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सैंया भए मंत्री तब नियम काहे का? |
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मंगलवार , , 31 जुलाई |
रवि-वार्ता - रवि रतलामी द्वारा |
एक ‘पुरानी कहावत’ है – सैंया भए कोतवाल तब डर काहे का? पर अब आधुनिक जमाने में या तो कहावतों के माने बदल गये हैं या फिर उनमें अच्छे खासे सुधार की अच्छी खासी आवश्यकता है. डार्विन का विकासवाद कहावतों में भी बिलकुल फिट बैठता है.
पहले शहर का कोतवाल शहर का रक्षक होता था. प्रजा उससे डरती थी. कोई भी गलत काम करने से पहले प्रजा के मन में कड़क कोतवाल का फोटो छपता था. वैसे प्रजा कोतवालों से अब भी डरती है. परंतु अब वह दूसरे तरीके से डरती है. कोई अपराध हो जाने के बाद उसकी तहकीकात होगी या नहीं और एफआईआर दर्ज होगा या नहीं उसके लिए डरती है. प्रजा को मालूम है अब अधिकतर अपराध कोतवालों के संरक्षण में हो रहे हैं.
बदलाव तो कोतवालों ने भी देखा है. अब के जमाने में शहर का कोतवाल भी मंत्री से डरता है. कोतवाल और कलेक्टर मंत्री के आगे पीछे प्रोटोकॉल के नाते तो घूमते ही हैं, अपना तबादला मलाईदार क्षेत्र से किसी डेस्क जॉब पर न हो जाए इसलिए भी घूमते हैं. क्योंकि फिर वहाँ दफ़्तर भी अपने ही वाहन से जाना पड़ता है. वो इसलिए भी मंत्री से डरते हैं कि कहीं किसी जूनियर अफसर को, जो उन्हें सेल्यूट देता रहा था और उनके सामने अदब से सावधान खड़ा रहता था, नियम विरुद्ध प्रमोशन देकर उनके अंडर में काम करने को मजबूर न कर दें. आज के जमाने में मंत्री के सामने कोतवाल की क्या औकात?
किरण बेदी का किस्सा ही ले लें. एक जमाने में उन्होंने इंदिरा गांधी के वाहन को भी गलत पार्किंग के जुर्म में उठवा लिया था. तब कोतवाल से मंत्री और राजनेता भी सहमते थे. इस घटना को ज्यादा समय नहीं हुआ. किरण बेदी अभी रिटायर भी नहीं हुईं. और आज उन्हें मंत्रियों ने धता बताकर उनकी सीनियरिटी को नजर अंदाज कर उनसे जूनियर अफसर को दिल्ली का कोतवाल बना दिया. अब या तो किरण मंत्रियों से नहीं डरती होंगी या मंत्रीगण किरण से डरते होंगे इसीलिए मंत्रियों ने किरण को डराने का यह कार्य किया. अगर किरण मंत्रियों से डरती सहमती होतीं तो उन्हें शायद यह दिन देखना नहीं पड़ता. कितनी खराब बात है - अब उन्हें अपने से जूनियर अफसर को सलामी बजानी होगी.
कुछ समय पहले खबर आई थी कि केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री की हवाई यात्रा के दरमियान सुरक्षा कर्मियों ने नियमानुसार उनकी सामान्य सुरक्षा जांच करनी चाही क्योंकि राज्य मंत्रियों को सुरक्षा जांच में छूट नहीं मिली हुई थी. उन्होंने सुरक्षा कर्मियों को डराने की कोशिश की – डोंट यू नो हू एम आई? जाहिर है, जाहिल सुरक्षा कर्मियों को जानना चाहिए था और उन्हें मंत्रियों से डरना चाहिए था. मंत्रियों के लिए भी कोई नियम होता है भला? और वह भी भारतीय मंत्रियों के लिए? नियम कायदे कानून तो प्रजा के लिए होता है. जो सांसद-विधायक-मंत्री खुद कानून बनाते हैं खुद नियम बनाते हैं उन पर ये जाहिल सुरक्षा कर्मी नियम लगाने चले थे. उन मंत्री महोदय ने लौट कर पहला काम यह किया - राज्य मंत्रियों को सुरक्षा जांच में छूट मिलने का नियम बनवाया. जनता की स्वास्थ्य संबंधी समस्या से भी बड़ी समस्या स्वास्थ्य राज्य मंत्री के लिए हवाई यात्राओं में सुरक्षा जांच की समस्या थी.
सार यह कि भैये, मंत्री, जो खुद ही नियम-कानून बनाते हैं तो उन पर ये कानून ये नियम कैसे लागू होगा? मंत्रियों के लिए काहे के नियम?
व्यंज़ल
बतलाने के लिए नियम
उठा के रख दिए नियम
जी नहीं पाएगा यहाँ पर
जो खाए औ’ पिए नियम
कैसे बताएँ कि उन्होंने
काट काट के सिए नियम
लेखा जोखा उनका ये है
बैठे बताया किए नियम
ख़ैर, ये सुकून तो है रवि
हमने पूरे हैं जिए नियम
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