| मस्ती का जमाना है |
| मेरे विचार | ||
| सोमवार , , 24 सितम्बर | ||
विगत सप्ताह से क्रिकेट का फास्ट फूड संस्करण ट्वेंटी-२० शुरू हुआ। पांच दिन का खेल एक दिन के मैच से होते हुए अब कुछ घंटों में सिमटकर रह गया। यकीन मानिए वन-डे के कारण जो हश्र टेस्ट मैच का हुआ है वही ट्वेंटी-२० के कारण एक-दिवसीय क्रिकेट का होगा। और इसका कारण है कि किसी के पास समय नहीं है। देखने वाले, खेलने वाले, यहां तक कि मैच का आयोजन करवाने वाले भी अतिव्यस्त हैं। और फिर सभी को कम समय में अधिक से अधिक चाहिए। आयोजनकर्ता और खिलाड़ी को धन तो दर्शकों को भरपूर मस्ती। ऊपर से कुछ घंटों में ही दर्शकों को हार-जीत का फैसला भी चाहिए। और चाहिए पावर, जोश, गर्माहट, उत्साह, उमंग, उत्तेजना। लेकिन थोड़ा-सा भी समय को खींचने पर वो बोर होने लगता है। उसे धीमा नहीं तेज गेम चाहिए। क्रिकेट आयोजकों ने दर्शकों के लिए इस ट्वेंटी-२० मैच में अर्धनग्न लड़के-लड़कियों का नृत्य व पाश्चात्य तेज संगीत का भी इंतजाम कर रखा है। वह जानता है कि दर्शक को सेक्स, ग्लैमर और संबंधित उत्तेजना चाहिए। हर चौके-छक्के या विकेट गिरने पर नृत्य प्रारंभ हो जाता है। अब दर्शक क्रिकेट की बॉल देखे या नृतकों के कमर की थाप। मगर शायद यह आयोजकों की मजबूरी है जो वह जानता है कि भीड़ कैसे इकट्ठा हो सकती है। लोगों की क्या मानसिकता है। दर्शकों की क्या जरूरत है। वो तो मस्ती बेचकर पैसा कमाना चाहता है। वह जानता है कि आज के युग में दर्शक का समय कीमती है और जीवन की रफ्तार बहुत तेज। सबको जीवन में जल्दी है। तभी तो फास्ट फूड प्रचलित है। रेडीमेड का जमाना है। किसके पास इतना वक्त है कि किसी चीज के बनने का इंतजार करे। कपड़ा, फर्नीचर, घर की आंतरिक साज-सज्जा से लेकर खान-पान की चीजें सब कुछ रेडीमेड उपलब्ध है। रिश्ते भी तो समाचारपत्रों में तैयार करके परोसे जाते हैं। रातभर धीरे-धीरे स्वाद लेकर महंगी शराब पीने का सरूर अब नहीं लिया जाता। अब तो सबको नशा चाहिए, तुरंंत, दिमाग पर किक, तभी तो पटियाला पैग फैशन में है। और फिर बाकी नशे भी तो इसीलिए प्रचलित हैं कि सब में है, मिनटों में तुरंत नशा। वो भी सातवें आसमान का। पांच दिन के टेस्ट मैचों को ध्यान से देखें, इसमें जहां सौम्यता थी, सभ्यता थी, शांति थी, धीरज था, धैर्य था। वहीं इसे हार-जीत के बिना भी खेला जा सकता था। मैच ड्रा होने की संभावना रहती थी। खेल मनोरंजन के लिए था और उसमें कलात्मकता थी। मैच ड्रा कराने के लिए सुरक्षात्मक खेल का कौशल भी दिखाया जाता था। अब ये विश्लेषणात्मक शब्द पुराने, बासे और अनुपयोगी हो चुके हैं। टेस्ट मैच तो अब भी खेले जाते हैं मगर अब उनका कोई अस्तित्व नहीं इसीलिए 'है` की जगह 'थे` लगाना पड़ रहा है। वो जमाने गए जब अच्छी शराब वही मानी जाती थी जो धीरे और लंबे समय तक असर करे। अब तो बीयर के फाइव थाउजेंड और टेन थाउजेंड वर्जन का युग है जो बीयर का सरूर कम कच्ची शराब का झटका ज्यादा देती है। तुरंत खाना, तुरंत पकाना, जल्दी से जल्दी शीर्ष पर पहुंचना, जेट विमान से शीघ्र मंजिल पर पहुंचना, सुपरफास्ट ट्रेन, तेज संगीत, जल्दी शादी और अतिशीघ्र तलाक, रातोंरात ख्याति प्राप्त करना, कपड़ों के माफिक फे्रंड्स बदलना यह सब आज के युग की पहचान है। जमाना इतना बदल चुका है कि टेलीविजन पर भी मस्ती बिकती है। खबरों में सनसनी चाहिए। कोई अगर मर रहा है तो उसे भी रोमांच बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। मनोरंजन के द्वारा आनंद का युग समाप्त हो चुका है अब जीवन के हर एक पल में मस्ती का बम्पर पैकेज चाहिए। बाजार तो फिर बाजार है पूरी तरह ग्राहक पर निर्भर। उसकी व्यवस्था ने इंसान की इन्हीं जरूरतों को पूरा करने के लिए कई तिकड़म बना रखे हैं। वो उसकी इन्हीं कमजोरी को उभारकर पूरा करता है। उसे तो व्यवसाय करना है। बाजार में वही जीवित रह पाता है जो लाभ कमा सके। आदर्श नहीं उसे तो सफलता चाहिए। उत्पादनकर्ता जानता है कि मस्ती के लिए नित नई नवीनता आवश्यक है जिसके पीछे ग्राहक की क्षणिक संतुष्टि एक प्रमुख कारण है। तभी तो हर एक सामान के मॉडल बदल जाते हैं और कुछ नहीं तो पैकिंग कवर बदल दिए जाते हैं और साबुन से लेकर चप्पल तक के विज्ञापन में मॉडलों के द्वारा तरह-तरह की मस्ती दिखाई जाती है। कई बार तो यह समझना मुश्किल हो जाता है कि नायिका किस सामान को बेचने के लिए नाच रही है। अब दुकानदार भी क्या करे, रोज नयापन कहां से लाये। आज खरीदा हुआ सामान कल बाजार में पुराना हो जाता है। फैशन दिन-रात में बदल जाता है। टीवी, विडिओ और इसी तरह के कुछ दूसरे इलेट्रॉनिक्स गुड्स अब दिनों के हिसाब से बदलकर नये-नये मॉडल में प्रस्तुत होते हैं वहीं नयी-नयी गाड़ियां, मोटर-कार महीनों के हिसाब से निकलती हैं और इसी तरह से सब कुछ जल्दी से जल्दी बदलना चाहता है। ऊधर, ग्राहक अपनी खरीदारी को भी विशिष्ट बनाना चाहता है। वो अब जरूरत के लिए कम और मस्ती के लिए खरीदारी अधिक करता है। इसीलिए तो सभी में अधिक से अधिक नयापन ढूंढ़ता है। एक जमाना था त्योहारों के लिए लोग पूरे साल इंतजार करते थे। महीने पहले से तैयारियां शुरू हो जाती थीं। तैयारी और इंतजार का भी अपना मजा था। घर पर बहू-बेटे, लड़की-दामाद जुटते थे। बाजार सजते थे। उस युग में शादी-ब्याह तो फिर जीवन और परिवार में अति महत्वपूर्ण माने जाते थे। जिनकी तैयारी में वर्षों लगते थे। जीवन में यह एक बार होता था। इन्हें बड़े चाव से धीरे-धीरे मूर्त रूप दिया जाता था। बच्चे दर्जनों के हिसाब से होते थे परंतु हर एक के विभिन्न धार्मिक सामाजिक पारिवारिक कार्यक्रमों में पूरा समय दिया जाता था। शादी का कार्यक्रम हफ्तों चलता था। परिवार के बीच नोकझोंक भी होती थी। रीति-रिवाज निभाए जाते थे। पूरा खानदान इकट्ठा होता था। रीति-रिवाज व सामाजिक कार्यक्रम जीवन में मनोरंजन के माध्यम थे। इन सबके पीछे आनंद और खुशी प्राप्त करने की अभिलाषा होती थी। अब जमाना बदल गया है। चट मंगनी पट ब्याह फट तलाक का युग आ गया है। मनोरंजन का स्थान मस्ती ने और आनंद का स्थान नशा ने तो खुशी का स्थान उत्तेजना ने लिया है। आत्मिक सुख को भौतिक सुख ने विस्थापित कर दिया। इंसान हर चीज में हार-जीत चाहता है तुरंत फैसला। सब कुछ जल्दी चाहिए। समझौता नहीं करना चाहता। खेल ही क्यों, घर-परिवार में भी समन्वय नहीं, सामंजस्य नहीं। हर एक का समय इतना बहुमूल्य बना दिया गया है कि समय के साथ नहीं उससे आगे चलने की कोशिश होती है। जीवन में ठहरकर समय को देखा नहीं जाता, जिया नहीं जाता, दौड़कर उसे हराने की कोशिश की जाती है। मगर समय तो अपनी रफ्तार से ही चलता रहता है। बस हम तेजी के चक्कर में अपना नियंत्रण खो बैठते हैं। कभी-कभी हम इस चक्कर में समय से आगे तो चले जाते हैं और अपनी बनाई तथाकथित मंजिल पर जल्दी पहुंच भी जाते हैं मगर फिर हमें रुकना पड़ता है। और फिर हम जल्दी पहुंचकर बोर होने लगते हैं और परेशान होते हैं। अब कौन समझाए जीवन का आनंद उसके जीने में है समय के साथ आराम से चलने में है। किसी के तेज चलने से सवेरा जल्दी नहीं आता, सुबह तो अपने समय पर ही होगी। मनोज सिंह ४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ़ टिप्पणियाँ
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मगर सुबह से शाम अपने समय में ही होती है और करने के लिए काम बढ़ गये है, तो समय के साथ ताल मेल बिढ़ाने को "फास्ट" होना मजबूरी भी है. इसने सुकून जरूर छीन लिया है.