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कोई बताए, हिन्दी सेवा होती है क्या?
संजय दृष्टि
बुधवार , , 12 सितम्बर
sanjay  संजय दृष्टि - संजय बेंगाणी द्वारा

एक व्यक्ति था, सारी उम्र पत्थर की प्रतिमा को पूजता रहा. मरा तो भगवान ने नर्क में डाल दिया. यह अन्याय था, सारी उम्र सेवा में निकाल दी और मिला नर्क!. भगवान ने कहा कि पूजा तो तुमने की मगर बिना विधि जाने. तुमने प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा तो की ही नहीं थी.

ऐसा ही होता है, किसी कार्य को विधिवत ही किया जाना चाहिए, तभी वह किया गया माना जाता है. अन्यथा किये गए कार्य व्यर्थ ही गए समझो.

ऐसा ही मामला है, हिन्दी की सेवा का. पता नहीं यह सेवा आखिर होती कैसे है. एक अहिन्दीभाषी राज्य में पढ़ाई-लिखाई की. एक किताब हिन्दी की होती थी, एक अंग्रेजी की. अंग्रेजी अनिवार्य नहीं थी तो खुला मैदान मिल गया. जैसे देशप्रेम के लिए पाकिस्तान, चीन या अमेरिका से नफरत करना अनिवार्य होता है, हमने हिन्दी के लिए अंग्रेजी से नफरत शुरू कर दी. सोचा जब मुगल गए तो फारसी गई और अंग्रेज गए तो अंग्रेजी जानी चाहिए. जनता का राज है जनता की भाषा चले. किसी दिन एक शिक्षक ने हम विद्यार्थियों की कमजोर अंग्रेजी देख सलाह दी की बोलचाल में अंग्रेजी शब्दो का प्रयोग किया करो. उसी दिन प्रण लिया बोलचाल में जो भी शब्द अंग्रेजी के घूस आये है, उन्हे भी निकाल बाहर करेंगे. बस ऐसा ही था हमारा राष्ट्रभाषा (मातृभाषा हिन्दी नहीं है) के प्रति अन्धा प्रेम.

फिर तकदीर ले गई सुदूर असम राज्य में. गुजराती फिर भी हिन्दी के निकट है, वहाँ तो अभी भी लोग अंग्रेजी राज में जी रहे हैं. आनन्द की बात यह थी की पास ही “मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय” था. ज्यादातर खाली समय वहीं बीतता. हिन्दी समर्थक साहित्य ने मानो करेले पर नीम चढ़ा दिया. अब चिट्ठीयों पर हिन्दी में पते लिखने लगे, बिना डाकिये की परेशानी जाने. दूसरों से भी कहते की हमें जो भी चिट्ठी भेजो हिन्दी में पता लिख कर भेजो. ऐसी चिट्ठीयाँ जब मिलती तो मजा आता. डाकिया किसी से या डाकघर में ही किसी से पते को अंग्रेजी में दुबारा लिखवा कर लाता. सही में कट्टरता दूसरों के दर्द से खुश होती है.

कहते है आदमी कूसंगत में जल्दी पड़ता है, हम-उम्र साथियों पर भी असर दिखने लगा. अभिभावक मुझे कोसते, अपने बच्चो के हिन्दी प्रेम के लिए नहीं, उनकी अंग्रेजी के प्रति नफरत के लिए.

जोधपुर आना हुआ तब तक चैक वगेरे भी हिन्दी में लिखे जाने लगे. राजस्थान में ही हिन्दी में लिखे चैक बैंक वाले कौतूहल से देखते. मैं हूँ नहीं, मगर शक्ल से पढ़ा-लिखा दिखता हूँ, इसलिए उन्हे ज्यादा आश्चर्य होता. शब्दो में संख्याएं सही लिखी है या नहीं इसकी उन्हे जाँच करनी पड़ती, अनुरोध करते की अंग्रेजी में लिख कर लाया करूँ. अब सरकारी कर्मचारी है, सीधे सीधे काम होता नहीं, मेरे चैक उनके कार्यों को और बढ़ा देते, यह अतिरिक्त कार्य भला वे क्यों करे. वे कई तरह से खुन्नस निकालते और मैं भुगतता, सोचता यही भाषाप्रेम का सुफल है.

अपना काम शुरू किया तो लोगो ने सलाह दी की तुम्हारा काम आधुनिक किस्म का है, आज पान की टपरी वाले भी अंग्रेजी में पान-कॉर्नर लिखते है, कम से कम इस मामले में तो हिन्दी से दूर रहना. हिन्दी में कौन समझेगा और कौन काम देगा. फायं-फायं अंग्रेजी बोलो और लोग वहीं फिदा हो कर काम तुम्हारी झोली में डाल देंगे. मगर कहते है ना प्रेम अंधा होता है. कम्पनी या कहें तो अपने प्रतिष्ठान का नाम व लोगो हिन्दी में बनाया.

हमने हिन्दी के संजाल बनाए, सोचा सेवा हो जाएगी. समय बिगाड़ने को चिट्ठा भी लिखना शुरू किया. किसी ने कहा विकि में लेख डालो सेवा होगी, तो वो भी आजमाया. फिर हिन्दी कैसे-क्यूं आदी पर एनिमेटेड प्रशिक्षक भी बना कर रखे. तंत्रासो के हिन्दीकरण में हाथ बटाया.

मगर अब मैं कहता हूँ, मैं भ्रम में था, हम हिन्दी की सेवा नहीं करते, हमारी कम्पनी का 80 प्रतिशत काम हिन्दी में होता है और 50 प्रतिशत कमाई हिन्दी से होती है. हम हिन्दी का दोहन करते है, हिन्दी से कमाते है.

हिन्दी को हम जैसे टट्पुंजियों द्वारा सेवा की आवश्यकता नहीं है. यह अपने बल पर बढ़ने वाली भाषा है, मत करो हिन्दी की सेवा. हिन्दी का युक्ति-पूर्वक दोहन करो. जितना इसका दोहन करोगे उतनी ही यह मजबूत होगी, जैसे ज्ञान होता है.

तो इस बार हिन्दी-दिवस से हिन्दी की सेवा बन्द करने का प्रण ले लें और हिन्दी के अधिकतम दोहन को शुरू करें.

कभी इच्छा हो ही जाये तो अंग्रेजी में छपे प्रवेशपत्र के साथ हिन्दी दिवस विदेश में मना आयें, घुमना भी हो जाएगा और सेवा की सेवा भी हो जाएगी.



 

टिप्पणियाँ (9)add
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द्वारा प्रेषित manoj singh , सितम्बर 12, 2007
dil par asar krane wala vyang
manoj
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द्वारा प्रेषित G Vishwanath , सितम्बर 12, 2007
संजयजी,

मैं आपकी वेदना समझ सकता हूँ ।
फिर भी आप कुछ तो भाग्यवान हैं ।
समर्थन के लिए हिन्दी बोलने और समझने वाले आपको बहुत मिल जाएंगे ।
अन्य भारतीय भाषाओं के बारे में सोचिए ।
उनकी हालत हिन्दी से भी गयी बीती है ।
मैं स्वयं अंग्रेज़ी का शिकार बन गया हूँ ।
पढ़ाई अंग्रेज़ी के माध्यम से हुई और फिर आजीवन व्यवसाय में अंग्रेज़ी के अलावा कोई भी भारतीय भाषा का प्रयोग करने का अवसर ही नहीं मिला ।
अपनी मतृभाषा बोल लेता हूँ लेकिन ठीक से लिख - पढ़ नहीं सकता ।
कंप्यूटर, सॉफ़्ट्वेर, और इंटरनेट मुझे हिन्दी और अपनी मातृभाषा से और भी दूर ले गये ।
लेकिन आज यही कंप्यूटर, सॉफ़्ट्वेर, और इंटरनेट मुझे हिन्दी की ओर वापस खींच रहें हैं ।
मैं एक आशावादी हूँ । तीस साल बाद फिर से हिन्दी में लिखने लगा हूँ और एक अजीब संतोष महसूस कर रहा हूँ । पहले हिन्दी में लिखते हुए हिचक महसूस करता था लेकिन अब केवल एक महीने के अभ्यास के बाद हिचक दूर होता जा रहा है और आजकल फिर से हिन्दी में सोचने भी लगा हूँ ।
जाने माने चिट्टकारों के लेख भी पढ़ने लगा हूँ और मुझे इन लेखों से प्रेरणा मिलती है ।
आप लोग सकारात्म्क काम कर रहे हैं । धीरज रखें और हिम्मत ने हारें ।
शुभकामनाएं
गोपालकृष्ण विश्वनाथ, जयप्रकाश नारयण नगर, बेंगळूरु

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द्वारा प्रेषित संजय , सितम्बर 12, 2007
मनोजजी व विश्वनाथजी,

टिप्पणी के लिए आभार और मैं निराश कतई नहीं हूँ, बड़ा ढ़ीट इंसान हूँ. smilies/grin.gif

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द्वारा प्रेषित यह ई-मेल देखने के लिये कृपया जावास्क्रिप्ट को चालू करें , सितम्बर 12, 2007
आप तो खुजली का पत्ता निकले, जनाब क्या क्या खरोचकर निकालते हो? वैसे आपने बिलकुल सच्ची बातों को उगला है। और ये भी सच है कि हम ये बातें सिर्फ सोचते हैं और बताते हैं मगर करते कुछ नहीं। इन कडवी मगर सच्ची बातों का अहसास दिलाने के लिए धन्यवाद आपका।

शुऐब
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द्वारा प्रेषित संजय तिवारी , सितम्बर 12, 2007
"हिन्दी को हम जैसे टट्पुंजियों द्वारा सेवा की आवश्यकता नहीं है. यह अपने बल पर बढ़ने वाली भाषा है, मत करो हिन्दी की सेवा. हिन्दी का युक्ति-पूर्वक दोहन करो. जितना इसका दोहन करोगे उतनी ही यह मजबूत होगी, जैसे ज्ञान होता है."

कई लोगों को यह बात हजम नहीं होगी. लेकिन जब इसे मान लेंगे तो भाषा और भाव दोनों बढ़ेंगे.
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द्वारा प्रेषित अनूप शुक्ल , सितम्बर 12, 2007
सही है!

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द्वारा प्रेषित शशि सिंह , सितम्बर 12, 2007
प्यार किया है तो ढीठ तो बनना ही पड़ता है। अपने भी ऐसे ही हाल थे... लेकिन जब से अंग्रेजी के प्रति मन से नफरत को निकाला है अपनी हिन्दी के लिए प्यार और बढ़ गया है। अंग्रेजी से पीगें तो जरूर बढ़ा ली है मगर हिन्दी की खाकर अंग्रेजी में ??? वालों को कोई सहुलियत देने के मूड में कतई नहीं।
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द्वारा प्रेषित श्रीश शर्मा , सितम्बर 12, 2007
सही लिखे, हिन्दी से कमाई जैसे-जैसे बढ़ती जाएगी, हिन्दी का प्रसार भी होता जाएगी।

और हाँ हम भी हिन्दी प्रयोग के मामले में ढीट हैं। smilies/smiley.gif
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द्वारा प्रेषित नीरज दीवान , सितम्बर 16, 2007
मगर अब मैं कहता हूँ, मैं भ्रम में था, हम हिन्दी की सेवा नहीं करते, हमारी कम्पनी का 80 प्रतिशत काम हिन्दी में होता है और 50 प्रतिशत कमाई हिन्दी से होती है. हम हिन्दी का दोहन करते है, हिन्दी से कमाते है.


सही लेखन.. सेवा की ज़रूरत उसको होती है जो लाचार हो, सिकुड़ रहा हो या अविकसित हो. हम हिन्दी के भरोसे खाने वाले लोग हैं। अंग्रेज़ी का आना हमारी अतिरिक्त योग्यता है। यह योग्यता अनिवार्य ना हो इसके लिए मूल हिन्दी में ही लिखते रहे.. आलसियों की तरह बैठे रहने पर तो तालाब का पानी भी एक दिन खत्म हो जाता है।
हिन्दी दिवस पर सही लेख


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