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'कशमकश` उपन्यास का विमोचन
समीक्षा
बुधवार , , 22 अगस्त

 

Team Tarakash 


 

 

 

 

 

dsc_0744लेखक मनोज सिंह द्वारा लिखा गया उपन्यास 'कशमकश` (यूनिस्टार बुक्स प्रा. लि., चंडीगढ़) का लोकार्पण प्रख्यात आलोचक एवं कुलाधिपति, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय डा. नामवर सिंह जी के कर कमलों द्वारा रविवार, १२ अगस्त, २००७ को प्रेस क्लब, चंडीगढ़ में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध उपन्यासकार एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता श्री गुरदयाल सिंह ने की। प्रो. वीरभारत तलवार,  अध्यक्ष, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली, विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। कार्यक्रम में राधेश्याम शर्मा निदेशक हरियाणा साहित्य अकादमी, श्री नरेश कौशल संपादक दैनिक ट्रिब्यून, डॉ. संसार चंद्र, भोलानाथ कश्यप संपादक समाज धर्म, पंडित सुरेश नीरव कादम्बिनी की उपस्थिति  उल्लेखनीय थी।

मुख्य अतिथि डा. नामवर सिंह ने अपने आधे घंटे के लंबे भाषण में उपन्यास की विस्तार से चर्चा की। बेबाक टिप्पणी के लिए मशहूर डा. नामवर ने उपन्यास के विभिन्न पहलूओं पर प्रकाश डालते हुए उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। मंत्रमुग्ध श्रोताओं की उपस्थिति में उन्होंने नारी चरित्र को एक पुरुष लेखक द्वारा समझने में आश्चर्य व्यक्त करते हुए शंका तो दिखलाई परंतु कुछ दृश्यों की प्रस्तुति पर यह भी कह गए कि ऐसा प्रस्तुतीकरण उन्होंने अन्यत्र कहीं नहीं देखा। विशेषकर उपन्यास में बेटी के पैदा होने पर उसकी मां के जो भाव थे ऐसा उन्होंने किसी और उपन्यास मंे नहीं पढ़ा। यह दिल को छू लेता है। उन्होंने कहा कि मनोज सिंह ने शब्दों का प्रयोग करते वक्त बारीकियों का बहुत ध्यान रखा है। उन्हें इस उपन्यास का अंतिम अधयाय अद्भुत लगा। उपन्यास पढ़ने के दौरान प्रारंभ में उन्हें कुछ दुविधा जरूर उत्पन्न हुई जिसे उन्होंने सरेआम कहा लेकिन फिर कहानी ने उन पर ऐसा प्रभाव डाला कि वे लेखक की प्रशंसा किए बिना न रह सके। डा. नामवर ने मुख्यातिथि के रूप में उपन्यास पर टिप्पणी करते हुए कहा कि लेखक ने महिला वर्ग में जो संघर्ष प्रस्तुत किया है वह वस्तुत: सराहनीय है। उपन्यास की पंक्तियों को उठाते हुए उन्होंने कहा कि... एक ओर हम धन वैभव के लिए लक्ष्मी की पूजा करते हैं, विद्या के लिए सरस्वती तथा सुरक्षा के लिए दुर्गा मगर दूसरी ओर कन्या के उत्पन्न होने पर शोक मनाने लगते हैं। उन्होंने कहा कि कशमकश उपन्यास समाज की इसी सच्चाई को पेश करता है। एक स्थान पर तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि उम्र में आधे से भी छोटे लेखक को मैं उनकी लेखनी के लिए प्रणाम करता हूं। यह 'कशमकश` पर डॉ. नामवर की मुहर थी।
गुरदयाल सिंह ने अपने अध्यक्षीय भाषण में एक कथन में सब कुछ कह डाला कि अच्छी किताब वह पढ़ने से छोड़ते नहीं और बुरी किताब पढ़ते नहीं। साढ़े तीन सौ पृष्ठ की कशमकश उन्होंने मात्र साढ़े तीन दिनों में समाप्त की और उपन्यास से प्रभावित होकर ही कार्यक्रम में आने के लिए अपनी स्वीकृति प्रदान की। इसी से उपन्यास की विशेषता का अंदाज लगाया जा सकता है। प्रो. वीरभारत तलवार ने उपन्यास के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उपन्यास एक महत्वपूर्ण प्रश्न को केंद्र में रखकर लिखा गया है और उन्हें उम्मीद है कि उपन्यास को पढ़ने वाले और समीक्षक उपन्यास की कशमकश को समझेंगे।

लेखक मनोज सिंह का जन्म १ सितंबर, १९६४ को आगरा (उत्तर प्रदेश) में और बचपन महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश में बीता। पिता श्री हरिमोहन सिंह एवं माता (स्वर्गीय) कृष्णा सिंह की तृतीय संतान व एकलौते पुत्र की हायर सैकेण्डरी परीक्षा, मध्य प्रदेश बोर्ड में मैरिट में स्थान था। इंजीनियरिंग की शिक्षा रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज भोपाल से ग्रहण करने के उपरांत, भारतीय दूरसंचार सेवा १९८६ बैच के दूरसंचार अधिकारी के रूप में मुंबई, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा व हिमाचल प्रदेश में भिन्न-भिन्न पदों पर कार्य किया। दूरसंचार विभाग में विभिन्न अवार्ड से सम्मानित लेखक को सर्वश्रेष्ठ दूरसंचार जिला के प्रमुख होने का गौरव भी प्राप्त है। एम.बी.ए. की शिक्षा इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की।
लेखक की प्रथम रचना 'चंद्रिकोत्सव` (खंड काव्य) का द्वितीय संस्करण भी प्रकाशित हो चुका है। 'चंद्रिकोत्सव` अर्थात चांदनी रात (शरद पूर्णिमा) का कौमुदी महोत्सव। प्रियतमा का प्रियतम से प्रीत का संपूर्ण कालचक्र, उसकी विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन, चांद-चांदनी एवं रात्रि के माध्यम से। सौ पृष्ठों वाले इस खंड काव्य में कुल आठ भाग व १३४ छंद हैं। शिमला यूनिवर्सिटी में इस पुस्तक पर एम.फिल. मंे शोध भी संपन्न हुआ। लेखक की दूसरी रचना है 'बंधन`। यह एक काल्पनिक उपन्यास है जिसमें लेखक ने मानसिक रोग, विशेष रूप से स्किजोफिरनियां से पीड़ित व्यक्ति के परिवार की व्यथा एवं उनके रिश्तों की मानवीय, पारिवारिक, सामाजिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विस्तार से सरल शब्दों में दिखाया है।
 
इसमें मानसिक रोगी के परिवार की दर्दभरी कहानी की रचना करते समय लेखक को स्वयं अत्यधिक पीड़ा का अनुभव हुआ था और वास्तविकता का पुट देने के उद्देश्य से लेखक ने कई संबंधित अस्पतालों एवं अन्य स्थानों का भ्रमण भी किया था। इस उपन्यास पर भी शोध का कार्य जारी है। लेखक की तीसरी रचना (व्यक्तित्व का प्रभाव) लेखों का संकलन है जो साप्ताहिक व मासिक कॉलम के रूप में नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं। लेखक की कहानी व लघु-कथाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। विभिन्न संस्थाओं एवं कॉलेज में समय-समय पर व्याख्यान के लिए, साथ ही टेलीविजन व रेडियो पर विभिन्न चर्चा-परिचर्चा में भी लेखक को आमंत्रित किया जाता है। लेखक वर्तमान में उप-महाप्रबंधक, बी.एस.एन.एल., चंडीगढ़ के पद पर कार्यरत हैं। परिवार में पत्नी श्रीमती रेखा सिंह, जो स्वयं वरिष्ठ दूरसंचार अधिकारी हंै एवं दो बेटियां अनुलिका एवं मानविका हंै।

'कशमकश`... मन-मस्तिष्क का आंतरिक संघर्ष, विचारों का अंतहीन अंतर्द्वंद्व। तीन वर्षों में लिखा गया यह एक नायिका प्रधान उपन्यास है। ७५ अध्याय व ३४३ पृष्ठों वाले इस उपन्यास में तीन पीढ़ियों की नारियों के विकासक्रम की कहानी को तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के दृष्टिकोण से देखने व परखने की कोशिश की गयी है। समय व काल के बदल जाने से तुलनात्मक अध्ययन निरर्थक है। वैसे भी परिवर्तन प्रकृति का नियम है तो समाज कैसे अछूता रह सकता है और इसीलिए महिला की अवस्था व व्यवस्था में बदलाव भी स्वाभाविक है। अब यह कितना सही है या गलत चंद शब्दों में फैसला सुना देना, गलत होगा। लेकिन यह तो जांचा ही जा सकता है कि जिस रास्ते पर वह चल रही है, आगे बढ़ रही है, क्या वास्तव में स्वतंत्र है? खुश है? आत्मसंतुष्ट है? क्या इसे हकीकत में विकास नाम दिया जा सकता है या सिर्फ यह एक परिवर्तन मात्र है? ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब सीधे-सीधे न देकर जीवन की वास्तविकता को विभिन्न परिप्रेक्ष्य में रखकर समझने की कोशिश की गयी है। वो भी खुद नारी के दृष्टिकोण से। इसे सीधे-सीधे सामान्य शब्दों में अच्छा या बुरा घोषित नहीं किया जा सकता। यह नायिका के अंतर्द्वंद्व की कहानी है। जो कुछ हमारे चारों ओर हो रहा है, जो कुछ घटित हो रहा है, जो कुछ चल रहा हैै, जो हम चारों ओर देख रहे हैं, उसी को दिखाने की यह एक कोशिश मात्र है। एक आईना है।

समाज के विभिन्न वर्गों व क्षेत्रों से संबंधित तकरीबन पैंतीस नारी चरित्र का उल्लेख उपन्यास में कई रूपों, कई संदर्भों में आता है। नानी, मां, बेटी, नातिन, बहन, भाभी, देवरानी, जेठानी, बहू, ननद सभी अपने रिश्तों के साथ उपस्थित हैं। और साथ हैं उच्च पदस्थ पढ़ी-लिखी महिलाएं, घर की नौकरानी, ऑफिस में कार्यरत महिलाएं, तलाकशुदा, विधवा, वेश्याएं, कॉलेज की बिगड़ी छात्राएं, रईस, आदिवासी महिलाएं, व्यवसायी, डॉक्टर, इंजीनियर, राजनीतिज्ञ व शुद्ध घरेलू औरतें, जिनकी अपनी-अपनी कहानी है और अपना-अपना पक्ष। अपनेे दु:ख हैं तो अपनी विशिष्ट चाहतें।
 
उपन्यास की मुख्य नायिका संचिता... बचपन से लेकर जवानी तक उसने अपनी चाहतों को दबाया था... अचानक सपनों का राजकुमार आया तो, मगर हकीकत में उसकी दुनिया को रौंदता चला गया। वो किस हद तक बर्दाश्त करती, विद्रोह कर बैठी... विद्रोह नहीं, अपनी सुरक्षा और बेटी के भविष्य के लिए भाग खड़ी हुई। वो संस्कारों की जंजीरों से बंधी तो है मगर उसमें भी आत्मसम्मान है। वो लड़ना नहीं चाहती थी, न ही जानती थी, लेकिन समय के हाथों मजबूर है। पढ़ी-लिखी व समझदार, आदर्श पत्नी बनने की कोशिश में एक सीमा तक समर्पण को भी तैयार, मगर जब मानव ने उसी लक्ष्मणरेखा को लांघ दिया तो वो क्या करती... और फिर उसने संघर्ष किया, दुनिया से लड़ी, अपनों को सहा, समाज के नियमों को नारी के पक्ष में किया, सिर्फ इसलिए कि बेटी का जीवन सफल, सुखमय और शीर्ष पर हो... वो और आगे बढ़े... मगर वो इन शब्दों के अर्थों को यथार्थ में परिभाषित नहीं कर पायी... और फिर सब कुछ अपने हाथों में भी तो नहीं... उसने पति को जिन कारणों से छोड़ा था बेटी उसी राह पर चलती दिखाई दी... जीवन के हर मोड़ पर उजाले की तलाश में भटकती संचिता के लिए यह अंतिम अंधेरा था...।
 
बेटी गेसू, आने वाली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती एक स्वतंत्र युवती, ...सफल है, उसके पास पैसा व नाम है तोे उसके अपने आदर्श और अपनी सोच व समझ भी है... उसकी अपनी इच्छाएं हैं तो फिर भूख भी तो विशिष्ट होगी... मां के दर्द को भी अपने नजरिये से ही देख पायी थी। अंत में प्रगतिशील मां के आदर्श, बेटी की जीवनशैली से उलझ गये। जीवनभर हर कशमकश का मजबूती से मुकाबला करती संचिता इस अंतर्विरोध को झेल न सकी और तभी...

उपन्यास की विशेषता है कि पात्रों को जीवंत करने के लिए लेखक ने परिस्थितियों को स्वयं नजदीक से देखने की कोशिश की है।




लेखक से सम्पर्क करने के लिए यहाँ क्लिक करें
मनोज सिंह, ४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ

टिप्पणियाँ (1)add
...
द्वारा प्रेषित सागर नाहर , अगस्त 24, 2007
सबसे पहले तो लेखक को उनके नये उपन्यास के लिये बहुत बहुत बधाई। बहुत अच्छी समीक्षा लिखी गई है, देखते हैं कब मौका मिलता है कशमकश को पढ़ने का, पर अभी से उत्सुकता तो बढ़ ही गई है।
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