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पहाडों पर लटकते हुए ताबुत
समाज
शुक्रवार , , 29 जून

pankajphoto

  पंकज बेंगाणी 


 

 

 

 

 

 

 


samaj-boeजीवन का शास्वत सच है कि हमारी मृत्यु भी होगी. दुनिया भर में अनगिनत जातियों और प्रजातियों के द्वारा अपने परिजनों के मृतदेह को प्रकृति में विलीन कर देने के लिए अलग अलग तरीके अपनाए जाते हैं.

हिन्दु मृतदेहों को जला देते हैं, वहीं ईसाई और मुस्लीम समाज जमीन में दफना देते हैं. ये सारी परम्पराएँ समय और माहौल के अनुसार बदलती रहती है.

प्राचिन समय में ऐसी ही एक जाति थी "बो", जो चीन और फिलीपींस के ईलाकों में निवास करती थी. इस जाति के लोग अपने परिजनों के मृतदेह को ना तो जलाते थे और ना ही दफनाते थे. लेकिन वे कुछ ऐसा करते तो जो आज अजीब लग सकता है.

वे मृतदेह को कोफीन में डालकर उसे ऊँचे पहाडों के शिखर के पास या ऊँची चट्टानों की दिवारों पर लटका देते थे. इसके पीछे की वजह है उनकी यह मान्यता की मृतदेह को जितना आकाश के नजदीक रखेंगे उतना ही वह भगवान के करीब होगा और उसे शान्ति मिलेगी.

और यदि कहीं वह कोफीन गुरूत्वाकर्षण के प्रभाव से देर सवेर गिर जाता था तो और भी शुभ माना जाता था क्योंकि कोफीन गिरने का मतलब होता था कि मृतदेह को मोक्ष मिल गया है.

लेकिन सोचने की बात यह है कि बो जाति के लोग उस प्राचिन काल में कोफीन को इतनी ऊँचाई तक कैसे पहुँचाते थे और किस तरह से उसे लटकाते थे? यह तो अनसुलझे रहस्य जैसा है.

 
 


 

टिप्पणियाँ (2)add
पहाड़ों पर लटकते ताबूत
द्वारा प्रेषित अविनाश श्रीवास्तव , अक्टूबर 15, 2008
सब बात कोरी बकवास है ऐसा आज तक न मैने सुना और न ही कभी किसी किताब या प्राचीन किताब में भी पढ़ा नहीं।
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द्वारा प्रेषित Tarakash Team , अक्टूबर 15, 2008
अविनाशजी, यह लेख शोध के बाद ही लिखा गया है. आप यह लिंक देखें : http://www.offthefence.com/con...php?ID=124

बो जाति के लोग सचमुच मे ऐसा करते थे.
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