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समीक्षा: धमाल में है धमाल |
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समीक्षा
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शनिवार , , 08 सितम्बर |
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इंद्र कुमार की पहचान उनकी सुपरहिट फिल्म "बेटा" से बनी थी. और बेटा के बाद उनकी कई फिल्मे हिट भी रही थी, जिसमें ईश्क प्रमुख है. हालाँकि इन्द्र कुमार कभी भी महान फिल्मकार तो नहीं माने गए. वे हल्की फुल्की फिल्मे ही बनाते रहे.
इस समय कोमेडी फिल्मों के हिट होने का चलन चल रहा है, उसी को देखते हुए इन्द्रकुमार ने यह फिल्म बनाई है ऐसा लगता है. उन्होने भरपुर कोशिश की है, कि वे प्रियदर्शन की भाँति एक उम्दा कोमेडी फिल्म बना सकें लेकिन वे इस प्रयास में आंशिक रूप से ही सफल हुए हैं. लेकिन सिनेमाघर में रुपए खर्च कर आए हुए दर्शक का पूरा पैसा वसूल हों, यह जरूर हुआ है.
इस फिल्म को देखो, हँसो और भूल जाओ श्रेणी मे रखा जा सकता है.
क्या है कहानी:
मानव (जावेद जाफरी), आदित्य (अरशद वारसी), रॉय (रितेश देशमुख) और बोमन (आशीष चौधरी) चार दोस्त हैं। कोई महाबेवकूफ है तो कोई जरूरत से ज्यादा होशियार। एक दिन बोस (प्रेम चोपड़ा) उन्हें मरने के पहले एक खजाने के बारे में बता देता है।
बोस के पीछे इंसपेक्टर कबीर (संजय दत्त) पड़ा रहता है। बोस की मौत का जिम्मेदार वह इन चारों को मानता है। जब उसे खजाने का पता चलता है तो वह भी उस खजाने को पाने की होड़ में शामिल हो जाता है। सब आपस में लड़ पड़ते हैं और अकेले ही खजाने की तलाश में निकल पड़ते हैं। इस भागमभाग को हास्य दृश्यों के माध्यम से दिखाया गया है।
देखने की वजह:
फिल्म में दिखाया गया हास्य अश्लीलता और फूहड़ता से कोसों दूर है, यह कोफ्त पैदा नही करेगा.
अभिनय के मामले में जावेद जाफरी, आशीष चौधरी, रितेश देशमुख और अरशद हँसाने में कामयाब रहें। संजय दत्त के बारे में भी यहीं कहा जा सकता है, हालाँकि उनके हिस्से कम ही फ्रेम आई है. फिल्म में कोई नायिका नहीं है और जरूरत भी नही थी. इस जगह ईन्द्र कुमार बधाई के पात्र हैं. उन्होने जबरदस्ती पात्र नही ठुंसे.
जावेद जाफरी की बहुत तारीफ हो रही है.
ना देखने की वजह:
तकनीकी स्तर पर फिल्म थोड़ी कमजोर है। मध्यांतर आते आते ढिली पड जाती है.
तो क्या है आखिरी राय:
टाइमपास फिल्म है, एक बार देखिए और भूल जाइए.
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| निर्देशन |
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| अभिनय |
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| संवाद |
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| संगीत |
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