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सब्र
कथा सागर
शुक्रवार , , 29 जून

manojkumar

 

मनोज सिंह 


 

  श्री मनोज सिंह चंडीगढ में कार्यरत हैं. उत्कृष्ट लेखक हैं. इनके कई उपन्यास एवं कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. 

 

 

 

 

 

 

 

story-rushमुंबई की तेज भागती जिंदगी मुझे कभी पसंद न थी। तीस वर्ष पूर्व नौकरी के सिलसिले में वहाँ जाने से ठीक पहले लोगों ने कहा था, 'जो बम्बई एक बार जाता है लौटकर नहीं आता और वहीं बस जाता है।` वहाँ की बढ़ती हुई आबादी से लगता है कि यह सच होगा। मगर मैं वहाँ बसने से पूर्व ही छोड़कर भाग आया था। अपने आपको दो सागरों के बीच फँसा हुआ महसूस करता था। एक ओर अरब सागर, ऊपर से शांत, स्थिर, गंभीर परंतु अंदर से चंचल; अपने नजदीक नहीं आने देता। दूर से देखकर ही उसकी विशालता को स्वीकार करना पड़ता। किनारे खड़े होकर ही उसके सौंदर्य को निहार पाता। दूसरी ओर अपार जनसमूह, समुद्र के विपरीत अशांत, अनियंत्रित व चलाएमान। मुम्बई वी.टी. हो या चर्च गेट रेलवे स्टेशन, सुबह सुबह देखने पर लगता था कि लोगों का अथाह समुद्र बेसब्री से कहीं भाग रहा है। एक बेरहम भीड़, जिसकी संवेदना मानव के मन से खिसक कर मानो लोगों के पैरों के नीचे कुचल गयी हो। समुद्र और भीड़ दोनों में विशालता के अलावा एक और समानता थी, दोनों के पास नजदीक जाते ही आपका अस्तित्व खत्म हो जाता और आप उसमें विलीन हो जाते। मुंबई की दिनचर्या में जिस जीवन के लिए सब कुछ किया जा रहा था उसी जीवन को जीने का वक्त नहीं था। जीवन एक मशीन था और मुम्बई इस तरह के जीवन का प्रतीक।


उस वक्त देश के अन्य हिस्सों में दृश्य भिन्न था। बाम्बे छोड़कर सीधे हिमाचल प्रदेश आने पर तो लगा था कि यही स्वर्ग है। विशाल एवं अत्यंत सुंदर हिमाचल के आँचल में जीवन शांत, संतुष्ट उदार और स्थिर था। ध्यानपूर्वक संस्कृति व दिनचर्या को देखने पर लगता कि मानो पहाड़ों ने मानव के पैरों में बेड़ियाँ बाँध दी हों, चाहकर भी आप दौड़ नहीं सकते। संगीत, नृत्य शैली और जीवन पद्धति सभी शांत एवं धीमा, परंतु सौंदर्य और खुशियाँ से लबालब भरा हुआ।


पिछले कुछ वर्षों में बम्बई की हवा ने पूरे देश को अपने आगोश में ले लिया। अब जहाँ भी निगाह डालो, वहीं लगता कि सभी भाग रहे हैं। क्यूँ, कहाँ और किसलिये? मुझे आज तक समझ नहीं आया था। लगता कि पहाड़ों ने इस हवा को कुछ हद तक रोक रखा है और चोटी पर बैठकर मैं अपने आप को सुरक्षित महसूस करता। मल्होत्रा जी के पिछले कुछ दिनों के अनुभवों सेे मेरे विचारों को आत्मबल मिला था। वह मूल रूप से पहाड़ के रहने वाले मैदान पर चलने वाली हवा में बहने लगे थे और मैं नीचे मैदान से आकर पहाड़ी संस्कृति में ढल चुका था।


हम दोनों हम उम्र थे साथ-साथ नौकरी ज्वाइन की थी। विचारों में समानता नहीं थी मगर दोस्त होने के लिये यह कोई जरूरी भी नहीं। कुछ वर्षों में ही उन्होंने अपार धन सम्पत्ति इकट्ठी कर ली थी। उनके लिए पैसा कमाने की कोई सीमा नहीं थी और उसकी कोई परिभाषा या नियम भी नहीं थे। उनके लिये रिश्वत अधिकार था। जहाँ से आये जैसे भी आये ले लेना और अगर कोई न दे तो छीन लेना। वह भौतिकता एवं विकास की दौड़ में बहुत आगे निकल गये थे और मैं बहुत पीछे रह गया था। वह अम्बाला से चंडीगढ़, मीटिंग के सिलसिले में जब भी आते, मुझे कोई हीन भावना हो न हो, उन्हें अभिमान व दंभ अवश्य रहता था। कुछ और नहीं तो बच्चों में ही फर्क करते थे। अपने लड़के को कम उम्र में ही सब कुछ दे दिया था- गाड़ी, मोबाइल, पैसा। तेज दौड़ते लड़के को देखकर, कहते जरूर थे कि धीरे चलाकर, परंतु चेहरे की मुस्कुराहट कुछ और बयान करती थी। सभी चीज जल्दी में करना चाहते थे। मुझे कहते भी थे, ''शर्मा तुम यूँ ही बूढ़े हो जाओगे। जीवन बहुत छोटा है सब कुछ पाने के लिए तेज दौड़ना पड़ता है।``


उस सब कुछ की परिभाषा, मैं कभी भी समझ नहीं पाया था। उन्हें शुरू से ही सब्र नहीं था और मुझे सदैव संतुष्टि रहती थी। कल भी फोन पर अतिशीघ्र मिलने का आग्रह करते-करते रोने लगे थे। कुछ दिनों से ऑफिस आना भी बंद था। पिछले महीने चंडीगढ़ मीटिंग में गया था तो उनकी अनुपस्थिति खल रही थी। वहीं सुना था कई बीमारियों ने उन पर कब्जा जमा लिया था। चल भी नहीं पाते थे। सुनकर धक्का लगा था। अभी उम्र ही क्या थी, रिटायर होने में पांच साल बचे थे।


छुट्टी का दिन था। घर से सुबह जल्दी अम्बाला के लिए निकल पड़ा था। सोचा मल्होत्रा जी को देख कर शाम तक लौट आऊँगा। वैसे तो पहाड़ी रास्तों में इंसान की तेजी कम चलती है। रोड सर्पीले व घुमावदार हैं। ऊपर से ट्रैफिक बढ़ गया है। विज्ञान ने बहुत उन्नति कर ली है, एक से बढ़कर एक गाड़ियाँ उपलब्ध हैं, हवा से बातें करने में सदैव तत्पर, मगर पहाड़ों पर ज्यादा तेज चलाने पर सीधे खाई, खड्ड में गिरने का डर रहता है। कार के बायेंे ओर के शीशे से बहार झाँकते ही खाई की ओर देखने पर आशुतोष की कार दुर्घटना याद आने लगी थी। सोचते ही सिहर गया था। जब दुर्घटनाग्रस्त कार क्रेन के द्वारा निकाली गयी थी तो उसके शरीर का अता पता ही नहीं चल पा रहा था कार भी टूटकर पूर्णरूप से खत्म हो चुकी थी। भयावह दृश्य की याद से घबरा कर पुरानी बातें भूलने की कोशिश में सामने नजर दौड़ाई तो देखा गाड़ियाँ पहाड़ों से टक्कर लेने को बेताब दौड़ रही हैं। उस दिन के बाद से तेज गाड़ी में और अधिक डर लगने लगा था। ड्राइवर को सदैव धीरे चलने की हिदायत देता रहता था। वैसे भी पहाड़ों पर जरा-सी भी चूक अर्थात एक तरफ खाई और दूसरी तरफ सामने से आती गाड़ियाँ। ड्राइवरों को सँभलकर चलना होता था। नीचे मैदान से आने वाले अधिकांशत: सावधान होकर वाहन चलाते। जो युवक अपनी चाल व ऊर्जा को नियंत्रित नहीं रखते उन्हें पहाड़ कभी माफ नहीं करता। आशुतोष के हश्र की भी यही वजह थी।


यही सब कुछ सोचते-सोचते ठंडी हवा से कब नींद लग गयी पता ही नहीं चला। पहाड़ों से नीचे उतरकर कालका पार करते ही गर्मी और पसीने से नींद खुल चुकी थी। चारों ओर कंक्रीट का बढ़ता जंगल और इन्सानी व्यावसायिक आपा-धापी दिखायी देने लगी थी। चंडीगढ़ के रास्ते अंबाला की ओर आगे बढ़ने पर भौतिकता, विकास व मानव निर्मित वैभव का नजारा देखकर आँखें फट रही थी। चमचमाती गाड़ियाँ तेज रफ्तार से भाग रही थी। नौजवान मोटर साइकिलों पर, कंधों व कानों के बीच मोबाइल लगाये, बात करते हुये दौड़ रहे थे। उनका समय शायद ज्यादा कीमती था। मगर किसलिये और किसके लिये सोच-सोच कर हैरानी हो रही थी।


चंडीगढ़-अम्बाला हाईवे पर गाड़ियों की लंबी कतार देखकर ड्राइवर ने ओवरटेक किया एवं दूसरी कतार में आगे बढ़ गया। यह तरीका मुझे शुरू से ही पंसद नहीं। मैं अपनी नाराजगी ड्राइवर को जाहिर कर रहा था और साथ ही साथ पहली कतार में खड़े ड्राइवरों व पैसेंजरों का रोष भरा चेहरा देखता जा रहा था। बड़ा खराब लगता है। आगे कुछ न कुछ परेशानी होगी इसीलिए तो टै्रफिक रुका है। इस बात को जानकर भी, नजरअंदाज करके हम दूसरी लाइन बनाने लगते हैं। यह विचार मैं व्यक्त करते-करते अपनी नापसंद को नाराजगी में परिवर्तित कर रहा था कि हमारे पीछे-पीछे चल रही कार का चालक बार-बार हॉर्न बजाने लगा। हम रुके हुये टै्रफिक के छोर के नजदीक पहुंचने तक पीछे वाली गाड़ी का हार्न सुनते रहे। रुकी हुई पहली कतार के बावजूद, दूसरी कतार में आगे बढ़ते रहने पर भी, पीछे गाड़ी वाले की जल्दबाजी देखकर मैं आर्श्चयचकित हो रहा था।


सामने एक दुर्घटना थी। एक कार और ट्रक की आमने-सामने की टक्कर थी। दो पुलिस वाले कुछ लोगों से बात कर रहे थे। क्रेन का इंतजार था। दुर्घटना बड़ी भयानक व ताजी थी। कार आधी ट्रक के अंदर घुस चुकी थी। मैंने गाड़ी से उतरकर आगे बढ़कर जिज्ञासावश देखना व पूछना चाहा था कि पीछे कार वाला तीसरी कतार बनाता हुआ आगे बढ़कर दुर्घटनास्थल को पार करने की कोशिश करने लगा। पुलिस वाले की सीटी का असर और जगह न होने पर उसे वापस तीसरी लाइन में लौटना पड़ा था। इस तरह चार लाइन की सिंगल रोड पर तीन एक तरफ और तीन दूसरी ओर की लाइनें बन चुकी थी। इस तरह से रोड के बंद हो जाने के कारण, क्रेन के आने में परेशानी भी हो रही थी।


''क्या हुआ?`` मैं पुलिस वाले से पूछ रहा था।
''एक्सीडेंट है साहब।`` सीधा सा जवाब था।
''कैसे?``
''कार वाला बहुत तेजी में था। ओवरटेक कर रहा था। सामने से आ रहे ट्रक से भिड़ गया, ड्राइवर और बगल की सीट वाले की बॉडी को अभी-अभी किसी तरह कार का शीशा तोड़कर निकाला है।`` पुलिस वाला एक सांस में बोल गया था।


''पता नहीं क्या हो गया है लोगों को, कैसे चलाते हैं?`` पीछे वाली कार का ड्राइवर, जो एक नौजवान कार मालिक लग रहा था, उसे भी उतरकर घटनास्थल पर नजदीक आता देख मैं बोल पड़ा। कार के क्षतिग्रस्त हालात ने मुझे आशुतोष की फिर याद दिला दी थी जिसका प्रतिबिंब मैं उस नौजवान की तेजी में देख रहा था।
''सब्र नहीं है साहब।`` पहला पुलिस वाला सीधी सपाट बात कर रहा था।
''हर कोई जल्दी में है।`` दूसरे पुलिस वाले ने उसका साथ दिया था।
''अब देखिए, जानते हुये भी दोनों ओर तीन-तीन, चार-चार पंक्तियाँ बना डाली। क्रेन को आने में तकलीफ हो रही है और रास्ता खुलने पर भी आप लोगों को ही तकलीफ होगी। मगर कोई समझने को तैयार ही नहीं।`` दोनों पुलिस वालों ने सभी लोगों को, जो वहां खड़े थे, देखकर कहा था।


तभी चौथी लाइन बनाता हुआ साथ में सायरन बजाता हुआ, एक लालबत्ती कार का चालक किसी अधिकारी या नेता को लेकर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगा। परंतु नाकामयाब होने पर बची हुयी सड़क को भी घेरता हुआ वहीं खड़ा हो गया।


सभी जो पहले, दूसरी और तीसरी कतार बनाकर, स्वयं गलती कर चुके थे, गुस्से से लाल बत्ती कार के ड्राइवर को देखने लगे। मानो सिर्फ उसी ने गलती की हो। दोनों पुलिस वाले थोड़ा सतर्क होकर बुदबुदा उठे,

''अब सायरन क्यों बजा रहा है, उड़कर जायेगा क्या?``

 मैं सुनकर अनायास ही मुस्कुरा उठा था।


थोड़े समय में, क्रेन ने आकर रास्ता साफ किया ही था कि बिना कुछ देखे तीसरी लाइन का वह नौजवान ड्राइवर सभी को पीछे छोड़ कर फुर्र से आगे बढ़ गया और साथ ही पीछे-पीछे सायरन वाला भी उतनी तेजी में गया था। दो लोगों की दुर्घटनास्थल पर ही मौत को देखकर भी उनमें कोई फर्क नहीं था।


''पंद्रह दिन की ड्राइवरी है साहब, इन लोगों का यही होगा। खुद तो मरते हैं, परंतु बड़ी गाड़ी वाले को गलती न होने पर भी भुगतना पड़ता है...।`` गाड़ी में बैठते ही ड्राइवर बोल रहा था।

आगे गया कार वाला किसी से भिड़ न जाये, ऐसी दुआ करता हुआ मैं ड्राइवर की बातें सुनता रहा। साथ ही सोचता रहा कि मरने के बाद सभी जीवित परिजनों को ज्यादा भुगतना पड़ता है। मलहोत्रा जी भी एकलौते पुत्र आशुतोष के जाते ही पूर्णरूप से जीते जी खत्म हो चुके थे। अब उन्हें पश्चाताप था और मरने का बेसब्री से इंतजार...।


रास्ते में दोनों ओर की हरियाली और देश के विकसित क्षेत्र को मैं देख रहा था और सोचने लगा, क्या हम वास्तव में पूर्णरूप से विकसित हो पाये हैं? 

 

 

लेखक परिचय (यहाँ Click करें)
मनोज सिंह
४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ़. निजि संजाल: http://www.manojsingh.com

 



 



टिप्पणियाँ (12)add
good story
द्वारा प्रेषित manjit , जून 29, 2007
after long time i have read such touching, simple but great story.
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Nice
द्वारा प्रेषित pankaj bengani , जुलाई 02, 2007
दिल को छू लेने वाली कहानी लगी. बहुत बढिया. smilies/smiley.gif
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मार्मिक
द्वारा प्रेषित समीर लाल , जुलाई 02, 2007
ाति मार्मिक और दिल को छू लेने वाली कथा. काश, लोग अंतर्निहित संदेश समझ पायें.
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...
द्वारा प्रेषित सागर जैन , जुलाई 02, 2007
बहुत खूबसुरत कहानी,और आपके लिखने की शैली बहुत कमाल की है।
ऐसी घटना स्वयं मेरे सामने हो चुकी है जब एक कार उस कार को ओवरटेक करती हुई आगे निकल गयी और दस कि मी आगे जाने के बाद एक ट्रक से जा भिड़ी, कोई नहीं बच पाया। वह दश्य याद आता है तो रोंगटॆ खड़े हो जाते हैं।
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good story
द्वारा प्रेषित sumit , जुलाई 04, 2007
good story
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true story
द्वारा प्रेषित anil , जुलाई 04, 2007
is it true story or your imagination. but in both the cases it is great writing.
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...
द्वारा प्रेषित sushil , जुलाई 08, 2007
this is one of the fine writing of manoj singh, i have read so far.
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मेरी कलम
द्वारा प्रेषित Zakir Ali 'Rajneesh' , अगस्त 14, 2007
इस सुन्दर रचना को पढकर बहुत अच्छा लगा। बधाई स्वीकारें।
ज़ाकिर अली 'रजनीश'
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sukriya
द्वारा प्रेषित manoj singh , अगस्त 16, 2007
manjeet, pankaj, sameer,sagar ,sumit,anil,sushil,zakir sahab dhanyavad
manoj singh
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द्वारा प्रेषित KK RAJPUT , सितम्बर 29, 2007
मनोजजी,

जो विषय आपने चुना वाकई सराहनीय हे और आपकी शैली और भाषा बेहद ही प्रभावशाली हे. आजके इन्सान की विडम्बना यही हे कि वो पागलों के समान दौड़ रहा हे और इस उधेड़बुन मे उन मूल्यों का हनन कर रहा हे जो हमारी धरोहर हे. आधियात्मिक जीवन की परिभाषा बदलने वाले भूल रहे हे कि इसकी कीमत इक पीढ़ी को चुकाना पडेगी और पुराणी पीढ़ी के लोगो को यह जहर पीना पड़ेगा.

आशा करता हूँ कि आपके इस प्रयास का लोगो पर असर होगा. आपकी कलम निरंतर इसी तरह बहती रहे.

कमल राजपूत
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kahani
द्वारा प्रेषित narin anand , मई 25, 2008
manojji kahani bahut marmik hai. aapne vishya baut achccha chuna hai.
bahut din ke baad achchhi kahani padhne ko mili.
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definettally it a nice story manoj jee you choose a nice topic because in present time it is a great problem thank you very much
द्वारा प्रेषित shivprakash , जुलाई 05, 2008
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