| रेटिंग के चक्कर में हमारे महाराज सा |
| मंतव्य | ||
| बुधवार , , 19 सितम्बर | ||
रेटिंग और टी.आर.पी का चक्कर तो आजकल ऐसा फैला है कि पूछिए मत. पहले टीवी कार्यक्रमों की रेटिंग होती थी, फिर रेडियो का सोया शेर जागा तो "बाजारू" विशेषज्ञ उसकी भी रेटिंग ले आए. फिर तो रेटिंग का जूमला इतना लोकप्रिय हुआ कि अब तो हम हर जगह हर किसी चीज को रेट ही करते हैं.
यह चिट्ठासंसार भी कहाँ अछूता है. जिसे देखो एक दूसरे से रेट म रेट में उलझा है. कभी टिप्पणियाँ नापी जाती है कभी लेख की लम्बाई, कभी गहराई, कभी भरपाई. हमारे जैसे जो चारपाई ही नापते रहते हैं, उनकी ना तो कोई रेटिंग होनी थी ना ही है. हम तो बिना रेटिंग के ही मस्त हैं. वैसे अपना अधिक इंटरेस्ट रेटिंग में ना होकर डेटिंग में है. पर कोई साथी तैयार हो तो! रेटिंग की देखिए तो कभी समाचार पत्रों और मेगजीनों के लिक्खाड पत्रकार कभी सरकार को रेट करते हैं, कभी राज्यों को कर लेते हैं, कभी मंत्रियों को कर लेते हैं. कभी किसी को उपर चढा देते हैं, कभी नीचे ला पटकते हैं, मानो इंसान नहीं सेंसेक्स का इंडेक्स है! और तो और पिछले दिनों क्या देखता हुं, हमारे महाराज सा भी रेटिंग के धंधे में उलझे पडे हैं. हुआ यूँ कि जैन तेरापंथी समाज में जन्म लेने के कारण मुझे सपरिवार हमारे संप्रदाय के संतजनों से मिलने उनके द्वार जाना पडा. जाना पडा इसलिए लिख रहा हुँ, क्योंकि जाना कौन चाहता है? मैने देखा है वहाँ जाने वाले 99% लोग इसलिए जाते हैं क्योंकि उन्हें भ्रम है कि वहाँ जाकर संतो के सानिध्य में बिताए कुछ पल उन्हें जीवन चक्र से मुक्ति दिला देंगे. बस जाते ही हैं, और कुछ नहीं क्योंकि महाराज सा के प्रवचन के वक्त लोग ऊँघते और शादियाँ फिट करते ज़रूर दिख जाते हैं. ना महाराज सा को परवाह है, ना श्रावकों को है. दोनों खुश हैं क्योंकि ग़लतफहमी में जी रहे हैं. लेकिन इस बार तो कुछ अनोखी ही बात दिखी. हम दो संत आत्माओं से मिले. पहले एक ने पकडा. थोडा गोल गोल घुमाया. फिर एक पर्चा थमाया. हमने देखा भैया यह क्या है? देखा तो पता चला सोगन्धनामा है कि मैं और मेरा परिवार आजीवन व्यसन नही करेंगे. हमने कहा हम तो व्यसन करते ही नहीं. बोले, कभी भविष्य में किया तो? हमने कहा, नही करेंगे. बोले तो पर्चा भर दो. अरे भाई अच्छी जबरदस्ती है, पर्चा भरवाने की. आधे घंटे की मशक्कत के बाद हमें लगा कि महाराज सा छोडेंगे नहीं, तो पर्चा भर दिया. महाराज सा खुश हम भी खुश. हमने देखा, ऐसे असंख्य पर्चे भरे हुए हैं, तो अब जब ये महाराज सा आचार्य श्री से मिलेंगे तो इतने पर्चे दिखाएँगे कि उनकी रेटिंग छलाँग मार कर बढ जाएगी. खैर वहाँ से छूटे तो एक जूनियर महाराज सा ने लपक लिया, और फिर वही गोल गोल घूमा कर झट से पर्चा पकडा दिया. अब यह क्या है, देखा तो पता चला सब्जियों की लंबी लिस्ट है, साथ में अंडा, मूर्गी, बकरा भी है. बोले, कुछ चीजें छोड दो, काट दो नाम. हम तो पीछे से खिसक लिए, पर भैया बोले मूर्गी वगैरह तो नहीं खाते. महाराज सा बोले, तो काट दो. भैया बोले, पर हम तो खाते ही नही. महाराज सा बोले, तभी तो कहे कि काट दो मूर्गी को अभयदान मिलेगा. खिसके हुए हम बाहर आकर टहलते रहे और घंटे भर बाद परिवार के सदस्यों को थके हारे देखे. समझ गए पर्चे भर के आए हैं. एक श्रावक बोले, खूब पर्चे भरे हैं. हमने सोचा, आचार्य श्री खुश हो जाएंगे. जय हो रेटिंग देवा. टिप्पणियाँ
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मैं चाय, कॉफी, पान बीड़ी सिगरेट यहाँ तक सुपारी भी नहीं खाता, कई महाराज साहब ने कहा कि जब नहीं खाते तो पर्चा भर लो ( बाधा ले लो) पर मैने आज तक कोई पर्चा नहीं भरा, मुझे खुद पर विश्वास है कि मईं इन चीजों का सेवन नहीं करूंगा, फिर क्यों इन चक्करों में पड़ूं?
आजकल हर जगहर रेटिंग का जमाना है कई साधू महाराज तो इस वजह से छोटे छोटे बच्चों तक को दीक्षा दिलवा देते हैं।
जय रेटिंग देवा