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तेजी से फैलता वीडियो गेम का ज़हर |
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समाज
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शुक्रवार , , 06 जुलाई |
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पंकज बेंगाणी
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स्पाइडरमैन, सुपर मैन और क्रिश जैसे काल्पनिक पात्रों को अपना आदर्श मानने वाले बच्चों की मानसिक स्थिति पर इन पात्रों की वजह से क्या असर पड सकता है, यह सोचने की जहमत उनके अभिभावक कम ही उठाते हैं. ये काल्पनिक पात्र तो फिर भी सामाजिक उत्तर दायित्वों को निभाते हुए दिखाई पडते हैं, लेकिन इनके अलावा कुछ ऐसे और पात्र और विडीयो गेम्स हैं जो बच्चों को क़ानून को हाथ में लेना तथा हिंसा करने के नए नए तरीके सिखाते प्रतीत होते हैं.
भारत में इस तरह के वीडियो गेम्स का चलन इन दिनों तेजी से बढ रहा है, लेकिन अमरीका और यूरोप के देशों में यह व्यापक रूप से फैल चुका है.
हाल ही में ब्रिटेन ने दशकों की माथा पच्ची के बाद एक अति हिंसक कम्प्यूटर गेम मैनहंट 2 पर प्रतिबंध लगा दिया है. इस गेम में एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो लम्बे समय तक जैल में रहने के कारण अपना मानसिक संतुलन खो देता है और फिर जेल में अपने साथियों को और सिपाहीयों को मारने लग जाता है.
इसमें कुल्हाडी, शोर्टगन, और ज्वलनशील हथियारों से लैस होकर अन्य किरदारों को मारना होता है.
इस अतिहिंसक और विकृत खेल का कितना बुरा प्रभाव बच्चों के मन पर पडता होगा यह सोचने की ज़िम्मेदारी ना तो इस तरह के गेम बनाने वाली कम्पनियाँ उठाती हैं और ना ही बच्चों के अभिभावक उठाते हैं.
इससे पहले भी कार्मागेडन और डेथरेस जैसे वीडियो गेम्स पर भी भारी विरोध दर्ज करवाया गया था. कार्मागेडन में जहाँ अपने प्रतिद्वन्द्वी को घिनोने तरीके से मारना होता था वहीं डेथरेस गेम में सडक पर धुँआधार तरीके गाडी चला कर सामान तोडना और राह चलते नागरिकों को कुचलना होता था.
आज भी इस तरह के कई खेल बाज़ार में आते ही जा रहे हैं और इन पर अंकुश लगाने का कोई कारगर तरीका और कानून नही है.
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