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मुफ्त का चंदन घस मेरे नंदन
मंतव्य
शनिवार , , 30 जून

आजकल पता नहीं क्या हो गया. बिजली को जलते देख मेरी उँगली तुरंत स्वीचबॉर्ड की तरफ बढने लग जाती है. इच्छा होती है लाइट बंद कर दूँ. यह मेरे सनकीपन की नई मिसाल है.

ऑफ़िस से घर आते हैं, तो शाम घिरने लग जाती है. अपार्टमेंट के लिफ्ट में घुसते ही जो पहला काम मैं करता हुं वो होता है लिफ्ट की लाइट बंद कर देना. फ्लोर पर जाने का बटन तो बाद में दबाता हुँ. कभी कभी मेरी बहना मुझे टोकती भी है, "पागल हो क्या! रात को तो लाइट जलने दो, कोई स्विच कैसे देखेगा". मुझे भी लगता है, यार बात तो सही है, फिर सोचता हुं, कोई लिफ्ट में नहीं हुआ तो? अब अगर कोई आएगा और उसे स्विच नहीं दिखेगा तो लाइट जला लेगा. पर फिर घर पहुँचकर सोचता हुँ तो हँसी आती है. अजीब सनक है मेरी.

कुछ दिन पहले किसी को लेने हवाई अड्डे गया तो देर रात घर वापस आते समय देखा सुनसान सडक पर सारी स्ट्रीटलाइट जल रही है. अब मेरा मन बैचेन होने लगा, पर क्या करता उन लाइटों का तो कोई स्वीचबॉर्ड नहीं होता. होता भी है तो मेरे पल्ले नहीं पडने वाला था. तो बस घर तक यही बहस करता रहा कि रात को सारी लाइटें क्यों जला कर रखी है. इससे अच्छा एक खम्भे की जलाकर रखें उसके अगले की बंद कर दें. तो भी बिजली बच जाएगी.

किसी के घर जाता हुँ और यदि देखता हुँ किसी कमरे में पंखा यूँ ही चल रहा है तो फिर मन बैचेन होने लगता है. कई बार मैने उठकर लाइट पंखे बंद भी किए हैं. भले ही मेरे "जजमान" कहते रहें, अरे रहने दीजिए, कोई होगा कमरे में. पर क्या करूँ ऐसी आदत पड गई है कि हटती नहीं.

मैने देखा है कि जागरूक तो सभी होते हैं, पर थोडा सा आलस और थोडी से लापरवाही से हम बिजली का अत्यधिक व्यय करते हैं. देश में वैसे ही बिजली की इतनी तंगी है. कई कई जगह तो 5-6 घंटे तक लॉड शेडिंग होती है. हांलाकि मुझे इसका ज्यादा अनुभव नहीं है, क्योंकि हमारे यहाँ बिजली नहीं जाती. इसलिए कभी कभार तकनीकी कारणों से 10-15 मिनट भी चली जाए तो हालत खराब हो जाती है. तब सोचता हुँ यहाँ भी लॉड शेडिंग शुरू हो गई तो? ख़्वाब ही भयानक है.

और ऐसा हो भी सकता है, आखिर हम लोग इतने लापरवाह हैं कि 10 सेकन्ड की स्वीच बन्द करने की जहमत भी नहीं उठाते और बिजली व्यर्थ ही जलती रहती है. खुद के घर में तो फिर भी बिल भरने का टेंशन रहता है, लेकिन सरकारी महकमों में तो कहना ही क्या?

मेरा एक बार यहाँ के ONGC कार्यालय में जाना हुआ. दोपहर का समय था, लंच ब्रेक चल रहा था. एक फ्लोर पर जाकर मैने देखा कि गलियारे से लेकर हर केबीन के लाइट - पंखे, एयरकडीशनर सब पूरजोश में चालू हैं लेकिन उनका लाभ उठाने वाला एक भी इंसान नहीं है. चपरासी से पूछा तो वो बोला, लंच ब्रेक में गए हैं. मैने कहा - तो लाइटें तो बन्द कर दो. इस बार उसने मुझे जिन नजरों से देखा उससे मैं समझ गया कि यह मुझे गुरूघंटाल समझ रहा है. "इतने बडे फ्लोर की लाइटें बंद करने में रात हो जाएगी, और फिर जलाएगा कौन?" - यह उसका कहना था. अब सोचिए बाबुलोग वापस आकर अपने केबिन की बत्ती भी नही जला सकते!

मुफ्त का चन्दन है मर्जी आए उतना घसते रहो. बिल तो सरकार भरेगी और हमारे टैक्स से वसूलेगी.

यह तो छोडिए मुझे मेरे मित्र ने (जिनके पिता ONGC में कार्यरत थे) ने बताया की ONGC कॉलोनी में रहने वाले निवासी अपने गैस का चुल्हा भी बन्द नहीं करते. चौबीसों घंटे गैस का चुल्हा जलता ही रहता है, मानो अमर जवान ज्योति हो! क्यों? क्योंकि गैस तो मुफ्त है. कोई पैसा नहीं. अब भले ही आम लोगों के लिए गैस का सिलिंडर महँगा होता जा रहा हो, या फिर सरकार सबसिडी के बोझ तले दब रही हो. अब सोचिए जिन राज्य सरकारों ने किसानों को मुफ्त बिजली दी हुई है,वहाँ क्या हाल होता होगा.

मुफ्त की चीज की कोई किमंत नहीं होती. तब लापरवाही और भी बढ जाती है. मैं समझ नहीं पाता लोग इतने लापरवाह , इतने बे-परवाह क्यों है?



 

टिप्पणियाँ (10)add
kya khub kahi........
द्वारा प्रेषित Dilip mehta , जून 30, 2007
smilies/grin.gif, khub kahi

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unmindful machines
द्वारा प्रेषित Pratik Pandey , जून 30, 2007
जो लोग बिलावजह संसाधन बर्बाद करते रहते हैं, दरअसल ये ज़िन्दा नहीं हैं। ये लोग विचारहीन मशीन हैं। जो यांत्रिक तौर पर रोज़मर्रा का काम करते रहते हैं।
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ठीक है भाइ
द्वारा प्रेषित aroonarora , जून 30, 2007
क्या बात है संजय जी आज आप लाईट बचाने की बात कर रहे है,बहुत अच्छी बात है लगता है कल आपको हमारा पानी बचाने का आईडीया बहुत भा गया है.फ़िर तो हम वादा करते है कि लाईट बचाने मे भी आपका सहयोग करेगे और बाकी वक्त वक्त पर आपको टिप्पणि मे सुझाव भी झिला दिया करेगे smilies/smiley.gif
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...
द्वारा प्रेषित pankaj bengani , जून 30, 2007
Dilip mehta

धन्यवाद.

Pratik Pandey


मित्र यंत्रो को तो फिर भी नियंत्रित कर सकते हैं, ये लोग तो बेकाबु होते हैं. smilies/kiss.gif

aroonarora

क्या बात है संजय जी आज आप लाईट बचाने की बात कर रहे ह


क्या मैं संजय जी को पंकज जी पढ सकता हुँ? smilies/wink.gif
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..
द्वारा प्रेषित Amit , जून 30, 2007
अरे लेख की शुरुआत में तो मन्ने लगा कि थारे पे कोई भूत-वूत आ गयो है, सो मैं तन्ने अमदाबाद ही के एक बाबे का पता बतान की सोच रिया था, पर आगे पढ़ा तो जान्ना कि यो तो कोई ओर ही बात से! smilies/wink.gif

मेरा एक बार यहाँ के ONGC कार्यालय में जाना हुआ. दोपहर का समय था, लंच ब्रेक चल रहा था. एक फ्लोर पर जाकर मैने देखा कि गलियारे से लेकर हर केबीन के लाइट - पंखे, एयरकडीशनर सब पूरजोश में चालू हैं लेकिन उनका लाभ उठाने वाला एक भी इंसान नहीं है. चपरासी से पूछा तो वो बोला, लंच ब्रेक में गए हैं. मैने कहा - तो लाइटें तो बन्द कर दो. इस बार उसने मुझे जिन नजरों से देखा उससे मैं समझ गया कि यह मुझे गुरूघंटाल समझ रहा है. "इतने बडे फ्लोर की लाइटें बंद करने में रात हो जाएगी, और फिर जलाएगा कौन?" - यह उसका कहना था. अब सोचिए बाबुलोग वापस आकर अपने केबिन की बत्ती भी नही जला सकते!

हाँ भई, यह लगभग हर सरकारी दफ़्तर की हालत है, सरकारी ही क्यों, कुछ अपवादों को छोड़ प्राईवेट दफ़्तरों में भी यही हालत है। जो लोग अपने घर में बिजली आदि सावधानी से बरतते हैं वही दफ़्तरों में ऐसे खुला प्रयोग करते हैं जैसे पता नहीं क्या हो।
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...
द्वारा प्रेषित pankaj bengani , जून 30, 2007
Amit,

कुछ अपवादों को छोड़ प्राईवेट दफ़्तरों में भी यही हालत ह

सही बात है, मुफ्त की चीज मिलते ही बस... smilies/angry.gif
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द्वारा प्रेषित ghughutibasuti , जून 30, 2007
मुफ्त की चीजों का अधिकतर दुरुपयोग ही होता है । मैं अपने स्कूल में बच्चों की एक बात से बहुत प्रसन्न हूँ कि २० मिनट की रिसेस में वे याद से पंखे बंद करके बाहर जाते हैं ।
घुघूती बासूती

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द्वारा प्रेषित mamta , जून 30, 2007
इन्सान की फितरत ही ऐसी है कि मुफ़्त की चीज़ बेख़ौफ़ इस्तेमाल करते है वो चाहे बिजली हो या गैस ।
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जागरुकता
द्वारा प्रेषित समीर लाल , जून 30, 2007
बड़ा सार्थक कदम है, सनक नहीं. तुम अपना बत्ती बुझाने और दुरुपयोग कम करने का काम करते रहो और लोगों को भी प्रेरित करो. ऐसे ही किसी भी बड़े अभियान की नींव रखी जाती है. इसकी आवश्यकता है. बधाई और शुभकामनाऎं
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अच्छी कही!!
द्वारा प्रेषित kakesh , जुलाई 04, 2007
उत्तम विचार हैं जी आपके यदि सब आपकी तरह सोचॆं तो हम एक महान देश की नींव रख सकते हैं.
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