| कशमकश पर डॉ. नामवर की मुहर |
| मेरे विचार | ||
| रविवार , , 19 अगस्त | ||
भविष्य में हिन्दी साहित्य का इतिहास जब भी लिखा जाएगा तो आज के युग को नामवर युग के नाम से जाना जाएगा। ऐसा कम ही होता है कि व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही युगपुरुष बन जाए। खासकर लेखन व कला के क्षेत्र में तो यह थोड़ा अधिक मुश्किल होता है। वैसे तो संचार क्रांति के इस युग में सब कुछ तीव्रता से घटित हो रहा है। तभी तो कुछ समय में ही आदमी चर्चा में आकर आकर्षण का केंद्र बन सकता है, और चर्चित कहला सकता है लेकिन समय के साथ जल्द भुला भी दिया जाता है। और जो कई वर्षों तक निरंतर याद किए जाते हैं, समय की राहों पर पक्के निशान लगाते चलते हैं वे कालपुरुष बन जाते हैं। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में डॉ. नामवर एक बड़ा और भारी नाम कहलाता है। उनका विशिष्ट व्यक्तित्व है। उनकी अपनी एक विचारधारा है, अपनी सोच है, तभी तो उनका कद ऊंचा है। वे आलोचना, ज्ञान व चिंतन के क्षेत्र में शिखर पर हैं।
वह एक अच्छे वक्ता हैंं। मार्क्सवादी विचारधारा के होते हुए भी अन्य के मतों व दृष्टिकोणों को सुनने, समझने और विश्लेषित करने और फिर ग्रहण करने से नहीं चूकते। देश की सीमाओं के पार भी उनके शब्द प्रवाहित होते हैं। उनके एक कथन से पुस्तक का भविष्य सुनिश्चित होता है। उनके साथ खड़े हो जाने से लेखक स्थापित हो जाता है। उनकी आलोचनात्मक समीक्षा सुनने के लिए लोग बेताब रहते हैं। उम्र के आठवें दशक के होते हुए भी शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं और अति व्यस्त रहते हैं। सदैव प्रसन्न व सरल सहज मगर समय की कमी के कारण अब दिल्ली के बाहर कम ही जाते हैं। विशेषकर संस्थाओं के कार्यक्रम को छोड़ दें तो व्यक्तिगत कार्यक्रम में शहर के बाहर जाने की संभावना तो न के बराबर होती है। ऐसा कम ही होता है कि किसी पुस्तक को लोकार्पित करने के लिए विशेष रूप से दिल्ली से बाहर जायें। मुख्य कारण व्यस्तता के अतिरिक्त एक और है कि पहले उन्हें पुस्तक पसंद आनी चाहिए। यह तो मेरा और मेरी रचना का सौभाग्य था कि 'कशमकश` उपन्यास को विगत सप्ताह उन्होंने लोकार्पित कर उसके उज्ज्वल भविष्य पर मुहर लगा दी।
आमतौर पर समीक्षकों के लिए कहा जाता है कि वे किसी भी रचना को ढंग से नहीं पढ़ते। उसे सरसरी निगाह से देख लेते हैं। प्राक्कथन पढ़कर उसकी समीक्षा लिख देते हैं। अक्सर वक्त की कमी का बहाना बनाया जाता है। लंबे-लबे उपन्यास पढ़ने में तो ऊब दिखाई जाती है। मगर मुझे इस बात को देखकर हैरानी हुई कि ३४३ पेज के मेरे लंबे उपन्यास को न केवल डॉ. नामवर जी ने पढ़ा बल्कि उनके सारगर्भित भाषण को सुनकर साफ लग रहा था कि मानो उपन्यास के हर शब्द को वे तौल रहे हों, प्रत्येक कथन में छुपी भावनाओं को निचोड़कर निकाल रहे हों, प्रत्येक घटनाक्रम और नये अध्याय में छुपे ध्येय को ढूंढ़कर बतला रहे हों, एक-एक दृश्य को स्वयं अपने आंखों से देख रहे हों। तीन दर्जन से अधिक पात्रों को पढ़ने पर भी वे मुख्य नायक व नायिका पर ही नजर गढ़ाए रहे और उपन्यास के सारांश को बतला पाए।
इतने व्यस्त युगपुरुष के पास इतना वक्त! यकीन नहीं होता। परंतु यह सत्य है जो उनके व्यक्तित्व के विशेष पहलू व विशेष गुणों को प्रदर्शित करता है। ऊर्जा को केंद्रित करना, एकाग्र पठन, आत्मचिंतन व समय को व्यवस्थित रूप में प्रबंध करना, ये हैं उनके महान बनने के कुछ प्रमुख कारण, मेरी निगाह में। बेबाक टिप्पणी के लिए मशहूर डा. नामवर ने अपने कथन में साफ-साफ कहा कि प्रारंभ में उन्हें लगा कि शायद उन्होंने इस पुस्तक का चुनाव गलत किया है। मगर फिर धीरे-धीरे उपन्यास के साथ जुड़ते चले गये और फिर लोकार्पण समारोह में जो कुछ कहा वे कशमकश के भविष्य को सुनिश्चित करता हुआ इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों से दर्ज हो गया। मेरी मेहनत सफल हुई व सपने साकार हुए। उनका यह कथन कि नारी को नारी दृष्टिकोण से देखकर एक पुरुष के द्वारा लिखना अन्य नारी के लिए चुनौती है।
इस बात पर उन्होंने शंका तो प्रकट की कि पुरुष द्वारा नारी को समझ पाना कितना संभव है, कहना मुश्किल है। लेकिन फिर इसका जवाब भी खुद ही दिया। इसी संदर्भ में उपन्यास के कुछ एक नायिका प्रधान भावुक दृश्य पर उन्होंने दिल खोलकर कहा कि यह अद्भुत लेखन है जो उन्होंने अब तक किसी और उपन्यास में नहीं पढ़ा। विशेषकर अंतिम अध्याय। उनके इन शब्दों ने मुझे एक पल के लिए अचंभित कर मस्तिष्क को करंट दिया, नसों में मस्ती प्रवाहित कर सातवें आसमान पर विचरित करने के लिए प्रेरित किया और फिर खुशियों के रस में डुबो दिया था। मुख्य अतिथि के मुख से प्रशंसा के शब्द सुनकर मैं बहुत देर तक फूलकर मोटा हो रहा था और अहम् हवा बनकर सिर में भर रही थी। जिसे निकालने में मुझे फिर काफी मेहनत करनी पड़ी थी।
चंडीगढ़ शहर के सैकड़ों गणमान्य नागरिक और दसियो प्रेस प्रिंट मीडिया की उपस्थिति में उनके एक-एक शब्द चारों ओर बिखरी शांति को बार-बार अकेले हिला रहे थे। और वे तकरीबन आधे घंटे से अधिक देर तक प्रवाह में बोलते चले गये। और फिर, क्या ग्रीक, क्या सिंधु घाटी और क्या अमेरिका का आधुनिक जीवन, सब एकाएक कशमकश उपन्यास के साथ जुड़ते चले गये। महान व्यक्ति दूर से तो विशिष्ट दिखाई देते हैं परंतु नजदीक जाने पर अत्यंत सरल व सहज होते हैं। उनकी ऊंचाइयों के कारण जनता उनसे दूर तो होती है परंतु नजदीक जाने पर वह एक बच्चे से अधिक नहीं दिखाई देते। नामवर के अंदर छुपी बाल्यसुलभ हंसी-ठिठोले शाम उस वक्त उभरकर आई जब वे मेरे चंद पारिवारिक सदस्यों व दोस्तों के साथ भोजन कर रहे थे।
उन्हें देखकर यह यकीन से कहा जा सकता है कि जितना अधिक महान बनना हो उतनी अधिक सरलता और सहजता अपने व्यक्तित्व में लानी चाहिए। छिछले, कमजोर, चिढ़चिढे,़ गुस्सैल, असामान्य, गूढ़ और क्लिष्ट व्यक्ति शीर्ष पुरुष नहीं बन सकते। वैसे तो इन शीर्ष पुरुषों के साथ कई किस्से व कहानियां जुड़ी होती हैं, चर्चाएं होती रहती हैं, लेकिन वास्तव में देखें तो वे आम जन से अधिक सामान्य होते हैं।
यह सत्य है कि हिंदी साहित्य में वास्तविक चरित्रों के नजदीक जाकर उन्हें पहचानते हुए, उनको समझते हुए, उनके साथ घुल-मिलकर उनके दृष्टिकोण से कृति को परिपक्व बनाने के प्रयोग कम होते हंै। ऐसे में मेरा मुम्बई की रेड लाइट एरिया में धक्के खाना, सर्वेक्षण करना, पूना का पारंपरिक परिवार से लेकर अल्ट्रा आधुनिक परिवार के बिगड़े बच्चों को देखना, समझना, नागपुर के हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं को परखना, बस्तर की आदिवासी महिलाओं की मजबूरी को जानना, अपने आप में मुश्किल कार्य था। परंतु साथियों व दोस्तों ने मदद की और मैं इतनी यात्राएं व कार्य कर पाने में सफल रहा। इस बात को भी नामवर जी की पारखी नजर समझ पायी और उन्होंने उपन्यास के मुख्य खलनायक को अमेरिका के नये वर्ग लेजर वर्ग से संबंधित किया, जो कुछ नहीं करता, सिर्फ मस्ती करता है।
किसी भी लेखक के लिए यह प्रशंसा नुकसानदायक भी हो सकती है, यह कला के गला को घोंट सकती है, जिसका अंतिम परिणाम लेखक की लेखनी से दूरी और चिंतन की बर्बादी होगी। कार्यक्रम के अध्यक्ष पंजाबी के शीर्ष उपन्यासकार गुरदयाल सिंह का यह कथन कि उनकी कोई मजबूरी नहीं थी कि इस पुस्तक लोकार्पण को वेे स्वीकार करते। मगर वे सिर्फ इसीलिए आये कि वह अच्छी पुस्तक छोड़ते नहीं और बुरी पुस्तक पढ़ते नहीं। और इस साढ़े तीन सौ पृष्ठ के उपन्यास को मात्र तीन दिनों में खत्म कर उन्होंने इस कृति के ऊपर जो मुहर लगाई उसके बाद फिर लेखक का अति प्रसन्न होना स्वाभाविक था। मगर फिर भी अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि उपरोक्त प्रशंसा ने मेरे अंदर कहीं भी अहम् पैदा नहीं किया था। लेखनी ही नहीं किसी भी क्षेत्र में अगर शीर्ष पर पहुंचना या वहां बने रहना है तो हर एक को झूठे घमंड से बचना होगा। सफलता के शिखर पर पहुंचने के लिए सीढ़ियों पर दौड़ने वाले महत्वकांक्षी नवयुवाओं को यह मेरा एक छोटा मगर महत्वपूर्ण परामर्श हो सकता है। यह सत्य है कि सफलता प्राप्त करना, कठिन है तो सफलता को बरकरार रखना उससे भी अधिक मुश्किल, और फिर अभी तो मुझे बहुत दूर तक चलना है। मनोज सिंह ४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ ़
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