| 'चक दे इंडिया` |
| मेरे विचार | ||
| सोमवार , , 10 सितम्बर | ||
भारतीय सिनेमा में नायक-नायिका के प्रेम-प्रसंग, उनका पेड़ांे के ईदगिर्द नाचना आम बात है। इसके बिना हिन्दुस्तानी फिल्म की कल्पना ही नहीं की जा सकती। नायक-नायिका कहीं भी, कभी भी, किसी भी तरह का गाना गाने व साथ ही नृत्य करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। फिर चाहे वो पेरिस की गलियां हों या फिर अमेरिका, दुबई और हांगकांग स्थित बड़े-बड़े मॉल। बिना वाद्यऱ्यंत्रों के संगीत भी बजने लगता है और अचानक बेसुरे हीरो-हीरोइन सुर में गाने लगते हैं। हीरो द्वारा दसियों खलनायकों को पीटना दशकों से हमारे फिल्म का अभिन्न अंग है। बॉलीवुड में इन सब के बिना फिल्म संभव ही नहीं। ये सफलता के मूलमंत्र माने जाते हैं। मनोरंजन व मस्ती के नाम पर सेक्स प्रमुखता से परोसा जाता है। करोड़ों लेने वाली नायिका अक्सर पूरे फिल्म में सिवाय अंग प्रदर्शन के कुछ खास नहीं करती। फिर भी उनके सशक्त अभिनय करने की रिपोर्टिंग की जाती है।
विगत सप्ताह 'चक दे इंडिया` देखने का मौका मिला। दूसरे सप्ताह भी हॉल में अच्छी भीड़ थी। फिल्म अभी भी चल रही है और दर्शक बटोर रही है, यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ, जबकि फिल्म में कोई भी चर्चित (एक्टिंग के अतिरिक्त किसी अन्य कारण से) हीरोइन नहीं, और कोई प्यार में डूबा युगल गीत या पश्चिमी धुन में लिपटा आधुनिक पॉप भी सुनने को नहीं मिला था। फिर भी बॉक्स ऑफिस पर इसकी तगड़ी रिपोर्टिंग और मीडिया में काफी अच्छी चर्चा हो रही है, इन सब बातों की हैरानी थी। फिल्म देखने जाने से पूर्व यह तो सुन ही रखा था कि इसमें अमीर-गरीब का भेद करने वाली कहानी नहीं है, न ही फूहड़ हास्य है, अंडरवर्ल्ड का क्राइम नहीं, कोई सेक्स नहीं, कोई अतिरिक्त आइटम गर्ल या आइटम डांस नहीं। और तो और दर्शकों को बहलाने वाली टू-पीस में इतराती हीरोइन नहीं, कोई खलनायक नहीं। यही नहीं लाखों खर्च कर बनाया गया भव्य सैट नहीं, कलाकारों के महंगे ड्रेस नहीं, और फिर कोई जबरदस्ती का पैदा किया गया विवाद व मीडिया का प्रचार नहीं। सबसे बड़ी ताज्जुब की बात तो यह कि एक ऐसे विषय पर फिल्म बनाई गई जो कि हॉट नहीं, राजनीतिक रूप से संवेदनशील नहीं, क्रिकेट जैसा बुखार नहीं, किसी ऐतिहासिक पुरुष की कहानी नहीं, वो तो हिन्दुस्तान में तकरीबन खत्म हो चुकी हॉकी है वो भी महिलाओं की। जब सुना तो ताज्जुब हुआ था कि यह फिल्म चल कैसे रही है? इसमें कुछ भी तो नहीं। और फिर पिक्चर देखने के पूर्व उत्सुकता बढ़ी थी, जिज्ञासा भी हुई थी। आज के युवा वर्ग में प्रवेश कर रही दोनों बेटियों को किसी तरह साथ चलने को मनाया था। अन्यथा उनके लिए भी इसमें कुछ विशेष नहीं था। मगर फिर हॉल में बैठते ही फिल्म शुरू होते ही वक्त का पता नहीं चला और यह देखकर खुशी हुई कि बेटियां भी बीच-बीच में जोश में तालियां बजा रही थीं। अंत तक पहुंचते-पहुंचते मुझमें भी इतना उत्साह भर गया कि मैं भी बच्चा बनकर एक बार जोर से ताली बजा गया। बाहर निकलकर सोचा, विश्लेषण किया कि इसमें ऐसा क्या है, तो पाया कि सर्वप्रथम इसमें वो है जो किसी और में नहीं। कहानी वास्तविकता के नजदीक है, सत्य है, काल्पनिकता का पुट है भी तो दर्शकों को बांधने के लिए, और वो बेतुका नहीं लगता। और सबसे महत्वपूर्ण इसमें नयापन है, जोश है, दर्शक सपनों की दुनिया के चरित्रों को नहीं देखता, वो उन्हें अपनों से लगते हैं, अपनों के बीच में से उन्हें पाता है। वे सरल और सहज दिखाई देते हैं। फिल्म के पात्रों में 'हीरोशिप` नहीं दिखाई देती। वह आम आदमी से लगते हैं और दर्शक उनसे जुड़ जाता है। संक्षिप्त में कहें तो यह इस बात को पुन: प्रमाणित करता है कि किसी भी रचना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि लोग अपने आप को उससे कितना जोड़ पाते हैं।एक बात और, दर्शक मनोरंजन तो चाहता है, मगर अति किसी भी चीज की खराब होती है। वह सेक्स, हिंसा, महंगे सैट व ग्लिसरीन के आंसू देख-देख कर जल्द ही बोर हो जाता है। उसे नयापन चाहिए। तभी तो स्पाइडर मैन, हैरी पॉटर खूब बिकते और चलते हैं। पता नहीं बॉलीवुड इस बात को कब समझेगा कि आज ही नहीं सदा से फिल्म के लिए हीरो-हीरोइन उतने आवश्यक नहीं जितना की उसके कथानक का मौलिक व सशक्त होना सफलता के लिए जरूरी है। और इसके बाद नंबर आता है डायरेक्टर का, जिसका कुशल व अनुभवी निर्देशन किसी भी फिल्म को सफल बना सकता है। वह खराब से खराब अभिनेता से भी अभिनय करा सकता है। फिल्म में जान डाल सकता है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जहां महान निर्देशकों ने घटिया से घटिया हीरो से भी उम्दा एक्टिंग कराई हो। और फिर अंत में फिल्म के हीरो-हीरोइन के अभिनय की बात आती है जिनके जीवंत अभिनय से फिल्म दर्शकों के मन-मस्तिष्क पर अंकित हो जाती है। अच्छी फिल्में नायक-नायिका को स्थापित करती है न कि हीरो-हीरोइन किसी फिल्म को हिट कर सकते हैं। उपरोक्त प्रथम दो महत्वपूर्ण क्रम को छोड़कर सिर्फ तीसरे चरण को महत्वपूर्ण बना देने से फिल्म सफल नहीं हो सकती। तभी बड़े-बड़े हीरो-हीरोइनों से सजी हुई फिल्म बेहद हॉट आइटम सांग व सीन के बावजूद दूसरे दिन सांस नहीं ले पाती और ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जहां सुपर फ्लाप हो जाती हैं। आज का डायरेक्टर हैरान है, परेशान है, मगर इतनी-सी बात नहीं समझ पा रहा। जबकि 'रंग दे बसंती`, 'मुन्नाभाई...` के बाद 'चक दे इंडिया` जैसे बेहतरीन व सशक्त उदाहरण उसके सामने है। गौर करें तो 'चक दे इंडिया` के प्रोड्यूसर को मुनाफा भी जबरदस्त हुआ होगा क्योंकि फिल्म में नायक शाहरुख खान के अतिरिक्त कोई अतिरिक्त खर्चा दिखाई नहीं देता। कोई भव्य सैट नहीं, कोई अतिरिक्त महंगे कलाकार नहीं, लंबे-चौड़े विदेशी लोकेशन नहीं और प्रचार पर विशेष खर्चा भी नहीं। दर्शकों ने खुद चर्चा की और फिल्म चल निकली। फिल्म की कहानी मौलिक है। इसके अतिरिक्त इसमें एक नहीं कई जगह, कई तरह से समाज को संदेश भी दिए गए हैं। फिल्म समाज का मात्र आईना नहीं, उसका पथ-प्रदर्शक भी होता है। और इस फिल्म में ऐसे कई प्रसंग हैं जो दर्शक के दिल-दिमाग को छू लेते हैं। मसलन मीडिया द्वारा किसी नायक को अचानक खलनायक बना देना, धर्म-जात के नाम पर भेदभाव, खेल में राजनीति, राष्ट्रीय टीम का छोटे-छोटे राज्य के आधार पर बंटा होना और क्रिकेट की बेवजह की हवा, कोच द्वारा टीम को आपस में जोड़ना, देश के लिए अतिरिक्त कार्य करना ऐसे कई उदाहरण हैं। टीम के कोच का जज्बा, उसका जोश न केवल हॉकी की टीम के लिए दूसरे अन्य खेलों के लिए एक आदर्श उदाहरण बन सकता है। और फिर पूरी टीम का एकजुट होकर पूरे दमखम से खेलना व जीतना कई खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकता है। मेरा तो मत है कि इस फिल्म को सभी खिलाड़ियों को आवश्यक रूप से दिखाया जाना चाहिए। और जिस तरह युद्ध से पूर्व कुछ वॉर मूवी और देशभक्ति के गीत सुनाए जाते हैं यकीनन यह फिल्म भी भारतीय खिलाड़ियों को हर मैच की पूर्व संध्या पर दिखाई जा सकती है। 'चक दे इंडिया` हॉकी की प्रतिष्ठा वापस लाने में कितना मदद करेगी यह तो नहीं पता लेकिन उसके परिणाम दिखने लगे हैं। तभी पुरुष के साथ-साथ महिला भारतीय हॉकी टीम भी पिछले कुछ दिनों से निरंतर जीत रही है। हो न हो इस फिल्म का भावनात्मक रूप से खिलाड़ियों पर जरूर असर हुआ होगा। यही नहीं खेल भावना से ओतप्रोत यह फिल्म कई दिनों तक हमारे जेहन में घूमती रहेगी। जरा जरा-सी बात पर टैक्स फ्री करने वाली राज्य सरकारें इस ओर चाहे ज्यादा ध्यान न दें लेकिन दर्शकों ने इसे स्वीकार कर लिया है। तभी तो अनमने ढंग से गई हुई मेरी छोटी बेटी पहली बार किसी फिल्म को एक बार फिर देखने के लिए पूरी तरह तैयार है। फिल्म के निर्माता, निर्देशक तो बधाई के पात्र हैं ही शाहरुख ने भी अपने सशक्त अभिनय से अपना सिक्का जमा दिया। यह उन्हें खेल जगत में कई सदियों तक जिंदा रखेगी। फिल्म 'स्वदेश` के बाद समाज व देश को कुछ सार्थक देने के लिए वो सदा के लिए अमर हो गए। क्रिकेट वालो होशियार, फिल्म के इस डायलॉग सेे दर्शकों में खूब हंसी छूटी थी कि हॉकी में छक्के नहीं होते। मनोज सिंह ४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ
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टिप्पणियाँ
(3)
द्वारा प्रेषित सागर नाहर , सितम्बर 10, 2007
बेहतरीन समीक्षा... फिल्म देखने की इच्छा बढ़ सी गई है। देखते हैं कब मौका मिल पाता है फिल्म देकने का।
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मनोजजी,
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इस समीक्षा के लिए धन्यवाद. दस दिन पहले मैंने, पत्नि के साथ, यह फ़िल्म देखी थी । उसी दिन एक हॉकी स्टिक खरीदने का मन हुआ ! समीक्षा ध्यान से पढ़ा और ऐसा लगा फ़िल्म एक बार फ़िर देख रहा हूँ । इस फ़िल्म के बारे मेरी राय आपकी राय से १०० % मिलती है । सागरजी, फ़िल्म अवश्य देखिए । आप निराश नहीं होंगे । यह मेरी गारंटी है । बस, आम फ़िल्मों में जो देखने को मिलता है, उसकी अपेक्षा न करना । यह फ़िल्म पथ से हटकर एक अलग किस्म का फ़िल्म है । G विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु report abuse
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