हिन्दी चिट्ठाजगत मे कुछ दिनो पहले एक मुहावरा प्रचलित हुआ था कि आप चाहे जो भी लिखिए, बस अंत मे एक स्माइली लगा दीजिए और आपका काम हो गया. कोई आप से नाराज़ नही होगा.
तीन चिह्नों से बनने वाले स्माइली की महिमा भी न्यारी है. आजकल तो तरह तरह के ग्राफिकल स्माइली हर जगह मौजूद हैं. चिटठो पर टिप्पणी करते समय, किसी भी फोरम में या पोर्टलों मे भी हर जगह स्माइली छाए हुए हैं.आज से दो दशक पहले यह स्थिति नही थी. तब कम्प्युटरों का जमाना नया था और पश्चिमी जगत के अलावा बाकी दुनिया में बहुत कम लोग कम्प्यूटर का इस्तेमाल भी करते थे.
सिर्फ शून्य और एक की डिजिटल भाषा समझने वालेकम्प्युटरो पर सवेंदना किस तरह व्यक्त की जाए यह एक बडा सवाल था. तब इलेक्ट्रॉनिक बुलेटीनों के सदस्य आपस मे चर्चा किया करते थे कि कम से कम अक्षरों का उपयोग करके सवेंदनाएँ किस तरह व्यक्त की जाए?
आखिरकार 19 सितम्बर 1982 को कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्कोट फालन ने एक रस्ता सुझाया. उन्होने कहा कि यदि हम की-बॉर्ड के तीन चिह्नों का उपयोग कुछ इसतरह से करें - "-) तो एक मजेदार चिन्ह बन जाता है जिससे आप यह प्रदर्शित कर सकते हैं कि आपको अमुक बात सुनकर मजा आया.
यह चिन्ह मानवीय चेहरे के प्रतिभावों का अहसास देता है. बस फिर तो इसी तरह के अन्य चिह्नों का प्रयोग और आविष्कार शुरू हो गया. कोई खुशी का चिन्ह - :-) बनाता तो कोई दुख का - :-(. इस तरह से यह सिलसिला चल निकला.इसके बाद तो सूचना और तकनीक की क्रांति आई और कम्प्यूटर घर घर में बसाए जाने लगे. लोगों के लिए निजी कम्प्यूटर बनने लगे और साथ स्माइली अब सिर्फ चिन्ह ना रहकर पीले गोलाकार में सुन्दर चेहरे के रूप मे अवतरित हो गए. और अब तो एनिमेटेड स्माइली भी उपलब्ध है.
लेकिन आज भी लोग संजाल पर बात करते समय इन्ही तीन चिह्नों का उपयोग करके अपनी सवेंदनाएँ व्यक्त करते रहते हैं. लेकिन इसके आविष्कारक प्रोफेसर स्कोट फालन को शायद ही कोई जानता है.