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मंतव्य
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शुक्रवार , , 17 अगस्त |
मंतव्य - पंकज बेंगाणी द्वारा |
यदि आप भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में नही रह रहे हैं तो इस स्थिति के बारे में कल्पना भी नही कर पाएंगे. क्योंकि पूर्वोत्तर को हम उतना ही जानते हैं जितना हमें दिखाया जाता है, और अफसोस की बात है कि बहुत कम ही दिखाया जाता है.
आप खुद सोचिए, दिन रात सनसनी फैला रहे हमारे खबरी चैनल पूर्वोत्तर को कितना कवर करते हैं? ना के बराबर. क्या वहाँ की कोई खबर नही होती? होती है, और बहुत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन ये राज्य हमेशा सेउपेक्षित रहे हैं. इसके पीछे बहुत हद तक हमारी सरकारें और मीडिया और बहुत हद तक वहाँ के मूल निवासी भी जिम्मेदार रहे हैं.
मैं असम के कछार जिले में - जो कि त्रिपुरा, मेघालय और मिज़ोरम से सटा हुआ है - तीन साल तक रहा हुँ. इसलिए वहाँ की स्थिति को काफी अच्छी तरह से समझता हुं. असम और दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों में भ्रष्टाचार सारी हदे पार कर चुका है. विकास कार्य होते ही नही है, परंतु सब्जबाग हर तरह दिखते हैं. और अब दूसरे राज्यों से आए लोगों के लिए जान का खतरा फिर से मंडराने लगा है.
असम के उल्फा चरमपंथी किसी जमाने में मारवाड़ी व्यापारियों की पीछे हाथ धोकर पडे थे. इन लोगों को ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरह पेश किया जाता था, जो स्थानीय लोगों का शोषण करने आए हुए थे. उस दौर में कई मारवाड़ी राज्य छोड़कर चले गए थे.
इसके बाद सेना सक्रीय हुई और उल्फा के कई ठिकाने उडा दिए गए और उनके गुर्गे बिखर गए. लेकिन फिर एक के बाद एक शांति समझौते होते गए और इन समझोतों की आड मे उल्फा अपनी ज़मीन फिर से हासिल करती गई. यह एक सोची समझी रणनीति होती है. श्रीलंका में एल.टी.टी.ई. हो या उल्फा, ये चरमपंथी दल हारते समय शांति समझौते कर लेते हैं और फिर अपनी ताकत जुटा कर फिर से सक्रिय हो जाते हैं.
आज ये आतंकवादी बिहारी मज़दूरों के पीछे पडे हैं, क्योंकि मारवाड़ी व्यापारियों से उन्हे अब चंदा भी मिलता है. लेकिन बिहारी मज़दूरों से उन्हे कुछ मिलने वाला नही है और वे आसान शिकार हैं. हास्यास्पद स्थिति तो तब होती है जब प्रधानमंत्री इन मज़दूरों से कहते हैं कि आप कहीं ना जाएँ, यही रहें. लेकिन उन्हे सुरक्षा कौन देगा? इस सवाल का जवाब उनके पास नही होता. और ना ही राज्य के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई के पास होता है.
आज राज्य का अमूमन हर व्यक्ति जानता है कि उल्फा का सेक्रेटरी परेश बरूआ कहाँ है? लेकिन ना तो हमारे सुरक्षा अधिकारियों ना ही मुख्यमंत्री को पता है कि वो कहाँ है. यह तो अप्रत्यक्ष सवाल है. हमारे सुरक्षा अधिकारी तो प्रत्यक्ष चीजों की भी अनदेखी करते हैं. बांग्लादेश से सटा एक छोटा सा कस्बा है "करीमगंज", वहाँ एक नदी है जो भारत को बांग्लादेश से अलग करती है. उस नदी के किनारे बैठ कर मैने स्वयं बांग्लादेशीयों को नदी पार कर भारत आते देखा है. कोई वीज़ा नही कोई पासपोर्ट नहीं. वहाँ पर ही बी.एस.एफ. की चौकी भी है.
यह सिलसिला जारी है. बांग्लादेश से मुसलमानों का आवागमन जारी है. कछार जिले में मुसलमानों की जनसंख्या (ज्यादातर बांग्लादेशी) 50% तक तो हो चुकी है. मै इंतजार कर रहा हुं कब यह 75% तक पहुँचती है, क्योंकि तब हमें एक कश्मीर पूर्व में भी दिखाई देगा.
मेरे एक मित्र ने एक बार कहा था, हमारा देश राम भरोसे चलता है. वो सही कह रहा था. इस देश को शायद ही कोई चला रहा है. सब भगवान भरोसे है. जीते रहो!
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किंतु मुझे विस्तार से समझाएं कि कछार ज़िले में कश्मीर क्यों बनेगा। इसे ज़रा विस्तार से समझाने का कष्ट उठाएँ.