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जीवन एक जुनून है
मेरे विचार
सोमवार , , 09 जुलाई
manojkumar  मेरे विचार - मनोज सिंह द्वारा


बचपन में दिनभर, किसी भी तरह, घर से बाहर भागकर खेलने जाने का जुनून रहता है। अक्सर बच्चों में यह आदत पागलपन की हद तक पायी जाती है। मिठाई, पहले के बच्चों की कमजोरी होती थी तो आज फास्टफूड, चाकलेट, चिप्स बेहद पसंद किए जाते हैं। विज्ञान ने दुनिया बदली तो बच्चों का जुनून भी बदल गया। अब वो वीडियो गेम के लिए भी पागल होते देखे जा सकते हैं। मुझे इसके अतिरिक्त एक और जुनून था, 'अधिक से अधिक नंबर लेकर कक्षा में प्रथम आने का`। और यह स्कूल की अंतिम क्लास तक बरकरार रहा। आज के प्रतिस्पर्द्धा के युग में इसे बड़ा अच्छा माना जाता है। बच्चों का स्कूल की पढ़ाई में दिल लगे न लगे लेकिन आधुनिक भारतीय मां-बाप में अपने बच्चों को इंजीनियर-डाक्टर बनाने का जुनून आम देखा जा सकता है। और इसकी चाहत बढ़ती ही जा रही है। लाखों खर्च कर कोचिंग में दाखिला दिला देने मात्र से बड़े-बड़े कॉलेज के ख्वाब देखे जाने लगते हैं फिर बच्चा चाहे गधा ही क्यूं न हो। उधर, इंजीनियरिंग कॉलेज तो मैं पहुंच गया मगर पहुंचते ही मेरा मन पढ़ने से उचटने लगा था। यह अभिभावक के लिए एक पहेली हो सकती है मगर ऐसा अक्सर होता है। और फिर इसका संक्षिप्त में जवाब भी दिया जा सकता है कि जवानी का जुनून छाने लगा था।
 

युवा अवस्था में शारीरिक प्रेम का आकर्षण होना प्राकृतिक होता है। लड़कों को सभी लड़कियां सुंदर लगती हैं तो लड़कियों को हर लड़का हीरो दिखाई देता है। मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही था और फिर विपरीत लिंग के साथ किसी न किसी तरह से संबंध बनाने का जुनून शुरू हुआ था। जो अब तक कायम है। सच कहें तो यह भूख कभी खत्म नहीं होती, हो ही नहीं सकती। हां, विभिन्न कारणों से दब जरूर जाती है। वैसे भी उम्र के साथ-साथ अन्य जुनूनों की संख्या भी बढ़ती चली जाती है। जिससे ध्यान थोड़ा बंट जाता है। नयी से नयी मोटरसाइकिल-गाड़ियों का जुनून और फिर उसे तेज चलाने का पागलपन। फैशनेबल कपड़ों का जुनून। मस्ती के लिए किसी भी नशे का जुनून। आदमी इस उम्र में हवा में होता है। गर्मी सिर चढ़कर बोलती है। कॉलेज से निकलते ही कुछ की हवा सड़क पर निकल जाती है अन्यथा नौकरी लगते ही पैसे का जुनून, अधिक से अधिक पॉवर बटोरने का जुनून।
 
वैसे यह आज के युग में सर्वाधिक प्रचलित व लोकप्रिय जुनून है। जिसे देखो अधिक से अधिक कमाने की होड़ में लगा हुआ है। बैंक में रखे पैसों के आगे अनगिनत शून्य लगवाने का जुनून। लखपति फिर करोड़पति फिर अरबपति, और एक अंतहीन अंकगणित। लड़कियों में बचपन से ही संुदर दिखने की चाहत अक्सर जुनून की हद तक पहुंच जाती है। जिसमें गोरा और पतला होना प्रमुखता से शामिल होता है। और फिर उम्र के साथ-साथ औरतों में गहनों का जुनून तो किसी को साड़ी-सलवार सूट का जुनून। वैसे हजारों-सैकड़ों जूते-चप्पल, सैंडल रखने वालों की भी कमी नहीं है। जवानी में कदम पड़ते ही सजने संवरने का जुनून।
 
लड़का हो या लड़की प्राकृतिक रूप से दोनों में प्रेम करने का जुनून बराबरी से होता है। और फिर दोनों में ही, अपनी शादी को यादगार व अनोखा बनाने का जुनून सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं विदेशों में भी देखा जा सकता है। पहले जमाना था जब रईस मां-बाप को शौक होता, तब कहा जाता था कि अमुक-अमुक शहर के हलवाई को बुलाया गया है। वधू पक्ष का जुनून देखने लायक होता था जब किसी के यहां पकवानों की संख्या पर होड़ लगती तो अक्सर वर पक्ष दहेज में ली जाने वाली सामान की लिस्ट लंबी करता चला जाता। आजकल यह जुनून आगे बढ़कर दूल्हा-दुल्हन तक में पहुंच चुका है। और ये अपनी शादियों में कुछ नया करना चाहते हैं।
 
बड़े से बड़े होटल, रिसोर्ट, पुराना महल यहां तक कि पूरे द्वीप में शादी करने के नये-नये तरीके खोजे जाते हैं। कोई हवाई जहाज में तो कोई पनडुब्बी में शादी करने के लिए तैयार हो जाता है। कुछ अलग करने का जुनून। अब एक नया चलन है जितनी जल्दी शादी उतनी जल्दी तलाक और फिर अधिक से अधिक बार शादी करने का जुनून। शादी के बाद चाहे रोज गृहयुद्ध हो, शादी के चर्चे करवाने का जुनून।
 

जुनून का सिलसिला यहीं आकर नहीं रुकता। जवानी के उतरने के साथ अपनी चाहतों को बच्चों पर थोपना प्रारंभ हो जाता है। बच्चों से पढ़ाई में अधिक से अधिक नंबरों की अपेक्षा, उसे अपनी इच्छानुसार पढ़ाने का जुनून, उस पर अपनी महत्वकांक्षाओं को लादने का जुनून। और फिर नाती-पोतों तक यह सिलसिला जारी रहता है। साथ-साथ मकान बनाना व अन्य मौलिक वस्तुओं को इकट्ठा करने का जुनून चलता रहता है।
 

जुनून आम से लेकर खास तक सभी में एक समान रूप से प्रभाव जमाये हुए है। बस फर्क सिर्फ इतना है कि बड़ों का पागलपन पूरा हो जाता है तो छोटो की इच्छाएं दबकर मर जाती हैं। राजे-महाराजे भी इससे न बच सके। किसी को महल बनाने का जुनून तो किसी को राज्य विस्तार का। सुंदर औरतों को पाने की इच्छा तो फिर इनका हक हुआ करता था। हरम में सैकड़ों औरतों को रखना एक जुनून ही तो था जो आज भी आदमी का वश चले तो वो जरूर करे। प्रसिद्ध लोगों का जुनून तो सिर चढ़कर बोलता है। फिर चाहे फिल्मी हीरो हो या हीरोइन, सभी अपनी फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर हिट होने की चाहत रखते हैं। और फिर हिट होने पर एक और सुपरहिट की इच्छा, अधिक से अधिक पारिश्रमिक लेने की अभिलाषा, ज्यादा से ज्यादा फिल्में साइन करना, यह जुनून बढ़ता चला जाता है।
 
राजनेताओं की तो बात ही क्या करना, उन्हें तो जल्दी से जल्दी वार्ड के चुनावों से सीधे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का जुनून होता है। और अगर पहुंच गये तो एक और टर्म का जुनून और अगर कहीं यह भी मिल गया तो फिर जीवन पर्यंत उसी कुर्सी पर बने रहने का जुनून। ऐसा नहीं कि इन्हें सिर्फ पद का जुनून होता है। पैसा कमाना तो इनका जन्मसिद्ध अधिकार है जो इनके खून में शामिल होता है। व्यापारी का तो यह एकमात्र ध्येय होता है और वे इस बीमारी से सर्वाधिक ग्रसित होते हैं। पहले एक कारखाना फिर इनकी संख्या बढ़ाने का जुनून। हर साल धंधा फैलाने का जुनून। व्यापार को पहले शहर से राज्यस्तर तक पहुंचाना फिर देशभर की मार्केट पर कब्जा करना और फिर विश्व व्यापार पर एकाधिकार। फिर भी इसका कोई अंत नहीं होता। और फिर शीर्ष पर पहुंच गये तो वहां बने रहने का जुनून। इस पैसे का जिंदा, चलता-फिरता जुनून देखना हो तो किसी भी स्टॉक एक्सचेंज को देखा जा सकता है।
 

लगता है जुनून और आदमी की फितरत का चोली-दामन का संबंध है। वो यहां तक भी अपने विज्ञान के सहारे एक जुनून के तहत ही पहुंचा और पता नहीं कहां तक, कब तक चलता चला जाएगा। कल्पनाओं, इच्छाओं, चाहतों, मोह, महत्वकांक्षा की कोई सीमा नहीं है। और आज के युग में तो जुनून की चांदी है। नये-नये जुनून और उन्हें पूरा करने की प्रतिस्पर्द्धा। इसे जुनून का युग भी कहा जा सकता है। भीड़ में अलग से दिखने का पागलपन भी आजकल बहुत सामान्य बात है। जो आजकल अधिकांश जुनूनों के मुख्य कारणों में से एक है। मरते दम तक इन जुनूनों का सिलसिला चलता रहता है। इन्हीं जुनूनों से निकलने के लिए बहुत सोची-समझी व विकसित मानसिकता के साथ मैं लेखन में आया था। परंतु इस ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा। उलटे लेखन में आने के बाद तो जुनूनों की संख्या और तीव्रता से बढ़ती चली गयी। अधिक से अधिक पाठक बने, प्रकाशित पुस्तकों की संख्या में जल्दी से जल्दी वृद्धि हो, ज्यादा से ज्यादा चर्चा में आऊं, बार-बार छपने का जुनून। और फिर हर तथाकथित बुद्धिमान की तरह अपनी बात को ऊपर रखने का जुनून।
 

मुझे भी अन्य लेखकों की तरह सबसे पहले अधिक से अधिक लिखने का जुनून प्रारंभ हुआ। फिर लेखन चाहे जैसा भी हो इसके बाद उसे छपवाने का जुनून आया। पहले लेख का एक समाचारपत्र में छपना फिर दो में और फिर अचानक आया इनकी संख्या बढ़ाने का जुनून। शुरू-शुरू में शहर के स्तर पर छपा करता था फिर प्रदेशस्तर और फिर राष्ट्रीय स्तर के अधिक से अधिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने का जुनून। कहीं भी एक बार छप गये तो अधिकाधिक बार छपने का जुनून। आज मुझे इसका कोई अंत दिखाई नहीं देता। यहां तक कि इंटरनेट पर भी किसी एक वेबसाइट पर आने पर कई वेबसाइटों पर आने का जुनून और फिर इस बात की चिंता बनी रहती कि मेरे लेखों को अधिक से अधिक हिट्स मिले। ज्यादा से ज्यादा प्वाइंट्स मिलने का जुनून। शायद इस जुनून ने पीछा नहीं छोड़ना। तभी तो अध्यात्म की शिक्षा देने वाले बाबाओं में भी जुनून आम देखा जा सकता है। गली-गली आश्रम खुले, लाखों-करोड़ों भक्त बने, घर-घर में फोटो छपे। क्या इस पागलपन का कहीं अंत है? कहीं ऐसा तो नहीं भगवान ने इस मनुष्य की संरचना भी किसी जुनून के तहत ही की है?
 
लेखक परिचय (click here)
मनोज सिंह: २५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ़ | http://www.manojsingh.com







टिप्पणियाँ (2)add
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द्वारा प्रेषित sumit , जुलाई 09, 2007
manoj singh ji ko narad per dekh kar accha laga
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द्वारा प्रेषित श्रीश शर्मा , जुलाई 09, 2007
स्वागत है मनोज जी हिन्दी चिट्ठाकारों की इस जुनूनी दुनिया में। यहाँ तो सबको एक ही जुनून है - ब्लॉगियाने का। smilies/smiley.gif
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