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क्लैपबॉर्ड नहीं तो फिल्म नहीं, कैसे?
बॉलिवुड की खबरी
सोमवार , , 30 जुलाई

pankajphoto

  पंकज बेंगाणी 


 

 

 

 

 

 

 

clapboardसोचिए कि किसी फिल्म की शूटिंग चल रही है तो आपको किसी सीन को शुट करने के पहले ये आवाज़े सुनाई देंगी. लाईट, कैमरा.. रोलिंग, एक्शन और पटाक. बाकी सब आवाजें तो समझ मे आती है लेकिन यह अंत में जो पटाक की आवाज़ आती है वह होती है क्लेपबॉर्ड की. एक स्पोटबॉय लकड़ी का तख्तीनुमा औजार पकड़कर कैमरे के आगे खड़ा रहता है और निर्देशक के एक्शन कहते ही तख्ती के उपर की पट्टी जोर से पछाड कर हट जाता है. इसे क्लेपिंग कहते हैं.

आइए समझते हैं कि क्लैपिंग की आवश्यकता क्या होती है. फिल्म निर्माण में क्लैपबॉर्ड बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

हम जो फिल्म देखते हैं, वह कई चरणों मे तैयार होती है. पहले फिल्म की कहानी लिखी जाती है, फिर स्क्रिप्ट तैयार होती है, फिर स्क्रीनप्ले तैयार होता है और अंत में कागज़ पर पूरा स्टोरीबॉर्ड तैयार हो जाता है, कि किस दृश्य के बाद कौन सा दृश्य आएगा और उसे किस एंगल से शुट किया जाएगा. उसके बाद फिल्म की शुटिंग तैयार होती है.

अब फिल्म की शूटिंग का कोई निश्चित क्रम नही होता है. कोई भी दृश्य चाहे वो फिल्म मे पहले आता हो या अंत में क्लाईमेक्स मे आता हो, उसकी शूटिंग कभी भी हो सकती है. यह सबकुछ अभिनेताओं के समय अनुकुलन और दृश्य को जहाँ फिल्माया जाना है उस लोकेशन की उपलब्धता पर निर्भर करता है.

ऐसी स्थिति में क्लैपबॉर्ड का उपयोग बहुत ही जरूरी बन जाता है.

जैसा कि मैने कहा, पुरी फिल्म की स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले कागज़ पर लिखते समय तय हो जाता है कि फिल्म में कुल कितने सीन होंगे और हर सीन का एक क्रम निश्चित हो जाता है. अब शूटिंग के दौरान जिस नम्बर के सीन की शूटिंग हो रही होती है, उसका क्रमांक क्लैपबॉर्ड पर लिख दिया जाता है. इसके अलावा दृश्य फिल्माने की तारीख, निर्देशक का नाम और टेक नम्बर भी होता है.

टेक नम्बर का भी अपना महत्व है. मान लीजिए किसी फिल्म के 103 नम्बर के सीन की शूटिंग हो रही है तो उस सीन को पहली बार फिल्माने के समय टेक का क्रमांक 1 होगा. अब यदि निर्देशक सीन से संतुष्ट ना हो तो वो रीटेक करना चाहेगा. इस स्थिति में पुरा दृश्य फिर से फिल्माया जाता है और इस बार सीन वही 103 नम्बर का रहता है लेकिन टेक 2 हो जाता है.

इस तरह से फिल्म पुरी तरह शुट हो जाने के बाद रील का भारी भरकम बंडल संपादक मंडल के पास पहुँच जाता है. जहाँ फिल्म सम्पादित होती है. अब फिल्म के संपादकों का काम थोडा आसान रहता है क्योंकि उन्हें फिल्म सम्पादित करते समय सीन 1 के अंतिम टेक से शुरूआत करनी रहती है. और वे एक एक करके फिल्म को जोडते रहते हैं.

यहाँ तक तो ठीक है पर फिर क्लैपबोर्ड की ऊपरी पट्टी को पछाड़ा क्यों जाता है?

फिल्म शुट करते समय मात्र दृश्य की शूटिंग होती है आवाज़ की नहीं (टीवी धारावाहिकों और सिंक साउंड फिल्मों को छोड़कर). फिल्म के गानों और सवांदो को फिर से रिकॉर्ड किया जाता है.

फिल्म के कलाकार अपने सामने लगी स्क्रीन पर फिल्म को देखते जाते हैं, और अपने सवांद फिर से बोलते हैं, जिन्हे साउंड रिकोर्डिस्ट रिकॉर्ड कर लेता है.

अब जब फिल्म संपादन का कार्य शुरू होता है तब संपादक, क्लैपबॉर्ड की पट्टी पर लगे सीन और टेक क्रमांक के हिसाब से फिल्म को जोड़ने के साथ साथ क्लैपबोर्ड की पट्टी के पटकने से उत्पन्न हुई आवाज़ "खटाक" के तुरंत बाद उस सीन से संबंधित संवादों की रिकोर्डिंग को जोड देता है. इससे आवाज़ और दृश्य का तालमेल एकदम सही बैठ जाता है.

आजकल कई आधुनिक तकनीकें विकसित हो गई है और क्लैपबॉर्ड का स्वरूप भी बदलने लगा है. अब क्लैपबॉर्ड डिजिटल भी होने लगे हैं. और डिजिटल साउंड रिकोर्डिंग की वजह से अब संपादकों को और भी सुविधा हो गई है.

 



टिप्पणियाँ (1)add
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द्वारा प्रेषित सागर नाहर , अगस्त 24, 2007
बहुत बढ़िया जानकारी
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