| कशमकश के पीछे की कहानी |
| मेरे विचार | ||
| सोमवार , , 03 सितम्बर | ||
विगत सप्ताह कहानी के पीछे की कहानी, लेख पढ़कर लग सकता है कि यह एक आसान काम है। लेकिन 'कशमकश` उपन्यास के लिए उपरोक्त प्रयोग आसान नहीं था। तीन पीढ़ियों में फैले तकरीबन पैंतीस नारी चरित्र को पढ़ने व समझने के लिए अधिक पापड़ बेलने पडे।़ उच्च पदस्थ पढ़ी-लिखी महिलाएं, घर की नौकरानी, ऑफिस में कार्यरत साधारण औरतें, तलाकशुदा, विधवा, वेश्याएं, कालेज की अच्छी व बुरी छात्राएं, रईस, आदिवासी महिलाएं, व्यवसायी, डाक्टर, इंजीनियर, राजनीतिज्ञ, शुद्ध घरेलू औरतें, बिन ब्याही मां, अकेली औरत, नारी ने कई रूप में, हर क्षेत्र में अपना विकास किया है। प्रत्येक को समझे बिना नारी के विकासक्रम की कहानी को लिखना गलत होता। तभी उसके हर रूप को समझने के लिए इन चरित्रों से मिलना पड़ा। भारतीय समाज में औरतों से निकटता आज भी इतनी आसान नहीं। तभी तो तन बेचने के लिए तैयार वेश्याएं भी विचारों को बांटने के लिए तैयार न थीं। समाज का भय व इज्जत की बात इनमें भी स्वाभिमान बनकर उभरती। छात्राएं जो गलत रास्ते पर आगे बढ़ चुकी हैं, पैसों के लिए सब कुछ बेच तो सकती थीं लेकिन खुलकर सामने आने से कतरा रही थीं। यह समाज के लिए अंतिम शुभ लक्षण है कि अब भी उनमें जमाने का डर है अन्यथा स्थिति विस्फोटक हो सकती है। जो अनपढ़ गंवार औरतें थी उन्हें समाज का भय तो नहीं था, मगर उनके मन में शंका जरूर होती थी कि उन्हें किसलिए देखा व समझा जा रहा है। उनसे उनके मन की बात निकालना और अधिक कठिन था। और जो महिलाएं अपने-अपने क्षेत्र में सफल हैं वो खुलकर बात नहीं करना चाहतीं। उनसे मिलना ही मुश्किल है और अगर मिल भी गयीं तो समझना लगभग असंभव, चूंकि ये अंदर से बड़ी जटिल होती हैं। इनका व्यक्तित्व रहस्यमय होता है। यह असलियत को बड़ी आसानी से छुपा ले जाती हैं। सफलता पुरुष और महिला दोनों में ही बराबरी से जटिलता पैदा करती है। नायिका प्रधान इस उपन्यास के नारी चरित्र, नानी, मां, बेटी, नातिन, बहन, भाभी, देवरानी, जेठानी, बहू, ननद न जाने कितने रिश्तों में उपस्थित हंै। अब इनके अनुभव, दृष्टिकोण, विचारधारा, रहन-सहन, समझ को समझने के लिए इनके बीच बैठना उनके साथ रहना अति आवश्यक था। जो फिर स्थान, परिवार, संस्कृति व आर्थिक अवस्था के बदलते ही बदल जाता है। इसलिए मध्यमवर्गीय अन्य सामान्य पात्र घर-परिवार-दोस्तों में से उठाने पड़े जो कि आसानी से उपलब्ध थे। लेकिन उन्हें यह बताने पर कि उनका चरित्र उपन्यास में आ सकता है अधिकांश ने सहयोग नहीं किया था। और फिर कालांतर में मैंने चुपचाप ही उन्हें अवलोकन करना शुरू किया था। मुम्बई, पूना, भोपाल व नागपुर की गलियों की खाक छानना, सर्वेक्षण करना, ऊपर से बार गर्ल, ड्रग्स में फंसी नवयुवतियांे के संपर्क में आना या फिर अति रईस मगर बिगड़े हुए परिवारों की दास्तां सुनने का कार्य थोड़ा कठिन था। फिर भी कोशिश जारी रही। वक्त और पैसे के साथ-साथ हिम्मत भी कई बार डांवांडोल हो जाती थी। मगर उपन्यास के पात्रों ने मुझे हमेशा पे्ररित किया। एक जुनून होता था। कहानी में वास्तविकता का पुट देने के लिए प्रत्येक पात्र की शब्दावली, भाषा, मजबूरियां, मन:स्थिति, उनका रोष, उनकी भावनाएं जानने के लिए उनके बीच जाना पड़ा। मुम्बई के चौपाटी, जुहू बीच, बांद्रा (बैंड स्टैंड), मैरिन ड्राइव व समुद्र के किनारे का अधिकांश भाग स्वतंत्र नर-नारी के प्रेम दृश्यों से भरा पड़ा है। उनके बीच घुसकर नैतिक-अनैतिक संबंधों के मूल में पहुंचना मुश्किल कार्य था। मगर यह संस्कृति तेजी से फैल रही है और नारी वर्ग इसमें बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही है तभी तो कस्बों व छोटे शहरों में भी यह जीवन पहुंच चुका है। इसलिए इसे नजरअंदाज करना ठीक न था और मैं इनमें घुसकर झांकने के लिए मजबूर हुआ था। मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्र की यात्रा अधिक कष्टदायक थी। उनकी अत्यधिक गरीबी, आदिवासी महिलाओं का शोषण देखना बड़ा हृदय विदारक था। एक बात जो उभरकर आई कि निम्न वर्ग अपना तन बेचता है तो पेट की आग को शांत करने के लिए, चाहे फिर वो मुम्बई की सड़क वाली वेश्या हो या मंडला जिले के ढाबांे में बिकने वाली आदिवासी महिला। मगर यह आधुनिक संचार क्रांति का कमाल ही है कि एक नयी भूख उत्पन्न हुई है, एक नया आकर्षण पैदा हुआ है, एक नयी चाहत पैदा हुई है। कपड़े, फैशन, होटल, चमक-दमक को पाने के लिए कुछ आधुनिक युवतियां कुछ भी करने को तैयार हंै। और एक नयी युवा फौज तेजी से अपना पैर पसार रही है। नायिका के समाजशास्त्र विषय का प्रोफेसर होने के कारण समाजशास्त्र को पढ़ना आवश्यक था। जिसे समझने के लिए कालेज के प्रोफेसरों ने सहयोग तो किया लेकिन किताबी ज्ञान से बाहर निकलने में वे सफल न हो पाये थे। और तभी मुुझे समाजशास्त्र को समाज के वास्तविक चरित्रों पर रखकर देखना-परखना पड़ा था। उपन्यास के चरित्र के खजुराहो जाने पर, मेरा भी वहां जाकर विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल को देखना व उसके इतिहास को समझना जरूरी था। जिसके लिए दोस्तों ने काफी मदद की। मध्यप्रदेश के आईजी कैलाश मकवाना ने अपने बचपन की मित्रता अच्छी तरह से निभाई और मैं खजुराहो जाकर मंदिरों को न केवल नजदीक से देख पाया बल्कि विस्तार से पढ़ व समझ भी पाया था। उसके एक हजार वर्ष के लंबे इतिहास को नायक-नायिका के हनीमून के कुछ चंद पन्नों में समेटकर, साथ ही वर्तमान स्थिति को भी प्रस्तुत करने में मैं कितना सफल रहा यह तो पाठक ही बता पाएंगे, लेकिन वहां उकेरे गये नर-नारी के प्राकृतिक संबंधों के चित्रण को लेकर विभिन्न मतों व विचारों में भिन्नता एवं विरोधाभास है। जो प्राचीन भारतीय संस्कृति व सभ्यता के एक दिलचस्प पहलू को चित्रित करता है। पुणे के एक व्यवसायी दोस्त ने भी अच्छी-खासी मदद की थी तो मुम्बई में साथ में नौकरी कर चुके एक मित्र ने बीयर बार में जाने में हमेशा साथ दिया था। देह व्यापार में लिप्त लोगों से मिलते जाते समय कई बार मेरा पर्स और मोबाइल अपने पास रखने में उसे डर भी लगता था कि जिस किसी से मैं मिलने जा रहा हूं पता नहीं सही सलामत लौटूं या नहीं। कई बार एक बीयर पीने वाले उस दोस्त को तीन-तीन घंटे बैठकर दो-तीन बीयर भी पीना पड़ा था। घर-परिवार से छुपकर व झूठ बोलकर आने के कारण वापस जाते समय उसके मन में भय रहता था। हां, मेरे घर में इस बात के लिए अधिक तकरार नहीं हुई। अब यह पत्नी का विश्वास था या उसकी इस बात की स्वीकृति कि मैं लेखन में हद से आगे निकल चुका हूं, कहना मुश्किल है। लेकिन मुझे आजकल फैल रही बीमारियों का भली-भांति ज्ञान था और मैं वास्तविकता को जानने के लिए एक सीमा तक ही गया था। यही प्रमुख कारण था जो मैं सदैव अपने आप को हर जगह से पाक साफ निकाल पाने में सफल रहा। अन्यथा मेरे अंदर का जानवर भी कभी-कभी मुझ पर हावी होकर मुझे फिसलने के लिए मजबूर करता था। वैसे बीमारी के डर के अतिरिक्त इस जिम्मेवारी का अहसास भी कुछ गलत कार्य करने से रोकता था कि फिर मैं घटनाक्रम को यादकर ठीक से लिख नहीं पाऊंगा। इस दौरान कई खट्टे-मीठे व रोचक अनुभव भी हुए। कुछ जगहों पर मुझे जलील भी होना पड़ा। और ये प्रसंग व घटनाक्रम हू बहू उपन्यास में आकर पाठक को रोमांचित व आश्चर्यचकित करेंगे, ऐसा मेरा मानना है। यह सवाल उठाया जा सकता है कि नारी के दृष्टिकोण को नर कितना समझ सकता है उसके साथ कितना न्याय कर सकता है। इसके जवाब में यही कहा जा सकता है कि किसी भी पात्र को लिखने के लिए लेखक को उस पात्र को जीना होता है। जरूरी तो नहीं कि वह जिस पात्र की रचना कर रहा हो वह उसके व्यक्तित्व में पहले से ही उपस्थित हो। जब वह किसी दूसरे पात्र की रचना कर सकता है, उसे समझ कर लिख सकता है तो नारी पात्र क्यों नहीं? और फिर इतिहास इस बात का गवाह है कि अधिकांश कलाकार पुरुष हुए हैं जबकि ज्यादातर कलाकृतियां नारी केंद्रित हैं, फिर चाहे वो पेंटिंग हो, मूर्ति हो या फिर कविता या कहानियां। मेरे उपन्यास की सत्यता व हकीकत के नजदीक होने का प्रमाण इस बात से पुख्ता हो जाता है कि डाक्टर नामवर सिंह जैसे प्रख्यात व बेबाक आलोचक ने 'कशमकश` के लोकार्पण समारोह में, बतौर मुख्य अतिथि अपने वक्तव्य में, उपन्यास के कुछ एक घटनाक्रम के प्रस्तुतीकरण को अद्भुत कहा। जिसका एकमात्र कारण मेरे मतानुसार यही होना चाहिए कि लेखक ने हर एक किरदार को जीने की कोशिश की, परिणाम हुआ कि हर एक पात्र स्वयं अपनी कहानी लिखाता चला गया। मनोज सिंह ४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ़
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