगे कोशिश है विश्व सिनेमा पर कुछ बाते की जाए…
अनुराग बासु ने थोड़ी नकल फ्रेंज मुवी मेकर गोदार की नकल की है…।
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भूख
द्वारा प्रेषित satyendra prasad srivastava , जून 25, 2007
और भी ग़म हैं जमाने में बिस्तर के सिवा
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आधी से ज्यादा द अपार्टमेंट की कापी है
द्वारा प्रेषित मिर्ची सेठ , जून 26, 2007
कापी करना बुरा नहीं है पर जब भेजा फ्राई जैसी मूवी कॉपी हो कर आती है तो मजा आता है। लाईफ इन मैट्रो भी कॉपी है पर असली वाली ज्यादा मजेदार है व अदाकार ज्यादा स्वाभाविक है। जरा यहाँ देखें

http://imdb.com/title/tt0053604/plotsummary
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द्वारा प्रेषित pankaj bengani , जून 26, 2007
अतुल शर्मा, प्रतीक पाण्डे

वैसे देखनी चाहिए एक बार तो देख सकते हैं. smilies/wink.gif

समीर लालजी


अब नींद कहाँ.. अब शांति चाहिए. smilies/cheesy.gif

Divyabh

अपना अपना नजरिया होता है दिव्याभ. मै यह नही कह रहा कि फिल्म एकदम बकवास है. लेकिन फिल्म की आत्मा या मूलकथा लचर है. और फिल्म के शीर्षक से कहानी मेल नही खाती. आपके फिल्मी ब्लोग का पता देने का शुक्रिया.

satyendra prasad srivastava

बात तो सही है. पर मुश्किल यह है कि एक समस्या बिस्तर भी है. smilies/kiss.gif

मिर्ची सेठ


लिंक देने के लिए तथा जानकारी बाँटने के लिए बहुत धन्यवाद. हाँ कहानी तो उडाई गई लगती है. भेजा फ्राय मुझे पसन्द आई थी, कृपया बताएँ कि कौन सी फिल्म की कॉपी थी. smilies/grin.gif
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द्वारा प्रेषित DHEERAJ , दिसम्बर 03, 2007
smilies/sad.gif smilies/shocked.gif smilies/cool.gif
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