| कोई बताए, हिन्दी सेवा होती है क्या? |
| संजय दृष्टि | ||
| बुधवार , , 12 सितम्बर | ||
एक व्यक्ति था, सारी उम्र पत्थर की प्रतिमा को पूजता रहा. मरा तो भगवान ने नर्क में डाल दिया. यह अन्याय था, सारी उम्र सेवा में निकाल दी और मिला नर्क!. भगवान ने कहा कि पूजा तो तुमने की मगर बिना विधि जाने. तुमने प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा तो की ही नहीं थी. टिप्पणियाँ
(9)
संजयजी,
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मैं आपकी वेदना समझ सकता हूँ । फिर भी आप कुछ तो भाग्यवान हैं । समर्थन के लिए हिन्दी बोलने और समझने वाले आपको बहुत मिल जाएंगे । अन्य भारतीय भाषाओं के बारे में सोचिए । उनकी हालत हिन्दी से भी गयी बीती है । मैं स्वयं अंग्रेज़ी का शिकार बन गया हूँ । पढ़ाई अंग्रेज़ी के माध्यम से हुई और फिर आजीवन व्यवसाय में अंग्रेज़ी के अलावा कोई भी भारतीय भाषा का प्रयोग करने का अवसर ही नहीं मिला । अपनी मतृभाषा बोल लेता हूँ लेकिन ठीक से लिख - पढ़ नहीं सकता । कंप्यूटर, सॉफ़्ट्वेर, और इंटरनेट मुझे हिन्दी और अपनी मातृभाषा से और भी दूर ले गये । लेकिन आज यही कंप्यूटर, सॉफ़्ट्वेर, और इंटरनेट मुझे हिन्दी की ओर वापस खींच रहें हैं । मैं एक आशावादी हूँ । तीस साल बाद फिर से हिन्दी में लिखने लगा हूँ और एक अजीब संतोष महसूस कर रहा हूँ । पहले हिन्दी में लिखते हुए हिचक महसूस करता था लेकिन अब केवल एक महीने के अभ्यास के बाद हिचक दूर होता जा रहा है और आजकल फिर से हिन्दी में सोचने भी लगा हूँ । जाने माने चिट्टकारों के लेख भी पढ़ने लगा हूँ और मुझे इन लेखों से प्रेरणा मिलती है । आप लोग सकारात्म्क काम कर रहे हैं । धीरज रखें और हिम्मत ने हारें । शुभकामनाएं गोपालकृष्ण विश्वनाथ, जयप्रकाश नारयण नगर, बेंगळूरु report abuse
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द्वारा प्रेषित संजय , सितम्बर 12, 2007
मनोजजी व विश्वनाथजी,
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टिप्पणी के लिए आभार और मैं निराश कतई नहीं हूँ, बड़ा ढ़ीट इंसान हूँ. report abuse
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द्वारा प्रेषित यह ई-मेल देखने के लिये कृपया जावास्क्रिप्ट को चालू करें , सितम्बर 12, 2007
आप तो खुजली का पत्ता निकले, जनाब क्या क्या खरोचकर निकालते हो? वैसे आपने बिलकुल सच्ची बातों को उगला है। और ये भी सच है कि हम ये बातें सिर्फ सोचते हैं और बताते हैं मगर करते कुछ नहीं। इन कडवी मगर सच्ची बातों का अहसास दिलाने के लिए धन्यवाद आपका।
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शुऐब report abuse
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द्वारा प्रेषित संजय तिवारी , सितम्बर 12, 2007
"हिन्दी को हम जैसे टट्पुंजियों द्वारा सेवा की आवश्यकता नहीं है. यह अपने बल पर बढ़ने वाली भाषा है, मत करो हिन्दी की सेवा. हिन्दी का युक्ति-पूर्वक दोहन करो. जितना इसका दोहन करोगे उतनी ही यह मजबूत होगी, जैसे ज्ञान होता है."
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कई लोगों को यह बात हजम नहीं होगी. लेकिन जब इसे मान लेंगे तो भाषा और भाव दोनों बढ़ेंगे. report abuse
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द्वारा प्रेषित शशि सिंह , सितम्बर 12, 2007
प्यार किया है तो ढीठ तो बनना ही पड़ता है। अपने भी ऐसे ही हाल थे... लेकिन जब से अंग्रेजी के प्रति मन से नफरत को निकाला है अपनी हिन्दी के लिए प्यार और बढ़ गया है। अंग्रेजी से पीगें तो जरूर बढ़ा ली है मगर हिन्दी की खाकर अंग्रेजी में ??? वालों को कोई सहुलियत देने के मूड में कतई नहीं।
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द्वारा प्रेषित श्रीश शर्मा , सितम्बर 12, 2007
सही लिखे, हिन्दी से कमाई जैसे-जैसे बढ़ती जाएगी, हिन्दी का प्रसार भी होता जाएगी।
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और हाँ हम भी हिन्दी प्रयोग के मामले में ढीट हैं। report abuse
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द्वारा प्रेषित नीरज दीवान , सितम्बर 16, 2007 मगर अब मैं कहता हूँ, मैं भ्रम में था, हम हिन्दी की सेवा नहीं करते, हमारी कम्पनी का 80 प्रतिशत काम हिन्दी में होता है और 50 प्रतिशत कमाई हिन्दी से होती है. हम हिन्दी का दोहन करते है, हिन्दी से कमाते है. सही लेखन.. सेवा की ज़रूरत उसको होती है जो लाचार हो, सिकुड़ रहा हो या अविकसित हो. हम हिन्दी के भरोसे खाने वाले लोग हैं। अंग्रेज़ी का आना हमारी अतिरिक्त योग्यता है। यह योग्यता अनिवार्य ना हो इसके लिए मूल हिन्दी में ही लिखते रहे.. आलसियों की तरह बैठे रहने पर तो तालाब का पानी भी एक दिन खत्म हो जाता है। हिन्दी दिवस पर सही लेख report abuse
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manoj