newsite.jpg
कूपर कैंप
कथा सागर
गुरुवार , , 16 अगस्त

 

अर्बुदा पॉल


 

 

 

 

 

 

 

 

 


 

story1बिमला घोष जब 18 साल की थी तब उसकी शादी हुई थी। तब वो बांग्लादेश में रहा करते थे। बांग्लादेश तो आज का बना है तब वो बांग्लादेश नहीं था, पर बहुत ही खुशहाल। खुशहाल तो शायद आज भी होगा। नई नई शादी की खुमारी को बिमला अपनी गठरी खोल कर आज भी महसूस कर लेती है। शादी का लाल जोड़ा, पंडित के मंत्र‌, बगल में सुजीत का बैठना आज भी भीतर एक रोमांच पैदा कर देता है। 78 साल की उम्र की बूढ़ी आंखों में चमक सी आ जाती है। जिंदगी ने उसके बाद बहुत रंग दिखा दिये, कभी बीती हुई कहानी याद आती है तो वो चमक खो जाती है, अतीत बहुत ही दर्द दे गया है उसका तो अहसास आज भी महसूस होता है।


60 साल पहले 1947 की जून में उसकी शादी हुई थी तब भारत में बहुत हलचल सी थी। जून में बंटवारे की बात बड़ी ही गरमी लिये हुए थी। बिमला और सुजीत इन सभी बातों से बेखबर होकर अपनी नई जिंदगी शुरु करने के जोश में थे। सुजीत के पिता की बड़ी खेतीबाड़ी थी, एक सम्पन्न परिवार में बिमला अपने आप को महसूस करके बहुत खुश थी। परंतु काल का ऐसा चक्र चला कि बंटवारे की गरमी में सब कुछ झुलस गया। भारत के तीन टुकड़े हो गये थे। भारत हिंदुओं का हो गया। एक टुकड़ा पाकिस्तान बन गया और पूर्व में आज का बांगलादेश पूर्वी पाकिस्तान बन गया, भारत के दोनों हाथ मुस्लिम जनता के लिये कट गये। सभी हिंदुओं को भारत में रहना था जो पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान के थे उन्हें जल्द से जल्द भारत आना था। काफिले के काफिले पाकिस्तान से भारत आने लगे। और यहां से मुस्लिमों ने पाकिस्तान की ओर रुख किया, यह सब कुछ आसानी से नहीं हुआ। बहुत दंगे हुए, हिंदु मुस्लिम के बीच खूनखराबा हुआ। 14 अगस्त को मुस्लिमों से अपने आप को बचते बचाते सुजीत और बिमला भी भारत आने वाली कश्ती पर सवार हो गये। वह मंज़र दिल दहला देने वाला था। जलते हुए घर, जगह जगह लाशें, इधर उधर भागते लोग अपनी अपनी जान को सँभालना की कोशिश में थे। 14 अगस्त की रात को जहाज को हिंदुस्तान आना था। जहाज पर लदे हुए लोग, कई तो वहीं समुद में डूब गए, जो बच गये वो हिंदुस्तान की पावस धरती पर पहुंच गये। 15 अगस्त को आज़ाद भारत में बिमला और सुजीत ने कदम रखा।


यहां पहुच कर उन्हें रिफ्यूजी के नाम से पुकारा जाने लगा। सरकार के नियमों के तहत उनको भारत में भूमि आवंटन की घोषणा हुई थी, सभी को थोड़ी जमीन मिलेगी अपने रहगुजर के लिये सरकार उनकी मदद करेगी। बिमला और सुजीत यहां आकर थोड़े निश्चिंत थे। अब थोड़े दिनों का कष्ट है, समय एक सा नहीं रहता, ये कष्ट भी दूर होगा। पाकिस्तान से आने वाले लोगों ने दिल्ली तथा उत्तरी भारत में बने रिफ्यूजी कैंप में अपना डेरा बनाया तथा पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं ने पूर्वी भारत में। बिमला और सुजीत को अपने पहचान वाले कुछ साथियों के साथ कलकत्ता से कुछ किमी0 दूर बने कूपर कैंप में जगह मिल गई। 15 अगस्त को देश आजाद हो गया, पूरी तरह से आजाद। दिल्ली में सरकार बनी। रिफ्यूजी हिदुओं को कुछ कानूनी कागजों के अनुसार जगह मिलने लगी। रोज़गार भी मिलने लगा। कहते हैं जो लोग पाकिस्तान से हिंदुस्तान लौटे उन्होने बहुत मुश्किल समय देखा, अपने बच्चों का पेट भरने, पढ़ाई तथा घर को चलाने के लिये छोटे से छोटा काम भी किया। जो पाकिस्तान में अमीर थे, जो अपनी जमीन और खेती सभी छोड़ कर आये थे उन्होने भारत में मिली छोटी सी जगह पर गुजर बसर के लिये बहुत मेहनत की।

उसी तरह जो मुस्लिम यहां से पाकिस्तान गये उन्होने भी बहुत कष्ट के दिन देखे। पर हिंदुस्तान में हिंदु सुरक्षित थे और पाकिस्तान में मुस्लिम सुरक्षित हैं बस यही सुरक्षा के लिये वे लोग सभी दर्द सहने को तैयार थे और दर्द तो उन्होने सहा भी। बिमला और सुजीत खुशकिस्मत थे जो भारत की ज़मीन पर थे उनके रिश्तेदार कहां रहे यह सुध लेने का समय मिल ही नहीं पाया था। जो जिंदा रहे वो भारत पहुँच गये। कूपर कैंप में दिन बीतने लगे इसी आशा में कि थोड़े समय में अपनी जमीन मिल जायेगी आखिर पूर्वी पाकिस्तान में वे लोग अपना बहुत कुछ छोड़ आये थे, कायदे से तो अचछी ज़मीन मिलनी ही चाहिये। सुजीत और बिमला एकदूसरे को तसल्ली देते और रोटी पानी के जुगाड़ में दिन बिताते। समय कहां रुकता है, हाथ से रेत की तरह फिसलता है और कुछ निशानियाँ छोड़ जाता है, जिसमें कुछ जीती हैं और कुछ दर्द दे जाती हैं। कूपर कैंप में रहते रहते उन्हें साल दर साल बीतने लगे। कैंप ने छप्पर के झोपड़ों की जगह ले ली। छप्पर के बने एक झोंपड़े में बिमला और सुजीत के नन्हें बच्चे उछलकूद करने लगे। बिमला और सुजीत मेहनत मज़दूरी करके अपना पेट भरते थे।

समय बीतता गया, भारत में सरकार द्वारा मिलने वाली जगह की उम्मीद भी जाती रही। हर साल आजादी का जश्न मनाते भारतवासी, ढेरों तैयारियां होतीं, बिमला और सुजीत भी आजादी के जश्न की तैयारी में लग जाते आखिर पेट भरने के लिये कुछ पैसों का इंतजाम तो करना ही होता है। दिल में अजीब सा तूफान उठता था जब आजादी का जश्न मनाया जाता था। कई बरसों तक 14 अगस्त की शाम आती रही। बच्चे भी बड़े होने लगे, वो भी मजदूरी करते और जिंदगी जीने की जद्दोजहद में लगे रहते। बिमला और सुजीत अपने ही देश में रिफ्यूजी होने की प्रताड़ना सह रहे थे। विरासत में बच्चों को भी रिफ्यूजी होने का दर्द उन्होने दे दिया। अपने ही देश पाकिस्तान में मुहाजिर होने का कलंक तो वो मुस्लिम आज तक अपने सिर लिये हुए हैं जो यहां से पाकिस्तान गये थे। सियासी नेताओं ने आज़ाद भारत में मुसलमानों के अल्पसंख्यक होने की आशंका को बहुत ही गंभीरता से लिया और भारत के टुकड़े कर दिये, भारत को आजाद कर दिया। पर साथ ही कुछ हिंदुओं को रिफ्यूजी और कुछ मुस्लिमों को मुहाजिर होने का एक घाव भी दे दिया जो आज तक हरा ही है। वो कभी भर भी पायेगा? कलकता से 200 किमी0 दूर स्थित कूपर कैंप आज़ादी के 60 सालों बाद भी बिल्कुल वैसा ही है जैसा पहले था। कूपर कैंप में रहने वाले रिफ्यूजी किस आज़ादी के बोझ को आज तक कांधे पर ढो रहे हैं।


बिमला अपनी गठरी जब भी खोलती है यादों की गठरी भी खुद ब खुद खुल जाती है। सुजीत बिमला आज भी रिफ्यूजी कूपर कैंप में रहते हैं बच्चे बड़े हो गये हैं और अब उस झप्पर के झोंपड़े में नाती पोते खेलते हैं। बिमला सुजीत अपने नाती पोतों को भी वही घाव विरासत में दे चुके हैं। उनके बच्चों ने तो उसी तरह मेहनत मज़दूरी करके अपना रोज़गार बनाया है पर नाती पोतों को देख कर बिमला सुजीत कभी ख्वाबों में ही पूर्वी पाकिस्तान में पहुँच जाते हैं तो कभी अपनी पथराई आंखों से उनका भविष्य कूपर कैंप में देखते हैं।






 


टिप्पणियाँ (7)add
बहुत मार्मिक
द्वारा प्रेषित समीर लाल , अगस्त 17, 2007
अति मार्मिक और संपूर्ण प्रवाहपूर्ण कहानी. पूरे समय बाँधे रखा. बधाई. आशा है आपकी अन्य रचनायें भी यहाँ निरन्तर पढ़ने मिलती रहेंगी. शुभकामनायें.
report abuse
vote down
vote up
Votes: +0
मार्मिक
द्वारा प्रेषित Shastri Philip , अगस्त 20, 2007
बहुत ही मार्मिक वर्णन. इस प्रविष्टि के लिये आभार -- शास्त्री जे सी फिलिप

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
report abuse
vote down
vote up
Votes: +0
...
द्वारा प्रेषित अर्बुदा , अगस्त 30, 2007
बहुत बहुत शुक्रिया समीर जी एवं शास्त्री जी. आपने मेरे लेखन को सराहा तथा मुझे प्रोत्साहित किया. आप लोगों का बहुत बहुत धन्यवाद.
report abuse
vote down
vote up
Votes: +0
...
द्वारा प्रेषित मीनाक्षी , सितम्बर 19, 2007
मन को गहरे तक छू गई । कभी अपराध बोध होता है, कुछ कर न पाने की छटपटाहट भी होती है। शायद किसी में चेतना जागे और कुछ कर जाए, यही कामना है।
report abuse
vote down
vote up
Votes: +0
...
द्वारा प्रेषित हरिमोहन , अक्टूबर 09, 2007
मार्मिक - जिन्‍दगी का ये ऐसा अनुभव है जिसे हम महसूस कर के भी सिहर उठते है और जिन्‍होने इसे जिया है उनके लिये बस आखें नम ही कर सकते है हम
report abuse
vote down
vote up
Votes: +0
...
द्वारा प्रेषित Ashok Parashar , फ़रवरी 17, 2008
Unfortunately, I am at present unable to comment in Hindi. It is due to contraints of my knowledge of Hindi writing on computer. Kindly bear me. We "Indians", I mean inhabitents of Indian sub continent read, write & remember the unfortunate artificial division of the motherland which is still causing all sort of hardships to us. The story written by Mr. Arbuda Paul is an extension of Manto's writings. It is excenent and heart tuoching. I am of strong openion to avert the division. For this we must creat necessary environment in comman men by our writings.
report abuse
vote down
vote up
Votes: +0
achha lekh tha....
द्वारा प्रेषित helish , सितम्बर 03, 2008
bahut hi achha lekh tha....


is ko padh ke hame thoda mahesus hua ki batvare ke bakhat hindu or muslaman bhaio pe kya biti hogi
wo taklif is lekh ke ek ek sabdo se pata chalti
jisne ye kahani dhundhi hai jisne ispe reserch kiya hai uska me dhanyavad karna chahta hu

thankx for this topic

helish...!
report abuse
vote down
vote up
Votes: +0
टिप्पणी लिखें
quote
bold
italicize
underline
strike
url
image
quote
quote
smile
wink
laugh
grin
angry
sad
shocked
cool
tongue
kiss
cry
smaller | bigger

security image
दिखाये गये अक्षर लिखें


busy
 

सबस्क्राइब करें

ईमेल में:


ईमेल में प्राप्त करें

ईमेल आईडी लिखें