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समीक्षा: "नकाब" की पीछे है कई चेहरे |
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समीक्षा
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मंगलवार , , 17 जुलाई |
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अगर आप अब्बास मस्तान मार्का सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों के शौकीन हैं तो यह फिल्म आपके लिए ही है. विदेशी लोकेशन, दो नायक, एक नायिका, शुरूआत से सस्पेंस, धोखा, गिला शिकवा, तेज संगीत और तैयार हो जाती है एक फिल्म जो कम से कम पैसा वसूल तो कही ही जा सकती है.
क्या है कहानी:
पहली नजर में तो घिसी पीटी सी बम्बइया कहानी है. एक अमीर लड़का करण (बॉबी देओल) और उसकी मंगेतर एक साधारण युवती सोफिआ (उर्वशी शर्मा) है. सोफिआ करण से प्यार करती है, लेकिन उसे अहसास होता है कि करण उसका ध्यान नही रखता. इस बीच वह विकी (अक्षय खन्ना) से मिलती है और उसे उससे प्यार हो जाता है. विकी और सोफिआ एक दूसरे के करीब आ जाते हैं. लेकिन विकी को अहसास होता है कि वह सोफिआ और करण की जिंदगी बर्बाद कर रहा है, तो वह सोफिआ से अलग हो जाता है, और सोफिआ करण से शादी करने को राजी हो जाती है.
यहाँ तक तो कहानी पुरी फिल्मी ही है. लेकिन हकीक़त यह है कि इनमें से कोई भी सच्चा नही है, और सबके चेहरे पर एक नकाब है. फिल्म के अंत से थोडा पहला जब सबके नकाब उतरते हैं तब दर्शक एक बार तो भौंचके रह जाते हैं.
देखने की वजह:
कई है. पहली बात, मुझे फिल्म का प्लाट काफी अच्छा लगा. विषय हिन्दी फ़िल्मो के लिए नया सा है. हाँ, यह हो सकता है कि किसी हॉलिवुड फिल्म सेउडाया गया हो, लेकिन क्या फर्क पड्ता है, आखिर प्रेरणा लेने का हक सबको है. फिल्म की पटकथा बहुत कसी हुई है, इसलिए फिल्म झोल खाती नही लगती. सस्पेंस भी अच्छा है. लोकेशन सुन्दर है. नई अभिनेत्री उर्वशी शर्मा जो की एक बेहद खूबसूरत मॉडल भी हैं, ने अच्छा अभिनय किया है. अक्षय खन्ना और बॉबी देओल भी निराश नही करते. अब्बास मस्तान का निर्देशन अपनी पुरानी फिल्मों की ही तरह अच्छा है. तेज संगीत पसंद करने वालों को फिल्म का संगीत भी अच्छा लगेगा. फिल्म के कॉस्ट्युम्स, खास कर उर्वशी शर्मा के, काफी अच्छे हैं.
ना देखने की वजह:
कुछ हो सकती है. फिल्म में प्लाट के सिवा कुछ नया नहीं है. फिल्म का क्लाईमेक्स आते आते फिल्म की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती है, तथा घटनाओं के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है. संपादन में कई जगह चुक हुई है, कभी कभी कोई दृश्य अचानक सा आ जाता है, और उसका ठीक से निर्वहन भी नहीं किया जाता. उर्वशी को काफी ग्लैमर दिखाया गया है, और वह किसी भी कोण से साधारण युवती नही दिखती, जबकि फिल्म मे वह वेट्रेस है. अक्षय के मित्र बने दो जूनियर कलाकारों का हास्य अभिनय फुहड है और बकवास लगता है.
तो क्या है आखिरी राय:
यही कि फिल्म एक बार तो ज़रूर देखनी चाहिए. इसमे सबके लिए कुछ ना कुछ तो है. बस इतना है कि फिल्म देखने के बाद राज ना खोले.
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| संवाद |
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