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पार्क में पार्किंग
शनिवार , , 11 अगस्त
manojkumar  मेरे विचार - मनोज सिंह द्वारा


भाषा के सौंदर्य की कोई सीमा नहीं। शब्दों के अर्थ, वाक्य और संदर्भ के साथ-साथ अपना स्वरूप व भावार्थ बदलकर पाठक को रोमांचित करते हैं। भाषा का आकर्षण इस तरह के प्रयोगों से और अधिक बढ़ जाता है। शब्द की उपयोगिता में लचीलापन जहां संबंधित भाषा के कलात्मक पक्ष को सुदृढ़ करता है वहीं कई बार दूसरी भाषा के लिए यह आलोचना एवं हंसी का पात्र भी बनता है। अंग्रेजी में इस तरह के प्रयोग व शब्द के अर्थों के साथ छेड़छाड़ के उदाहरण अधिक देखे जा सकते हैं। जिसकी कोई नियमावली नहीं, कोई सुनिश्चित प्रक्रिया नहीं। यह भाषा के जिंदा रहने का सबूत है। उसके विकासक्रम की कहानी है। उदाहरणार्थ देखें तो कई शब्द आपस में एक-दूसरे से जुड़े-जुड़े से महसूस होते हैं यहां तक कि कई बार एक की उत्पत्ति दूसरे से होती है परंतु ये शब्द अर्थों में बिल्कुल विपरीत या उपयोग में भिन्न होते हैं। कई बार एक ही शब्द कई तरह से प्रयोग में लाये जाते हैं जो भाषा में विविधता को दर्शाता है। पार्क एवं पार्किंग ये दो अंग्रेजी के शब्दों में दूसरा पहले से उत्पन्न हुआ साफ-साफ दिखाई देता है। मगर आम बोलचाल में देखें तो ये बिल्कुल भिन्न-भिन्न संदर्भ में उपयोग किए जाते हैं। वैसे तो यह दोनों शब्द आज इतने चलन में हैं कि इनके अर्थों को बताना आवश्यक नहीं। मगर फिर भी एक का संबंध जहां घास के मैदान, उद्यान से है तो दूसरे का गाड़ी खड़ी करने वाले स्थान से। पता नहीं पूर्व में अंगे्रजी भाषा के ज्ञानियों ने इसकी कल्पना की होगी या नहीं मगर आज यही दो शब्द एक-दूसरे से जाने-अनजाने एक नये संदर्भ में जुड़ते हुए दिखाई देते हैं। तभी तो अगर किसी पार्क में चारों ओर बाउंडरी न हो या गेट खुला हो तो वहां दसियों गाड़ियां पार्क की हुई मिलेगी।

विगत दिवस सुबह-सुबह चंडीगढ़ के सड़कों पर सैर करने के दौरान इसी 'पार्क में पार्किंग` ने ध्यान आकर्षित किया था। कालोनी के बाहर फैले सुंदर, हरे-भरे पार्कों में अनगिनत कारें खड़ी हुई थीं। दिमाग पर जोर डालने पर याद आया कि मात्र कुछ महीनों में ही इनकी संख्या अचानक बढ़ गयी थीं। पहले पहल एक-दो गाड़ियां किसी-किसी पार्क में खड़ी दिख जाया करती थीं जो अब कई जगह पर पार्क का आधा हिस्सा कब्जा कर चुकी थीं। चंडीगढ़ शहर अपने हर सेक्टर में उपस्थित, विशाल, व्यवस्थित, हरे-भरे पार्कों की वजह से जाना जाता है। मगर अब इन पार्कों का अस्तित्व खतरे में दिखाई पड़ता है और शहर अपनी मूल पहचान खो रहा है। जगह-जगह बिखरे खूबसूरत पार्कों में कारों की घुसपैठ इतनी हो चुकी है कि इनका प्रमुख उद्देश्य व प्रयोजन खत्म होने लगा है। हरे-भरे छोटे पौधों को गाड़ियों के टायरों ने बेरहमी से कुचल दिया है और कई जगह उनका नामोनिशान खत्म हो चुका है। घासों के ऊपर गाड़ी के भारी चक्कों के निशान देखकर लगता है कि मानो उन्हें मसल दिया गया है। इन टायरों के बोझ से घास ने दम क्या तोड़ा अधिकांश जगह पार्क में गड्ढे बन चुके हैं। जहां पानी भरने से कीचड़ व गंदगी फैल रही है। पार्क मंे चलने की जगह नहीं बची और ये सैर करने लायक नहीं रह गये। परिणामस्वरूप अब पार्क, कार पार्किंग दिखाई देने लगे हैं। इतना ही नहीं अधिकांश रोड के बगल में बनाए गए हरे बेल्ट को या तो सड़क चौड़ी करने में खत्म कर दिया गया या फिर उन पर गाड़ियां खड़ी होने लगी हैं।

तकरीबन दो वर्ष पूर्व मैंने एक लेख लिखा था '...मोटरकार वाले की बाजार में दुर्दशा`। जिसमें बढ़ती हुई कार की संख्या के कारण कार चालक व उनके मालिकों को होने वाली मुसीबत से रू-बरू कराया गया था। विगत कुछ वर्षों से बड़े-बड़े प्लाजा और मॉल के बाहर सीमित आकार के पार्किंग में गाड़ियां खड़ी करना मुश्किल होता जा रहा है। पहले तो गाड़ी खड़ी करना ही आसान नहीं फिर गाड़ी खड़ी कर दी तो निकालना टेढ़ी खीर साबित होता है और कई बार बाहर निकलने में घंटों लग जाते हैं। इन सारे प्रयास में गाड़ियां आपस में टकराती हैं, भिड़ती हैंैं। और अंत में गाड़ी एक सुविधा के स्थान पर मुसीबत लगने लगती है। इस लेख पर बहुत अधिक प्रतिक्रिया नहीं मिली थी अर्थात लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था। मगर अचानक पिछले दो वर्षों में यह समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है और दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। समाचारपत्र इस तरह के लेखों से भरे हुए हैं। लोग घंटों पार्किंग के लिए भटकते देखे जा सकते हैं या सैकड़ों मीटर दूर पार्किंग कर पाते हैं। सड़कों व चौराहे पर दुर्घटना आम हो चुकी है। अधिकांश शहरों में पार्किंग व ट्रैफिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। कार खरीदने वाले का जोश कुछ घंटों में ही हवा हो जाता है जब पहले दिन घूमने जाने पर घंटों सड़क के जाम में खड़ा रहना पड़ता है या फिर पार्किंग न मिलने पर भटकना पड़ता है। ऊपर से किसी के जरा-सी टक्कर मार देने से गाड़ी पर आने वाली खरोंच दिल पर लगती है। घर के साथ गैराज न होने पर रात में रास्ते पर गाड़ी खड़ी करने पर कई बार नींद नहीं आती। रात में चोरी और दिन में पड़ोसी के बच्चों द्वारा खेल में गाड़ी पर स्क्रैच लगने का भय बना रहता है और कुछ दिन में ही वो पछताने लगता है। कर्ज लेकर किस्त पर खड़ी गाड़ी खाना-पीना बंद करा देती है। मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती बच्चों को स्कूल व कालेजों में छोड़ने जाने पर वहां भी अब जगह नहीं मिलती और ऑफिस में पार्किंग की परेशानी के चलते बस या ट्रेन से लटककर जाना पड़ता है। अंत में लोग कई बार आपस में साझेदारी से ऑफिस जाते हैं। कई कार्यालयों में पार्किंग में विशेष पास की व्यवस्था प्रारंभ हो चुकी है। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड व मार्केट का बुरा हाल है। अधिकांश स्थानीय शासन आंखें मूंदे मगर परेशान है। उपभोक्ताओं को बाजार की अपेक्षा आने जाने में ज्यादा समय लग रहा है। त्योहार के समय घंटों जाम लग जाता है। सड़कों पर रात को सैकड़ों गाड़ियां खड़ी होती है। अगर यही हालत रही तो कुछ दिनों बाद पैदल चलना अधिक आसान होगा।

उपरोक्त समस्या के लिए बहस शुरू हो चुकी है। कई स्थानों पर सरकारें बहुमंजिला पार्किंग की व्यवस्था की सोच रही है और भी कई व्यवस्थाएं साथ-साथ आ रही हैं। परंतु इस समस्या के जड़ में कोई नहीं जा रहा। विशेषणात्मक अध्ययन नहीं किया जा रहा। व्यावसायिक युग है, प्रत्येक कंपनियां नयी-नयी मॉडलों में गाड़ियां बना रही हैं। बाजार पर अधिक से अधिक कब्जा करने की होड़ लगी हुई है। ज्यादा से ज्यादा संख्या में बिक्री करने के लिए, ग्राहकों को लुभावने नारे, स्लोगन, ब्याज रहित किस्तें और मार्केटिक एवं एडवरटाइजिंग से उकसाया जा रहा है। कंपनियां अपना सामान किसी भी तरह से बेचने में लगी हुई हैं। नये-नये आकर्षक ईनाम, उपहार दिए जा रहे हैं। हरेक की जेब के अनुसार गाड़ियां बनाई जा रही हैं। सस्ती से सस्ती कार पैदा करने के लिए फैक्टरियों के निर्माण हो रहे हैं। फिर जिसके लिए कृषि भूमि खरीदी जा रही हैं। स्कूटर वालों को कार खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इन सारी प्रक्रिया को विकास से जोड़ा जा रहा है। सरकार, व्यवसायी, नागरिक सभी मदमस्त हैं। कोई भी इससे उत्पन्न होने वाली भयानकता का अंदाज नहीं लगा रहा। जरा सोचें, सभी स्कूटर अगर कार में बदल दिए जाएं तो किसी भी शहर का क्या हुलिया होगा। प्रत्येक कंपनी अपने माल को बेचने की दर में वृद्धि से ही अपने विकास को देखती है। लेकिन अगर ऐसा ही रहा और अगर पचास प्रतिशत स्कूटर भी एक-दो साल में कार में बदल दिये गये तो ट्रैफिक व पार्किंग का क्या स्वरूप होगा। मगर सब आंखंे मूंद बैठे हैं। सरकार मौन है और नागरिक सचेत नहीं। दूसरी ओर कोई भी व्यवसायी समाज सुधारक तो होता नहीं और न ही उससे समाज के बारे में अपेक्षा की जा सकती है। वो तो सिर्फ मुनाफे के लिए कार्य करता है। परंतु सोचने वाली बात है कि क्या उनका समाज के प्रति कोई दायित्व नहीं? अगर इतनी ही रफ्तार से अगले दो-चार वर्षों में गाड़ियां शहरों में बेच दी गयी तो क्या पैदल चलना-फिरना भी संभव होगा? क्या इतनी ही तीव्र गति से पार्किंग व सड़कों के लिए भी विशेष कार्य योजना बनाई जा सकती है? नहीं। हम सब वर्तमान की सोच रहे हैं तो क्या तथाकथित बुद्धिमान कहलाने वाले मनुष्य को भविष्य की ओर देखने व सोचने की कोई आवश्यकता नहीं?

वर्तमान हालत को देखकर लगता नहीं कि हम इन सब बातों के प्रति सचेत व जागरूक हैं। हम सिर्फ अधिक कार, फिर रोड, और फिर पार्किंग बनाते हुए, विकास के नाम पर शहर का प्राकृतिक सौंदर्य और कृषि भूमि नष्ट कर रहे हैं। इस विकास की झूठी शान को हमें रोकना होेेगा। जिसके लिए और कुछ नहीं तो सरकार कम से कम पार्किंग टैक्स के नाम पर मोटी रकम शहर के आकार व जनसंख्या के हिसाब से लगा सकती है। कार बनाने वाली कंपनियों को कार पार्किंग के लिए अपने मुनाफे में से अलग से टैक्स देने के बारे में सोचा जा सकता है। उपभोक्ता को नागरिक होने का दायित्व भी निभाना होगा। व्यवसायी को अपने व व्यवसाय के हित के साथ-साथ समाज के हित को भी देखना होगा। अन्यथा अगर सड़क पर जगह ही नहीं होगी तो कार बेचने वाले और खरीदने वाले कार लेकर क्या करेंगे?


मनोज सिंह
४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ










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