| मिसाइल-प्रकार व कार्यप्रणाली |
| विज्ञान | |
| सोमवार , , 03 सितम्बर | |
मिसाइल यानी की प्रक्षेपास्त्र के प्रकार व कार्य प्रणाली के बारे में जानने से पहले जान लें की मिसाइल एक प्रकार से जटिल व परिष्कृत रॉकेट ही है, मगर दो बातों में रॉकेट से भिन्न भी है, एक, प्रक्षेपास्त्र में विस्फोटक पदार्थ भरा होता है, दूसरा प्रक्षेपास्त्र में दिशा-सूचक प्रणाली लगी होती है. वैसे तो दुनिया का पहला प्रक्षेपास्त्र ‘वी-1’ हिटलर के प्रसिद्ध जर्मन रॉकेट वैज्ञानिक डॉ. वर्नर ब्राउन 1936 में विकसित किया था, मगर लिखित इतिहास पर नजर डालें तो तीसरी सदी में चीन वासी पूजा-अर्चना व मनोरंजन के लिए बारूदी रॉकेट उडाया करते थे, फिर 11वीं सदी के आते-आते इनका उपयोग सैन्य कार्यवाहियों में होने लगा. इधर भारत में 1798 में मैसूर के टिपू सुलतान ने पहले पहल लोहे की रॉकेटों का युद्ध में ब्रिटीशरों के विरूद्ध सफल प्रयोग कर युद्ध में जीत हासिल की थी. इन्ही रॉकेटों को फिर ब्रिटेन में परीक्षण के लिए भेजा गया जहाँ बाद में ब्रिटिश सेना के लिए 1803 में ‘कॉंग्रेव-रॉकेट’ विकसित की गई. यहीं से रॉकेट तकनीक से यूरोप परिचित हुआ. अब वापस आते है, प्रक्षेपास्त्र के तीव्र विकास दौड़ की शुरूआत करने वाले ‘वी-1’ प्रक्षेपास्त्र पर. चन्द्र तक मानव को ले जाने वाले रॉकेट को बनने वाले डॉ. ब्राउन ने जर्मनी को पहला प्रक्षेपास्त्र ‘वी-1’ दिया, यह रॉकेट कम और अपनी 5.4 मीटर तक फैली पँखों के साथ विमान ज्यादा था, ऐसा कह सकते है. 1000 किलो ग्राम विस्फोटक के साथ 20 मिनट तक चले उतने ही पेट्रोल की क्षमता वाला यह रॉकेट मात्र 560 किमी की रफ्तार से उड़ सकता था, तथा मार्ग-निर्देशन की स्व-चालित व्यवस्था के अभाव में अचूक निशाने पर भी नहीं दागा जा सकता था. इसलिए प्रथम विश्व-युद्ध के पहले चरण में लंदन पर दागे गए 8070 मिसाइलों में केवल 2420 ही शहर पर गिरे और 5684 लोगो का भोग लिया. इसके बाद 6 सितम्बर 1944 को “वी-2” को पहले पहल दागा गया, यह वी-1 के मुकाबले ज्यादा दूर तक मार कर सकता था तथा उसमें मार्ग-निर्देशन की उस समय जैसी सम्भव हो सकती थी, वैसी व्यवस्था भी थी. इसलिए यह मिसाइल 'वी-1' से ज्यादा सफल रही. जर्मन के विरूद्ध एक साथ लड़ने वाले रूस व अमेरीका समय के साथ दुश्मन बने तब उन्हे मिसाइल की उपयोगिता का बखूबी अंदाजा था. मगर उस समय प्रक्षेपास्त्र तकनीक में जर्मन का मुकाबला कोई नहीं कर सकता था. हिटलर की पराजय के बाद अमेरीका ने राष्ट्रहित में जर्मन प्रक्षेपास्त्र-विशेषज्ञों को जिन्दा पकड़ने का आदेश दिया तथा सम्भव हो उतने ‘वी-2’ प्रक्षेपास्त्र अपने कब्जे में लेने को कहा. अमेरीका ने डॉ.ब्राउन सहित 60 ‘वी-2’ प्रक्षेपास्त्र अपने कब्जे में लिये. रूस ने भी ऐसी ही स्वार्थी नीति अपनायी, मगर उसने कितने लोगो को तथा प्रक्षेपास्त्रो को कब्जे में लिया यह कोई नहीं जान सका. युद्ध के अगले बारह वर्षो तक दोनो देशो में प्रक्षेपास्त्र प्रतिस्पर्धा ने जोर नहीं पकड़ा क्यों की दूर तक मार कर सकने लायक प्रक्षेपास्त्र बनाने की क्षमता दोनो के पास नहीं थी, वहीं परमाणु अस्त्र वहन करने वाले लम्बी दूरी तक उड़ सकने वाले युद्धक विमान विकसित किये ही जा चुके थे. मगर रूस ने 1957 में विश्व को चौका दिया. उसने ‘एस.एस.6’ नामक पहली 5600 किमी तक मार करती अतंरखंडीय मिसाइल दागी, इतना ही नहीं मिसाइल पर आधारीत रॉकेट द्वारा पहले उपग्रह ‘स्पुतनिक-1’ को भी प्रक्षेपित किया. इससे अमेरीका के हाथ-पाँव फूल गए. उसके प्रक्षेपास्त्र 2500 किमी तक ही मार कर सकते थे. अगले दो सालो में ही अमेरीका ने 10000 किमी तक मार कर सकने वाले टाइटन प्रक्षेपास्त्र तथा 12000 किमी तक मार कर सकने वाले एटलस प्रक्षेपास्त्र बना डाले. अब स्पर्धा में पीछे न रह जाने की ठाने रूस ने 16 मीर्च 1962 को धोषणा की की पूरे विश्व में कहीं भी मार कर सकने की क्षमता उसने अपने 30000 किमी की रेंज के प्रक्षेपास्त्र के साथ प्राप्त कर ली है. अगले एक दसक में दोनो देशो के बीच चली प्रक्षेपास्त्र-प्रतिस्पर्धा के परिणाम स्वरूप एंटी-एयरक्राफ्ट, एंटी-टेंक, एंटी-शीप, एंटी-सबमरीन जैसे प्रक्षेपास्त्र बनाये गये. युद्ध में इनकी भूमिकाएं अलग अलग थी, कार्य-प्रणाली में भेद था. निर्देशन प्रणालीयाँ भिन्न थी. इस प्रकार प्रक्षेपास्त्रों का वर्गिकरण निम्न हो सकता है, जिनके बारे में आगे लिखा जाने वाला है: बेलिस्टीक, नॉन-बेलेस्टीक, सरफेस टू सरफेस, सरफेस टू एयर, एयर टू एयर, एयर टू सरफेस, कमान्ड गाइडन्स, एक्टीव गायडंस, पेसिव गाइडंस, बीम रायडींग गायडेंस, प्रिसेट गायडंस क्रमशः टिप्पणियाँ
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बेहतरीन जानकारी दे रहे हैं. अंत में कोशिश करियेगा कि सारा मैटर एक साथ आ जाए.