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क्या होता है कोर्ट मार्शल? |
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रोचक तथ्य और जानकारी
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रविवार , , 23 सितम्बर |
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पंकज बेंगाणी
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कोर्ट मार्शल, नाम सुनते ही जो दृश्य दिमाग के सामने उभरता है वह होता है एक फ़ौजी जो सिर झुकाए खड़ा है, सामने एक टेबल के पीछे तीन चार सेना के उच्च अधिकारी जो उससे सवाल कर रहे हैं. तुरंत ही निर्णय और तुरंत ही रिहाई या फिर सजा.
जाहिर है कोर्ट मार्शल, यह शब्द सेना से जुडा हुआ है और सेना की न्यायिक प्रणाली का अहम हिस्सा है. सेना के जवानों के अपराधों के लिए उन्हें कोर्ट मार्शल करने की प्रणाली मूलतः ब्रिटिश है. ब्रिटेन के सम्राट चार्ल्स प्रथम ने सेना मे अनुशासन बनाए रखने के लिए Mutiny Act, 1689 के द्वारा कोर्ट मार्शल प्रणाली अपनाई थी. उसके बाद सन 1881 में इसे Army Act के रूप मे मान्यता मिली.ब्रिटिश राज ने इस प्रणाली को भारत मे भी लागू किया. और भारत ने इसमे कुछ सुधार करके अपना Army Act 1950 aur 1954 बनाया.
कोर्ट मार्शल प्रणाली के तहत सेना के लिए एक अलग न्याय तंत्र बनाने की व्यवस्था है और आम नागरिकों के न्यायालय से यह अलग होती है. आम तौर पर कोर्ट मार्शल द्वारा लिए गए निर्णय के खिलाफ नागरिक अदालतों जैसे कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अपील नही की जाती है, क्योंकि संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति सेना के सुप्रीम कमांडर हैं और जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह राष्ट्रपति के नाम से लिए जाते हैं. इसलिए ऐसे फ़ैसलों के खिलाफ नागरिक अदालतों मे अपील उचित भी नही है.
सेना के लिए अलग न्याय तंत्र बनाने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि सेना में अनुशासन और ज़िम्मेदारी की गंभीरता आम नागरिक जीवन से बहुत कडी और भिन्न होती है. उदाहरण के लिए किसी कम्पनी में कार्यरत कोई कर्मचारी यदि बिना बताए उस कम्पनी को छोड़कर चला जाता है तो वह कम्पनी उस व्यक्ति के खिलाफ आम तौर पर कोई कानूनी कार्यवाही नही कर सकती है. लेकिन सेना में यदि कोई सैनिक अपनी बटालियन छोड़कर बिना बताए जाता है तो यह गंभीर अपराध माना जाता है. इसके अलावा युद्ध के दौरान लड़ाई छोड़कर भाग जाना, अपने ऊपरी अधिकारियों की बात ना मानना, ड्यूटी के समय हाज़िर ना होना भी गंभीर अपराध हैं. आम नागरिकों के लिए ऐसे कानून बनाना संभव नही है और व्यवहारिक भी नही है. इसलिए नागरिक और सेना की अदालतें अलग अलग होती है.
सेना के लिए अलग अनुशासित न्याय तंत्र की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि नागरिक अदालतों में न्याय की व्यवस्था बहुत धीमी गति से चलती है और न्यायाधीश को अपना निर्णय सुनाने में काफी समय लग जाता है. सेना किसी अपराध के लिए इतना समय बर्बाद नही कर सकती, क्योंकि ऐसा होने पर सेना मे अनुशासन बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा.
सन 2000 से लेकर 2005 तक पाँच सालों मे भारतीय सेना ने 6000 जवानों और अधिकारियों का कोर्ट मार्शल किया जिसमें तहलका कांड में फँसे अधिकारी भी थे. नागरिक अदालतों मे इतने केसों का इतने कम समय में निपटारा असंभव है.
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