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आतंकवादियों को गुजरात से प्रेम है? |
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मंतव्य
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सोमवार , , 27 अगस्त |
मंतव्य - पंकज बेंगाणी द्वारा |
वैसे यह सवाल ही बेतुका है. एक आतंकवादी को किसी से भी प्रेम नही होता, खुद से भी नहीं. वास्तव में उसके दिमाग का इस हद तक ब्रेनवॉश हो चुका होता है कि उसके लिए सही और गलत और प्रेम और भाईचारे जैसे शब्द हमेशा के लिए मिट जाते हैं.
मेरा ऐसा लिखने का संदर्भ हैदराबाद धमाकों से ही है. हैदराबाद जैसा कि दिखाई दे रहा है, आतंकवादियों के लिए सोफ्ट टार्गेट बनता जा रहा है. अभी मक्का मस्जिद में हुए धमाकों का असर खत्म भी नही हुआ था कि लुम्बीनी पार्क दहल उठा.
यह तो गनिमत है कि दूसरे बम फटे नही. नहीं तो जान माल का इतना नुक्सान होता कि मुम्बई बम धमाके फिर से याद आ जाते. आज समाचार पत्र में एक गुजराती व्यापारी की खबर पढी जो सपरिवार हैदराबाद घूमने गया था, और शनिवार के धमाकों ने उसकी जान ले ली. घर का एकमात्र कमाने वाला सदस्य चला गया. निसन्देह मेरा भी मन व्यथित हुआ.
फिर मैं सोचने लगा कि गुजरात में इस तरह के धमाके कब हुए थे? आश्चर्यजनक रूप से मुझे एक भी घटना याद नहीं आ रही. हाँ अक्षरधाम मंदिर पर हुए हमले की याद अभी भी ताज़ा है. लेकिन उसके बाद कोई बडी घटना नही हुई. ऐसा कैसे हो सकता है? क्या गुजरात आतंकवादियों के रडार पर नहीं है?
ऐसा तो हो नही सकता. विशेष कर गोधरा दंगों के बाद तो गुजरात हॉट डेस्टीनेशन होना चाहिए आतंकवादियों के लिए और मैं आश्वस्त हुं कि होगा भी. तो फिर ऐसी घटनाएँ क्यों नहीं हुई अब तक?
अगर ऐसा है तो मानना पड़ेगा कि यहाँ की कानून व्यवस्था बाकी राज्यों से अच्छी है.
हैदराबाद सोफ्ट टार्गेट क्यों है, इस बारे में आज समाचार पत्र में पढा कि इसके पीछे दो तीन मुख्य कारण है. एक, वहाँ की लचर कानून व्यवस्था तथा सरकार का ढुलमुल और हद से ज्यादा सहिष्णु रवैया, दूसरा वहाँ पर कट्टरपंथी मुस्लिमों की बडी तादाद और तीसरा एक विकसित आई.टी. हब को बर्बाद करने की मंशा. वजह चाहे जो भी हो लेकिन हैदराबाद में हो रहे एक के बाद एक धमाके देश की सुरक्षा और प्रदेश के विकास के लिए शुभ संकेत तो नहीं ही है.
गुजरात अभी तक बचा हुआ है, लेकिन कल किसी ने देखा नहीं है. कल कुछ भी हो सकता है. मन में एक भय का वातावरण तो है ही. कुछ दिन पहले एकमॉल में हजारों लोगों के बीच चलते हुए मेरे मन में विचार आया कि अभी एक बम फटे तो? दो पल सिहरने के बाद मै सिर झिडककर आगे बढ गया, डर कर कब तक जीएंगे!
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